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श्रीनि से संवाद: अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के ऐतिहासिक नतीजे और भारत के लिए इसके सियासी मायने

अमेरिका में हुए मध्यावधि चुनावों (Midterm Elections) में डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को मिली करारी शिकस्त का विश्लेषण करती है। 'द फेडरल देश' के कार्यक्रम "श्रीनी से संवाद" में एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन ने बताया कि बढ़ती महंगाई, ईंधन की उच्च दरें, ईरान के साथ तनाव, कड़े वीज़ा नियम और शिक्षा-स्वास्थ्य बजट में कटौती के कारण अमेरिकी जनता ने ट्रंप को नकार दिया है।


अमेरिका के राजनीतिक मंच से एक ऐसा ऐतिहासिक जनादेश सामने आया है जिसने न केवल वाशिंगटन की सत्ता का गणित बदल दिया है, बल्कि पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है। राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के दो साल के भीतर ही डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी को मध्यावधि चुनाव (Midterm Elections) में करारी हार का सामना करना पड़ा है। इस चुनाव परिणाम के बाद यह सवाल उठने लगा है कि क्या डोनाल्ड ट्रंप अब अगले दो वर्षों के लिए एक बेहद कमजोर या ‘लेम डक’ (Lame Duck) राष्ट्रपति बनकर रह जाएंगे?

'द फेडरल देश' के खास कार्यक्रम "श्रीनि से संवाद" में 'द फेडरल' के एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन और मनीष कुमार ने इस ऐतिहासिक चुनाव परिणाम, इसके मुख्य कारणों और भारत पर पड़ने वाले इसके दूरगामी प्रभावों का विस्तार से विश्लेषण किया।

आखिर दो साल में ही क्यों बदला अमेरिकी जनता का मूड?

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में जिन वादों के सहारे जनता का समर्थन जुटाया था, दूसरे कार्यकाल में स्थिति काफी अलग रही। अमरीकी जनता आमतौर पर अपने नेताओं के वादों को याद रखती है। ट्रंप ने चुनाव के दौरान वादा किया था कि वे अमेरिकी अर्थव्यवस्था को मजबूत करेंगे और देश को किसी भी नए विदेशी युद्ध में नहीं धकेलेंगे। लेकिन सत्ता में आने के बाद नीतियां इसके विपरीत नजर आईं।

महंगाई और ईंधन के दाम (Cost of Living & Fuel Prices):

अमेरिकी चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा 'कॉस्ट ऑफ लिविंग' यानी जीवन यापन की लागत रहा। ट्रंप काल के दौरान महीनों तक पेट्रोल और डीजल के दाम $4 प्रति गैलन से ऊपर बने रहे। अमेरिका में ईंधन के दामों का सीधा असर आम नागरिक के बजट पर पड़ता है। ट्रैक्टर चलाने वाले किसानों से लेकर सामान की आपूर्ति करने वाले ट्रक चालकों तक, सब बढ़ती लागत से बेहाल हो गए।

ईरान के साथ तनाव और विदेश नीति:

शांति और व्यापार का वादा करके सत्ता में आए ट्रंप ने ईरान के साथ युद्ध जैसी स्थिति पैदा कर दी। इस कदम का कोई ठोस व तार्किक आधार अमेरिकी जनता के सामने नहीं आ सका, जिससे मतदाताओं के बीच यह संदेश गया कि सरकार अपनी प्राथमिकताओं से भटक रही है।

कठोर आव्रजन (Immigration) और वीज़ा नीतियां:

इमिग्रेशन कंट्रोल (ICE) जैसी एजेंसियों के अत्यधिक सख्त रवैये ने भी लोगों में आक्रोश पैदा किया। वीज़ा नियमों (जैसे H-1B वीज़ा) में भारी कड़ाई और $1,000,000 (एक लाख डॉलर) जैसी न्यूनतम शर्तों ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों और विदेशी कर्मचारियों के लिए मुश्किलें खड़ी कर दीं। इसका असर अमेरिका में बसे भारतीय, एशियन और लैटिन अमेरिकी समुदायों पर भी पड़ा।

स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में कटौती:

ओबामाकेयर (ObamaCare) जैसी सार्वभौमिक स्वास्थ्य सेवाओं को वापस लेने के प्रयासों और हार्वर्ड जैसे प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों के सरकारी फंड में कटौती से युवाओं और मध्यम वर्ग में गहरी नाराजगी फैली।

धनबल और वीटो पावर का चक्रव्यूह

अमेरिकी चुनावों में इस बार उद्योगपतियों और अरबपतियों द्वारा पानी की तरह पैसा बहाया गया। उदाहरण के तौर पर, एलन मस्क जैसे दिग्गज उद्योगपतियों ने इस चुनाव अभियान में $200 से $400 मिलियन डॉलर तक खर्च किए। इसके अलावा, ट्रंप प्रशासन पर कई तरह के कमर्शियल कन्फ्लिक्ट (व्यापारिक लाभ) और करप्शन के आरोप भी लगे।

चुनाव परिणाम आते ही ट्रंप ने अपनी रणनीति बदलते हुए वीटो (Veto) पावर का संकेत देने वाली टोपी पहनी। अमेरिका के राष्ट्रपति के पास असीमित शक्तियां और वीटो अधिकार होते हैं, लेकिन जब प्रतिनिधि सभा (Congress) में विरोधी पक्ष (डेमोक्रेट्स) का वर्चस्व बढ़ जाता है, तो राष्ट्रपति के लिए अपनी मनमर्जी से कानून बनाना बेहद कठिन हो जाता है। सन 2027 में ट्रंप को कई विधायी और आर्थिक फैसलों के लिए संसद के पास जाना होगा, जहाँ डेमोक्रेटिक प्रतिनिधि उनके रास्ते में बड़ी रुकावटें पैदा कर सकते हैं।

भारत और वैश्विक व्यापार पर क्या पड़ेगा असर?

भारत के नजरिए से यह बदलाव काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है:

टैरिफ वॉर पर लगाम: ट्रंप प्रशासन द्वारा भारत पर मनमाने ढंग से 10% का अतिरिक्त टैरिफ या सेक्शन 301/स्पेशल 301 के तहत कड़े व्यापारिक प्रतिबंध लगाने की एकतरफा नीति पर अब लगाम लग सकती है।

नेगोशिएशन में भारत का मजबूत पलड़ा: संसद और विभिन्न संसदीय कमेटियों में डेमोक्रेट्स की मजबूती के कारण अब दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौतों (Bilateral Trade Deals) में अधिक पारदर्शिता आने की उम्मीद है। भारत अब अधिक मजबूती से अपनी शर्तें (जैसे कृषि व औद्योगिक क्षेत्रों के संरक्षण) रख सकेगा।

भारतीय बाज़ारों का सकारात्मक रुख: भारतीय शेयर बाज़ारों ने भी अमेरिकी मध्यावधि चुनाव के नतीजों को सकारात्मक रूप से लिया है, क्योंकि अनिश्चित ट्रेड वॉर की संभावना अब कम हो गई है।

वैश्विक लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा सबक

यह चुनाव सिर्फ अमेरिका तक सीमित नहीं है। ब्राजील से लेकर इजराइल, फ्रांस और इटली तक, जहाँ दक्षिणपंथी या जनलोभावन राजनीति का जोर देखा जा रहा था, वहाँ अमेरिकी मध्यावधि चुनावों ने एक स्पष्ट संदेश दिया है—"लोकतंत्र में अंतिम मालिक जनता ही होती है।"

चाहे कितना भी धनबल हो, राजनीतिक रैलियाँ हों या बड़े-बड़े दावों का प्रचार हो, अंततः जनता अपने बुनियादी मुद्दों—'रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य और रोज़गार' पर ही वोट देती है। जब सरकारें आम जनता की जेब पर पड़ने वाले बोझ को नजरअंदाज करती हैं, तो जनादेश सत्ता परिवर्तन का रास्ता साफ कर देता है।

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