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'एक तरफ राजघाट पर नमन, दूसरी तरफ छात्रों पर एक्शन': जानिए जंतर-मंतर से का आंखों देखा हाल

2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती के दिन राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर और मुंबई में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन देखने को मिला।


2 अक्टूबर यानी राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के पावन अवसर पर जहां एक तरफ पूरा देश बापू को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा था, वहीं दूसरी तरफ देश की राजधानी दिल्ली और देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर एक बड़ा राजनीतिक व सामाजिक संग्राम देखने को मिला। द फेडरल देश के खास कार्यक्रम 'जनपथ' में एंकर प्रदीप सहगल के साथ ग्राउंड पर मौजूद पत्रकारों मनीष कुमार और अभिषेक रावत ने लुटियंस दिल्ली और जंतर-मंतर के हालात का विस्तृत आंखों देखा हाल साझा किया।

ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग: 12 करोड़ वोटरों का मुद्दा

विरोध की मुख्य वजह स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया और मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली बनी है। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि SIR प्रक्रिया के नाम पर देश भर में लगभग 12 करोड़ से अधिक वैध मतदाताओं के नाम वोटर लिस्ट से गलत तरीके से हटा दिए गए हैं। इसे चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर बड़ा सवाल माना जा रहा है।

इसी मुद्दे को लेकर विभिन्न विपक्षी राजनीतिक दलों और प्रमुख छात्र संगठनों (Gen Z) ने 2 अक्टूबर को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था। मांग सिर्फ एक ही है—मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपने पद से तुरंत इस्तीफा दें और वोटर लिस्ट में हुई गड़बड़ियों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।

एक तरफ श्रद्धांजलि, दूसरी तरफ छात्रों पर पुलिस का एक्शन

2 अक्टूबर का दिन प्रतीकात्मक रूप से काफी महत्वपूर्ण रहा। एक तरफ प्रधानमंत्री, केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के तमाम नेता राजघाट जाकर महात्मा गांधी को नमन कर रहे थे और संसद भवन के सेंट्रल हॉल में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे थे, वहीं दूसरी तरफ जंतर-मंतर और पार्लियामेंट स्ट्रीट के आसपास युवा छात्र 'राइट टू वोट' और निष्पक्ष चुनाव की मांग को लेकर संघर्ष कर रहे थे।

'जनपथ' में चर्चा करते हुए वरिष्ठ पत्रकार मनीष कुमार ने बताया कि इस प्रदर्शन में शामिल होने वाले छात्र केवल दिल्ली-एनसीआर तक सीमित नहीं थे। केरल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पंजाब जैसे सुदूर राज्यों से छात्र संगठन और युवा दिल्ली पहुंचे थे। पुलिस की सख्त नाकेबंदी और बदसलूकी के बावजूद जेन जी (Gen Z) के इन युवाओं ने अपनी आवाज बुलंद की।

छापेमारी की तर्ज पर पहुंचे छात्र, फूली दिल्ली पुलिस की सांसें

20 जुलाई की पिछली घटनाओं से सबक लेते हुए दिल्ली पुलिस ने इस बार पूरे लुटियंस जोन को किले में तब्दील कर दिया था। रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) और आर्म्ड सिक्योरिटी फोर्सेस को बैकअप पर रखा गया था और खुद दिल्ली पुलिस फ्रंट फुट पर सुरक्षा व्यवस्था संभाल रही थी। पुलिस का मुख्य उद्देश्य था कि किसी भी सूरत में भीड़ को जंतर-मंतर के मुख्य मंच तक न पहुंचने दिया जाए।

हालांकि, प्रदर्शनकारी छात्रों की रणनीति ने सुरक्षा तंत्र को चौंका दिया। छात्र किसी बड़े जुलूस के रूप में आने के बजाय छोटे-छोटे गुटों में अचानक अलग-अलग दिशाओं से जंतर-मंतर और संसद मार्ग की ओर पहुंचने लगे। अचानक हुए इस घटनाक्रम से पुलिस प्रशासन को तुरंत अतिरिक्त व्यवस्था करनी पड़ी और जो भी छात्र झंडे या तख्तियां लेकर आगे बढ़ता, उसे उठाकर डीटीसी की बसों में भरकर हिरासत में ले जाया जाने लगा।

क्या इस आंदोलन से बैकफुट पर आएगी सरकार?

दिल्ली पुलिस की सख्त कार्रवाई और दर्जनों नेताओं व छात्रों को हिरासत में लिए जाने के बावजूद, इस आंदोलन ने एक बड़ा राजनीतिक संदेश दे दिया है। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था पर इतने बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम काटने का आरोप लगना और युवाओं का इसके खिलाफ सड़क पर उतरना आने वाले दिनों में चुनावी राजनीति की दिशा तय कर सकता है।

'जनपथ' शो में सभी ने स्पष्ट किया कि 2 अक्टूबर से शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन यहीं थमने वाला नहीं है। आने वाले हफ्तों में यह आंदोलन और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं, जिससे सरकार और चुनाव आयोग दोनों पर पारदर्शिता सुनिश्चित करने का भारी दबाव बनेगा।

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