महंगे Crude का झटका: भारत का तेल आयात बिल 48% बढ़ा
x

महंगे Crude का झटका: भारत का तेल आयात बिल 48% बढ़ा

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और घरेलू उत्पादन में गिरावट ने भारत के ऊर्जा आयात खर्च पर दबाव बढ़ाया है।


अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का सीधा असर भारत के आयात खर्च पर दिखाई दे रहा है। चालू वित्त वर्ष 2026-27 के पहले पांच महीनों यानी अप्रैल से अगस्त के बीच भारत का कच्चा तेल आयात बिल सालाना आधार पर 48.4 फीसदी बढ़कर 74.8 अरब डॉलर पहुंच गया। खास बात यह है कि इस दौरान भारत ने कच्चे तेल का आयात मात्रा के लिहाज से बढ़ाया नहीं, बल्कि इसमें मामूली गिरावट दर्ज हुई है।

कम तेल आयात, फिर भी ज्यादा खर्च
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल यानी PPAC के आंकड़ों के मुताबिक, अप्रैल-अगस्त में भारत ने 100.7 मिलियन मीट्रिक टन कच्चा तेल आयात किया। पिछले साल इसी अवधि में यह आंकड़ा 101.1 मिलियन मीट्रिक टन था। यानी आयात की मात्रा करीब 0.4 फीसदी घटी, लेकिन भारत को पिछले साल के मुकाबले 24.4 अरब डॉलर ज्यादा खर्च करने पड़े। रुपये में कच्चे तेल के आयात पर खर्च 62 फीसदी बढ़कर 7 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा हो गया।

अंतरराष्ट्रीय कीमतों ने बढ़ाया दबाव
इस बढ़े हुए बिल की सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की ऊंची कीमतें हैं। अगस्त में भारतीय क्रूड बास्केट की औसत कीमत 90.19 डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि अगस्त 2025 में यह 69.11 डॉलर थी। सितंबर में कीमतों में और तेजी आई। 2 सितंबर को भारतीय क्रूड बास्केट 99.35 डॉलर प्रति बैरल था, जो 18 सितंबर को बढ़कर 123.86 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया। पश्चिम एशिया में तनाव और तेल की सप्लाई बाधित होने की आशंका को कीमतों में तेजी की प्रमुख वजह माना जा रहा है।

आयात पर निर्भरता अब भी बड़ी चुनौती
भारत अपनी जरूरत के कच्चे तेल के लिए बड़े पैमाने पर विदेशों पर निर्भर है। अप्रैल से अगस्त के दौरान देश की क्रूड इम्पोर्ट डिपेंडेंसी 88.1 फीसदी रही। इसी अवधि में घरेलू कच्चे तेल का उत्पादन भी 11.9 मिलियन मीट्रिक टन से घटकर 11.4 मिलियन मीट्रिक टन रह गया।

व्यापार घाटे पर भी असर
महंगा तेल देश के कुल आयात बिल पर भी दबाव बढ़ा रहा है। अप्रैल-अगस्त में भारत के कुल वस्तु आयात में पेट्रोलियम की हिस्सेदारी बढ़कर 22.5 फीसदी हो गई। इसी अवधि में व्यापार घाटा पिछले साल के 123.9 अरब डॉलर से बढ़कर 147.1 अरब डॉलर पहुंच गया। ऐसे में अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं, तो भारत के ऊर्जा आयात खर्च और बाहरी खाते पर दबाव बना रह सकता है।

Read More
Next Story