Gen Z अंडरवर्ल्ड: 10-20 हजार के लालच में अपराध के जाल में फंस रहे युवा
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Gen Z अंडरवर्ल्ड: 10-20 हजार के लालच में अपराध के जाल में फंस रहे युवा

सोशल मीडिया रील्स, झूठा भाईचारा और जेल नेटवर्किंग। कैसे कम उम्र के युवाओं को 'फुट सोल्जर' बना रहे बड़े गैंगस्टर।


Genz Underworld: मुंबई में अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर गोलीबारी की घटना के तार जब राजस्थान के कोटा से जुड़े, तो जांच एजेंसियों ने 18 से 22 साल के तीन युवकों को धर दबोचा। इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। अपराध की दुनिया के बड़े चेहरों के लिए हाथ में बंदूक उठाने वाले ये नौजवान आखिर आते कहाँ से हैं? दिल्ली और हरियाणा में हत्या व रंगदारी जैसे संगीन जुर्म के युवा आरोपियों से बातचीत के बाद 'Gen Z Underworld' का खौफनाक सच सामने आ गया है। दोस्ती, फर्जी 'भाईचारा', इंस्टाग्राम पर गैंगस्टर वाला स्वैग, 10-20 हजार रुपये का शुरुआती लालच और जेल में बनने वाले नए कनेक्शन युवाओं को बर्बादी की तरफ धकेल रहे हैं।


दोस्ती से खुलता है बर्बादी का पहला दरवाजा
19 साल के एक युवक की कहानी इस दलदल की भयावहता बयां करती है। जब वह एक मामले में रिहा होकर लौटा, तो दोस्तों ने फूल-माला पहनाकर उसका स्वागत किया और कहा कि 'भाई वापस आ गया'। इस युवक की शुरुआत स्कूल के दिनों में दोस्तों के साथ क्लास बंक करने और सिगरेट पीने से हुई थी। धीरे-धीरे यह आदत संगीन अपराधों तक पहुँच गई। वहीं एक अन्य 20 वर्षीय आरोपी, जो कभी एमएमए (MMA) फाइटर बनने का सपना देखता था और पढ़ाई में भी होनहार था, आज हत्या के मामले में जमानत पर बाहर है। उसका कहना है कि इस चक्रव्यूह में एक बार फंसने के बाद बाहर निकलना लगभग असंभव हो जाता है।

'बाबू, तू ये कर दे... दो महीने में बाहर': जेल बनी नेटवर्किंग का अड्डा
जेल अब अपराधियों को सुधारने की जगह बड़े गैंगस्टर्स से संपर्क का जरिया बनती जा रही है। सलाखों के पीछे पैसों, नशे और सुरक्षा का लालच देकर युवाओं का ब्रेनवॉश किया जाता है। अक्सर युवाओं को यह कहकर फुसलाया जाता है, 'बाबू, तू ये कर दे... दो महीने में बाहर।' जेल में किसी गिरोह से मदद मिलने के बदले बाहर निकलकर अपराध करने की शर्त रख दी जाती है। तिहाड़ जेल में टिल्लू ताजपुरिया की हत्या जैसी गैंगवार की घटनाएं साबित करती हैं कि जेल के अंदर से ही पूरा नेटवर्क संचालित हो रहा है।

Instagram पर गैंगस्टर वाला 'स्वैग' और रील की चकाचौंध
अपराध के इस नए ट्रेंड में सोशल मीडिया सबसे खतरनाक हथियार बनकर उभरा है। स्पेशल कमिश्नर (क्राइम ब्रांच) एचएस धालीवाल का मानना है कि 16 से 18 साल की उम्र बहुत नाजुक होती है। अच्छे स्कूलों में पढ़ने वाले छात्र भी इससे बच नहीं पा रहे हैं। इंस्टाग्राम पर हथियारों, स्कॉर्पियो, फॉर्च्यूनर और थार जैसी गाड़ियों के साथ रील्स बनाकर ताकत का प्रदर्शन किया जाता है। कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक बंदूकों, पैसों और रसूख की यह फर्जी छवि कम उम्र के लड़कों को अपराध की जिंदगी की तरफ आकर्षित करती है।

क्यों बनते हैं कम उम्र के लड़के 'फुट सोल्जर'?
बड़े गैंगस्टर्स के लिए कम उम्र के लड़के सबसे आसान हथियार होते हैं। पहली बार अपराध करने वाले युवाओं का कोई पुराना पुलिस रिकॉर्ड नहीं होता, जिससे जांच एजेंसियों के लिए उन्हें ट्रैक करना मुश्किल होता है। इसके अलावा नाबालिगों पर किशोर न्याय कानून लागू होने का फायदा भी उठाया जाता है। सिद्धू मूसेवाला हत्याकांड का आरोपी अंकित सिरसा महज 19 साल का था। वहीं कुख्यात गैंगस्टर हिमांशु भाऊ ने सिर्फ 15 साल की उम्र में अपराध की दुनिया में कदम रखा था।

'पहले 10-20 हजार, फिर अपराध के बाद कोई नहीं पूछता'
एक ट्रिपल मर्डर केस के 25 वर्षीय आरोपी के मुताबिक शुरुआती दौर में युवाओं को केवल 10 से 20 हजार रुपये दिए जाते हैं। इन्हें केवल किसी को ठहराने या किसी जगह ड्रॉप करने जैसे छोटे काम दिए जाते हैं। लेकिन जैसे ही कोई बड़ा जुर्म अंजाम दे दिया जाता है, बड़े गैंगस्टर्स इन युवाओं को इनके हाल पर छोड़ देते हैं। अलग-अलग स्तर पर काम बांटने की वजह से इन 'फुट सोल्जरों' को मुख्य साजिशकर्ता या पूरी योजना की खबर तक नहीं होती।

कनाडा तक फैला भर्ती नेटवर्क और बेरोजगारी का संकट
कनाडाई इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक गोल्डी बराड़ और लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने कनाडा में स्टूडेंट वीजा पर गए भारतीय छात्रों की आर्थिक मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें शूटर के रूप में भर्ती किया। हरियाणा एसटीएफ के अधिकारियों के मुताबिक पढ़ाई बीच में छोड़ना (ड्रॉपआउट) और रोजगार की कमी इसकी मुख्य वजहें हैं। पुलिस कार्रवाई अक्सर केवल मैदानी स्तर पर गोली चलाने वाले 'फुट सोल्जरों' तक सीमित रह जाती है, जबकि मुख्य मास्टरमाइंड तक पहुँचना जांच एजेंसियों के लिए आज भी सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है।


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