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ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तेज: जंतर-मंतर पर दूसरे दिन भी उग्र प्रदर्शन

दिल्ली पुलिस ने नेहा बोरा को हिरासत में लिया, कपिल सिब्बल व प्रशांत भूषण भी समर्थन में उतरे; 6 अक्टूबर को विपक्षी सांसदों के बड़े मार्च की तैयारी।


राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर छात्र संगठनों और नागरिक समाज के प्रतिनिधियों का आंदोलन उग्र होता जा रहा है। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की अध्यक्ष नेहा बोरा के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने लगातार दूसरे दिन जंतर-मंतर की ओर कूच करने का प्रयास किया, जिसके चलते पूरे इलाके में सुरक्षा बलों के साथ भारी टकराव की स्थिति बनी रही।

​बैरिकेडिंग तोड़कर आगे बढ़ने का प्रयास, पुलिस को चकमा देकर दोबारा पहुंचीं नेहा बोरा
​संसद मार्ग, केरल हाउस और रफी मार्ग की ओर जाने वाले सभी रास्तों पर दिल्ली पुलिस ने कड़े बैरिकेड्स लगा रखे थे। संख्या बल के लिहाज से भले ही छात्र पहले दिन की तुलना में कम थे, लेकिन उनका रुख बेहद आक्रामक नजर आया।

​प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा को हिरासत में लेकर सरकारी बस में बैठा दिया था। इसके बावजूद वे पुलिस को चकमा देकर बस की खिड़की और दरवाजे से बाहर निकल आईं और दोबारा सीधे प्रदर्शन स्थल पर पहुंच गईं। वे बैरिकेड्स पर चढ़ गईं और ऐलान किया कि पुलिस जितनी बार भी उन्हें रोकेगी या हिरासत में लेगी, वे उतनी ही बार वापस लौटकर आएंगी।

​प्रदर्शनकारियों ने बैरिकेड हटाने की कोशिश की, जिससे स्थिति तनावपूर्ण हो गई। हालात पर काबू पाने के लिए दिल्ली पुलिस के अतिरिक्त केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) और रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) की टुकड़ियों को तैनात करना पड़ा। नेहा बोरा ने आरोप लगाया कि महिला पुलिसकर्मियों ने उनके साथ धक्का-मुक्की और बदसलूकी की, जिससे उन्हें चोटें भी आईं। हालांकि, बाद में सुरक्षा बलों ने संयम बरतते हुए प्रदर्शनकारियों को दोबारा हिरासत में लिया।

​कपिल सिब्बल, प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव भी प्रदर्शन में शामिल
​इस आंदोलन को देश के वरिष्ठ वकीलों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का भी सीधा समर्थन मिला है। वरिष्ठ अधिवक्ता व राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण, स्वराज इंडिया के संस्थापक योगेंद्र यादव और चुनाव सुधार कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज भी छात्रों के साथ सड़क पर उतरे।

​वरिष्ठ हस्तियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए छात्र कार्यकर्ताओं ने उनके चारों ओर एक सुरक्षा घेरा बना रखा था, ताकि भारी संख्या में मौजूद मीडियाकर्मियों और डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स के बीच भगदड़ जैसी स्थिति न बने। योगेंद्र यादव ने कहा कि जब तक मुख्य चुनाव आयुक्त अपने पद से इस्तीफा नहीं देते, यह लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन थमने वाला नहीं है।

​मुंबई बनाम दिल्ली: दोहरे प्रशासनिक रवैये पर उठे सवाल
​इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह बहस भी छिड़ गई है कि दिल्ली और मुंबई में विरोध प्रदर्शनों को लेकर प्रशासन का रुख अलग-अलग क्यों है। प्रदर्शनकारियों और जानकारों का कहना है कि जहां दिल्ली में शांतिपूर्ण तरीके से जंतर-मंतर की ओर बढ़ रहे छात्रों को हिरासत में लिया जा रहा है, वहीं मुंबई में अन्य संगठनों को मंच लगाकर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की पूरी छूट दी जा रही है। इस असमानता को लेकर सोशल मीडिया और जमीनी स्तर पर तीखे सवाल उठाए जा रहे हैं।

​आगे की रणनीति: अदालती सुनवाई और विपक्षी दलों का बड़ा मार्च
​यह आंदोलन आने वाले दिनों में और अधिक व्यापक रूप लेने की ओर बढ़ रहा है। मतदाता सूची और एसआईआर से जुड़े विवादों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।

​इसके साथ ही, 'इंडिया' गठबंधन के सांसदों ने भी सड़क पर उतरने की घोषणा कर दी है। इसमें विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं के अलावा एनएसयूआई, एसएफआई और यूथ कांग्रेस जैसे छात्र व युवा संगठन शामिल होंगे। विपक्षी दल इस मुद्दे पर राष्ट्रपति से मिलने का समय मांगने और विजय चौक से राष्ट्रपति भवन तक मार्च निकालने की योजना भी बना रहे हैं। दूसरी ओर, विभिन्न नागरिक अधिकार संगठनों ने मांगें न माने जाने पर दिल्ली मार्च का अल्टीमेटम दे रखा है।

​जंतर-मंतर पर बना यह टकराव साफ संकेत दे रहा है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे का मामला अब एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक आंदोलन में तब्दील हो चुका है।

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