दिल्ली हाईकोर्ट की तल्ख टिप्पणी: 10 तारीख को पीस बॉन्ड भरा, 11 को तोड़ा; सौरभ दास और आशुतोष रांका को फटकार
दिल्ली हाईकोर्ट की ओर से कस्टडी और पीस बॉन्ड के उल्लंघन को लेकर आई तल्ख टिप्पणियों ने पार्टी के भविष्य और उसकी कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसी को लेकर द फेडरल के खास शो जनपथ में बात हुई।
हाल के महीनों में युवाओं और छात्रों के बीच एक मजबूत दबाव समूह (Pressure Group) के रूप में उभरी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) इस समय अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ और पेपर लीक मामलों को लेकर आक्रामक तेवर दिखाने वाली यह पार्टी अब अदालती कार्यवाहियों और कानूनी बंदिशों में पूरी तरह उलझ चुकी है।
पार्टी के दो प्रमुख चेहरे—सौरभ दास और आशुतोष रांका—पिछले एक हफ्ते से न्यायिक हिरासत में हैं। वहीं, पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके पुलिस द्वारा 'पीस बॉन्ड' (Peace Bond) साइन कराए जाने के बाद वापस महाराष्ट्र लौट चुके हैं। दिल्ली हाईकोर्ट की ओर से कस्टडी और पीस बॉन्ड के उल्लंघन को लेकर आई तल्ख टिप्पणियों ने पार्टी के भविष्य और उसकी कार्यप्रणाली पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इसी को लेकर द फेडरल के खास शो जनपथ में बात की एंकर मनीष कुमार ने बात के द फेडरव के पॉलिटिकल एडिटर पुनीत निकोलस यादव से।
पीस बॉन्ड की पाबंदी और आंदोलन पर असर
द फेडरल के पॉलिटिकल एडिटर पुनीत निकोलस यादव ने कहा, सीजेपी के प्रति जो अविश्वास पैदा हुआ है उसके नेताओं को अपने ऊपर भरोसा जगाने के लिए केवल आंदोलन का आह्वान नहीं बल्कि जमीन पर उतरकर आंदोलन में हिस्सा भी लेना होगा। सीजेपी के इन नेताओं पर आरोप लगते रहे हैं कि वे आंदोलन का आह्वान तो करते हैं लेकिन आंदोलन के समय आसानी से पुलिस हिरासत में ले लिए जाते हैं। जबकि दूसरे छात्रों को प्रदर्शनों के दौरान पुलिस के दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ता है।
कानूनी विश्लेषकों का मानना है कि किसी भी ऐसे संगठन या दल के लिए पीस बॉन्ड साइन करना बेहद नुकसानदेह साबित होता है, जिसकी पूरी नींव धरना-प्रदर्शन और सार्वजनिक विरोध पर टिकी हो। जब तक अदालत से इस पाबंदी पर कोई राहत नहीं मिलती, तब तक पार्टी का कोई भी बड़ा चेहरा न तो किसी विरोध प्रदर्शन में हिस्सा ले सकता है और न ही कोई राजनीतिक नारेबाजी कर सकता है।
सौरभ दास और आशुतोष रांका जहां हिरासत में हैं, वहीं अभिजीत दीपके की ओर से इस पीस बॉन्ड को चुनौती देने वाली कोई कानूनी याचिका फिलहाल दाखिल नहीं की गई है। केवल नेहा बोहरा की एक याचिका अदालत में लंबित बताई जा रही है। ऐसे में सवाल उठता है कि बिना सड़क पर उतरे और बिना आंदोलन किए कॉकरोच जनता पार्टी अपनी साख कैसे कायम रख पाएगी?
जमीन से गायब नेतृत्व और समर्थकों में बढ़ता अविश्वास
पिछले दो-तीन महीनों के घटनाक्रम पर नजर डालें तो कॉकरोच जनता पार्टी के प्रति उसके अपने समर्थकों और आलोचकों में एक तरह की निराशा देखने को मिली है। अक्टूबर के शुरुआती हफ्तों में आयोजित प्रदर्शनों के दौरान यह बात प्रमुखता से सामने आई कि पार्टी के शीर्ष नेता प्रदर्शन का आह्वान (Call for Protest) तो करते हैं, लेकिन जब धरातल पर पुलिसिया कार्रवाई का सामना करने का वक्त आता है, तो वे पहले से ही फ्लाइट्स या वीडियो संदेशों के जरिए अपनी संभावित हिरासत का ऐलान कर देते हैं।
दूसरी तरफ, उनके आह्वान पर पहुंचे हजारों युवा और छात्र सड़कों पर पुलिस की लाठियां खाते हैं, धक्का-मुक्की सहते हैं और बेहद बर्बर तरीके से बसों में भरकर डिटेन किए जाते हैं। नेतृत्व और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच का यह अंतर पार्टी की छवि को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। आलोचकों का कहना है कि सोशल मीडिया पर वीडियो बनाकर सहानुभूति बटोरने के बजाय नेताओं को जमीन पर उतरकर उस पुलिसिया कार्रवाई का सामना करना चाहिए जो उनके समर्थक सहते हैं।
राहुल गांधी, इंडिया गठबंधन और 'ट्रस्ट डेफिसिट'
परिचर्चा के दौरान विपक्षी एकता और कॉकरोच जनता पार्टी के बीच बने 'ट्रस्ट डेफिसिट' (अविश्वास) पर भी विस्तार से चर्चा हुई। जब राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के नेताओं ने चुनाव आयोग के खिलाफ 'सुप्रीम कोर्ट मार्च' और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों के साथ हाई-टी (High-Tea) का आयोजन किया, तो उसमें छात्र संगठनों के कई नेताओं को न्योता भेजा गया था।
सूत्रों के मुताबिक, इस दौरान CJP और अभिजीत दीपके से भी संपर्क साधकर उन्हें विपक्ष के संयुक्त मंच पर आने की अपील की गई थी, ताकि सभी प्रदर्शन एक ही साझा मुद्दे के तहत लड़े जा सकें। लेकिन CJP की ओर से इस पर कोई स्पष्ट प्रतिबद्धता नहीं दिखाई गई। यही वजह है कि जब सौरभ दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिया गया, तो कांग्रेस या किसी अन्य बड़े विपक्षी दल की ओर से उनके समर्थन में कोई कड़ा बयान जारी नहीं हुआ।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि CJP के नेताओं की अतीत की पृष्ठभूमि और आम आदमी पार्टी या अन्य राजनीतिक धड़ों के साथ उनके बदलते समीकरणों के कारण विपक्षी खेमे में एक हिचकिचाहट और अविश्वास बना हुआ है।
क्या जेल जाना तय करेगा अगला राजनीतिक सफर?
भारतीय राजनीति में एक पुराना दौर रहा है जहाँ जेल जाना या राजनीतिक उत्पीड़न सहना नेताओं के कद को और बड़ा बना देता है। जैसा कि परिचर्चा में जिक्र किया गया, पुलिसिया प्रक्रिया अपने आप में एक प्रकार का उत्पीड़न और सजा बन जाती है, जहाँ छोटी-छोटी तकनीकी वजहों से जमानत खारिज या कस्टडी एक्सटेंड की जाती है।
सौरभ दास और आशुतोष रांका के साथ हो रही इस कानूनी कड़ाई के बाद, एक बार फिर उनके प्रति जनता और युवा वर्ग में सहानुभूति की लहर देखने को मिल सकती है। जंतर-मंतर जैसी खुली जगह पर महज तिरंगा दिखाने या शांतिपूर्ण विरोध जताने पर जिस तरह की कठोर धाराएं या हिरासत की प्रक्रिया अपनाई जा रही है, उससे नागरिक समाज (Civil Society) और छात्र संगठनों में रोष बढ़ रहा है।
कॉकरोच जनता पार्टी ने पिछले कुछ महीनों में देश के युवाओं के मन से उस खौफ को निकालने में निसंदेह बड़ी भूमिका निभाई है, जो पिछले कई सालों से आंदोलनों के दमन के कारण बैठ गया था। लेकिन इस विश्वास को बनाए रखने के लिए अब केवल सोशल मीडिया कैंपेन या वीडियो क्लिप्स से काम नहीं चलेगा।
अगर CJP को अपना खोया हुआ विश्वास बहाल करना है और 1 नवंबर को होने वाले आगामी विपक्षी सम्मेलनों व आंदोलनों में अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करनी है, तो उसके नेताओं को कानूनी लड़ाइयों को मजबूती से लड़ते हुए सीधे मैदान में उतरना होगा। गेंद अब CJP और उसके नेतृत्व के पाले में है कि वे इस संकट को एक अवसर में बदलते हैं या अपने ही कानूनी जाल में उलझकर रह जाते हैं।
