दिल्ली की सड़कों पर हाई-वोल्टेज ड्रामा, ECI के खिलाफ प्रदर्शन से क्यों गायब रहे अखिलेश यादव?
दिल्ली में चुनाव आयोग के दफ्तर और सड़कों पर मचा यह राजनीतिक घमासान सिर्फ एक प्रशासनिक संस्था के खिलाफ विरोध नहीं है, बल्कि इसके पीछे 2026 और आने वाले चुनावों के लिए राज्यों में वर्चस्व कायम करने की एक बड़ी राजनीतिक बिसात भी बिछाई जा रही है।
राजधानी दिल्ली में लगातार दूसरे दिन सियासी तापमान अपने चरम पर नजर आया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार, वोटर लिस्ट में गड़बड़ियों और स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया के खिलाफ इंडिया अलायंस के सांसदों ने सड़कों पर उतरकर जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। द फेडरल देश के खास शो 'जनपथ' में एंकर मनीष कुमार, द फेडरल के रिपोर्टर अभिषेक रावत और वरिष्ठ पत्रकार नवीन निगम ने इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम के पीछे के सियासी समीकरणों की परतें खोलीं।
लंच से जंतर-मंतर मार्च और फिर हिरासत
कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए एंकर मनीष कुमार ने बताया कि किस तरह संसद मार्ग के बाद अचानक कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने इंडिया ब्लॉक के सांसदों को जनपथ स्थित 'सागर रत्ना' रेस्तरां में लंच पर आमंत्रित किया। लंच खत्म होते ही राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और विपक्ष के तमाम सांसदों ने जंतर-मंतर की ओर पैदल मार्च शुरू कर दिया। अभिषेक रावत ने स्थिति की जानकारी देते हुए बताया कि दिल्ली पुलिस ने पूरे रास्ते को बैरिकेडिंग करके सील कर रखा था। सांसदों को जंतर-मंतर जाने से रोकने के लिए पुलिस ने पहले से ही बसें मंगवा रखी थीं। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत कई वरिष्ठ नेताओं को हिरासत में लेकर किंग्सवे कैंप स्थित न्यू पुलिस लाइंस ले जाया गया। गौरतलब है कि पिछले 24 घंटों में यह दूसरा मौका है जब राहुल गांधी और प्रियंका गांधी को पुलिस ने हिरासत में लिया है। इससे पहले आकाशवाणी भवन में करीब 8 घंटे के धरने के बाद भी उन्हें रात में हिरासत में लिया गया था।
सपा की दूरी और इंडिया अलायंस में दरार के संकेत?
शो के दौरान वरिष्ठ पत्रकार नवीन निगम ने इस पूरे घटनाक्रम के रणनीतिक पहलुओं पर रोशनी डाली। उन्होंने एक अहम पहलू की ओर ध्यान दिलाया कि इस पूरे प्रदर्शन और खड़गे के लंच से समाजवादी पार्टी (सपा) के प्रमुख चेहरे और सांसद नदारद रहे। हालांकि, कांग्रेस नेता जयराम रमेश का कहना था कि रणनीति अचानक तैयार होने के कारण सभी तक सूचना देर से पहुंची। लेकिन नवीन निगम का मानना है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति के नजरिए से यह काफी अहम है। आगामी यूपी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और सपा के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर खींचतान तय मानी जा रही है। ऐसे में कांग्रेस इस तरह के आक्रामक आंदोलनों के जरिए राहुल गांधी का चेहरा आगे कर गठबंधन में अपना पलड़ा भारी (अपर हैंड) करना चाहती है। वरिष्ठ पत्रकार ने विश्लेषण करते हुए कहा, "अखिलेश यादव यूपी में बीजेपी के सामने सबसे बड़ा चेहरा हैं। अगर उनके समानांतर राहुल गांधी की छवि को ज्यादा उभारा जाता है, तो इससे सपा को साइडलाइन करने की रणनीति भी दिखती है। अखिलेश यादव आसानी से कांग्रेस को 100-110 सीटें देने के मूड में नहीं होंगे, इसलिए कांग्रेस सड़कों पर उतरकर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है।'
जनता से जुड़े मुद्दों से भटकाव तो नहीं?
नवीन निगम ने विपक्षी रणनीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि महात्मा गांधी के दौर से लेकर अब तक सत्याग्रह और आंदोलनों की एक तय परंपरा रही है। अचानक बिना पूर्व सूचना के इस तरह से सड़कों पर उतरना या गुप्त रणनीतियां बनाना लोकतांत्रिक आंदोलनों के स्वभाव से मेल नहीं खाता। उन्होंने यह भी अंदेशा जताया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार या ईवीएम जैसे जटिल मुद्दे गांव-देहात के आम मतदाताओं के लिए आसानी से समझने योग्य नहीं हैं। जिस तरह 2019 में 'चौकीदार चोर है' या राफेल का मुद्दा जनता के बीच उस तरह से प्रभाव नहीं छोड़ पाया था, ठीक उसी तरह चुनाव आयोग का मुद्दा भी कहीं विपक्ष के लिए ही उलटा न पड़ जाए। महंगाई, बेरोजगारी या गरीबी जैसे टिकाऊ मुद्दों के बजाय इस तरह के तकनीकी मुद्दों पर पूरा जोर लगाना विपक्ष को अपने ही बिछाए जाल में फंसा सकता है।
राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और मीडिया की सुर्खियां
रिपोर्टर अभिषेक रावत ने कहा कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप), सीजेपी और कांग्रेस के बीच भी एक तरह की होड़ दिखाई दे रही है कि चुनाव आयोग के खिलाफ कौन सा दल ज्यादा आक्रामक तरीके से अगुवाई करता है। पंजाब और दिल्ली में आप और कांग्रेस के बीच सीधी जंग है, जिसके कारण राष्ट्रीय स्तर पर एक साथ दिखने के बावजूद जमीनी स्तर पर तालमेल की कमी साफ नजर आ रही है। कुल मिलाकर, दिल्ली में चुनाव आयोग के दफ्तर और सड़कों पर मचा यह राजनीतिक घमासान सिर्फ एक प्रशासनिक संस्था के खिलाफ विरोध नहीं है, बल्कि इसके पीछे 2026 और आने वाले चुनावों के लिए राज्यों में वर्चस्व कायम करने की एक बड़ी राजनीतिक बिसात भी बिछाई जा रही है।
