सोनम वांगचुक के अनशन का 18वां दिन, मोदी सरकार की रहस्यमयी चुप्पी
'जनपथ' में बात अनशन की जिसमें 9 किलो वजन घटने के बाद भी सोनम वांगचुक डटें हुए हैं; सीजेपी के आंदोलन पर कांग्रेस की खामोशी के पीछे अन्ना आंदोलन का डर।
Janpath: राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर बड़े सियासी और सामाजिक आंदोलन का अखाड़ा बन चुका है। 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) का धरना प्रदर्शन जहां 20 जून से लगातार जारी है, वहीं लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची (6th Schedule) में शामिल करने और नीट (NEET) पेपर लीक मामले में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर दिग्गज पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक पिछले 28 जून से आमरण अनशन पर बैठे हैं।
'द फेडरल देश' के शो 'जनपथ' में एंकर मनीष कुमार ने इस आंदोलन की जमीनी हकीकत, सरकार की रहस्यमयी खामोशी और विपक्ष की दोहरी रणनीति को लेकर द फेडरल के पॉलिटिकल एडिटर पुनीत निकोलस यादव और वरिष्ठ पत्रकार गणपति सुब्रमण्यम के साथ एक विस्तृत और खोजी समीक्षा पेश की।
18 दिनों में 9 किलो वजन घटा, वांगचुक की स्थिति बेहद नाजुक
एंकर मनीष कुमार ने शो की शुरुआत में सोनम वांगचुक की बिगड़ती सेहत पर गहरी चिंता व्यक्त की। अनशन के 18वें दिन उनका स्वास्थ्य बुलेटिन बेहद डरावना है; उनका वजन करीब 9 किलो घट चुका है, ब्लड प्रेशर लगातार गिर रहा है और उन्हें गंभीर 'मसल लॉस' (Muscle Loss) की शिकायत आ रही है। वांगचुक के साथ बैठे छह अन्य अनशनकारियों में से दो की हालत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है, जबकि चार अब भी मोर्चे पर डटे हैं। इस बिगड़ती स्थिति पर अब बॉलीवुड सितारों से लेकर देश के राजनेता भी सोशल मीडिया पर चिंता जाहिर कर रहे हैं।
मोदी सरकार की 'नो डायलॉग' नीति और अन्ना आंदोलन जैसी चूक
पॉलिटिकल एडिटर पुनीत निकोलस यादव ने शो में बड़ा विश्लेषण देते हुए कहा कि जो कोई भी यह सोच रहा है कि आमरण अनशन के दबाव में आकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ले लेंगे, वे इस सरकार के पिछले 12 साल के काम करने के तरीके से वाकिफ नहीं हैं।
पुनीत यादव ने कहा:
"यह वही सरकार है जिसने ऐतिहासिक किसान आंदोलन के दौरान सैकड़ों किसानों की मौत के बावजूद महीनों तक कोई सीधी बातचीत या दया नहीं दिखाई। ऐसे में यह सोचना कि सरकार खुद चलकर जंतर-मंतर आएगी या किसी बड़े मंत्री को भेजेगी, आंदोलनकारियों की एक बड़ी रणनीतिक भूल साबित हो सकती है।"
राहुल गांधी की खामोशी और विपक्ष के मन में 'अन्ना आंदोलन' का डर
शो में इस बात पर भी गहन चर्चा हुई कि आख़िर लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी इस आंदोलन से दूरी क्यों बनाए हुए हैं? पुनीत यादव ने अंदरूनी सूत्रों के हवाले से खुलासा किया कि कांग्रेस और विपक्ष के कई दलों को सीजेपी (CJP) और इसके प्रमुखों (जैसे अभिजीत दिपके, आशुतोष राका, विजेता दहिया) के बैकग्राउंड को लेकर गंभीर शंकाएं हैं। ये सभी लोग पूर्व में आम आदमी पार्टी (AAP) से जुड़े रहे हैं।
विपक्ष के मन में यह गहरा डर समाया हुआ है कि कहीं वे अनजाने में साल 2011 के अन्ना हजारे के 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' (IAC) जैसे किसी नए मोर्चे को खाद-पानी न दे बैठें, जिसने बाद में कांग्रेस को सत्ता से बेदखल कर दिया था। इसके अलावा, कांग्रेस का मानना है कि नीट के मुद्दे पर वे देश भर में खुद 'छात्रों की गूंज' जैसी रैलियां कर रहे हैं, ऐसे में वे इस मुद्दे का राजनीतिक क्रेडिट किसी सोशल मीडिया आधारित सटायर प्लेटफॉर्म (CJP) को क्यों दें? हालांकि, वांगचुक की हालत बिगड़ने पर हाल ही में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी, सपा सांसद प्रिया सरोज और कांग्रेस सांसद प्रशांत पडोले ने जंतर-मंतर जाकर एकजुटता दिखाई है।
20 तारीख को मानसून सत्र: एस्केलेशन या क्रैकडाउन? जंतर-मंतर पर 'क्रैप पुलिंग' गायब
जंतर-मंतर का आंखों देखा हाल बयां करते हुए वरिष्ठ पत्रकार गणपति सुब्रमण्यम ने कहा कि 2011 में अन्ना हजारे के अनशन के समय उमड़ने वाली हजारों की बेकाबू भीड़ और चौबीसों घंटे चलने वाला मीडिया तामझाम इस बार नदारद है। सीजेपी के धरने में केवल 300 से 500 कमिटेड लोग ही दिख रहे हैं, बाकी लोग सिर्फ फोटो खिंचाने और घूमने आ रहे हैं। भीड़ न जुटना ही सरकार की बेरुखी का सबसे बड़ा कारण है।
गणपति सर ने आने वाले दिनों के लिए बड़ी चेतावनी दी:
"20 तारीख (अगले हफ्ते) से संसद का मानसून सत्र शुरू होने जा रहा है। आंदोलनकारियों ने उसी दिन जंतर-मंतर से संसद भवन तक मार्च निकालने का एलान किया है, जिससे माहौल में भारी एस्केलेशन (तनाव) देखने को मिल सकता है। दूसरी तरफ, उमर अब्दुल्ला ने भी 20 तारीख को ही जम्मू-कश्मीर के स्टेटहुड को लेकर जंतर-मंतर पर विपक्ष के बड़े प्रदर्शन का न्योता दिया है।"
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार धारा 144 का हवाला देकर मानसून सत्र शुरू होने से एक-दो दिन पहले ही जंतर-मंतर से सीजेपी का परमिशन वापस ले सकती है और पहलवानों के आंदोलन की तरह यहां भी बड़ा क्रैकडाउन (पुलिसिया कार्रवाई) देखने को मिल सकता है।
क्या भटक गया असली मुद्दा?
शो के अंत में मनीष कुमार और पुनीत यादव ने निष्कर्ष निकाला कि इस पूरे सियासी और व्यक्तिगत घमासान में नीट (NEET) पेपर लीक, एनटीए (NTA) की गड़बड़ियां और छात्रों की आत्महत्याओं जैसे मूल और गंभीर मुद्दे पूरी तरह पीछे छूट गए हैं। अब पूरा ध्यान केवल धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे, सोनम वांगचुक की सेहत और राहुल गांधी की गैर-हाजिरी पर आकर टिक गया है, जो किसी भी बड़े जन-आंदोलन की विफलता की ओर इशारा करता है।
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