पीके के करीबियों ने थामा कमल; बांकीपुर उपचुनाव में बढ़ी भाजपा की ताकत!
बांकीपुर उपचुनाव से पहले जन सुराज के के.सी. सिन्हा सहित कई बड़े चेहरों ने बदला पाला; जानिए इस दल-बदल से भाजपा को कितना फायदा और पीके को कितना नुकसान होगा।
Nishpaksh: बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर होने वाला उपचुनाव बेहद दिलचस्प और पेचीदा होता जा रहा है। 'द फ़ेडरल देश' के शो निष्पक्ष में एंकर नीलू व्यास ने इस गरमाए राजनीतिक मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की। इस विशेष डिबेट में बिहार के राजनीतिक विश्लेषक गगन गौरव और वरिष्ठ पत्रकार फैजान अहमद ने बतौर अतिथि शामिल होकर अपने विचार साझा किए।
जन सुराज को लगा बड़ा झटका
एंकर नीलू व्यास ने चर्चा की शुरुआत करते हुए बताया कि बांकीपुर उपचुनाव से ठीक पहले प्रशांत किशोर को एक बड़ा झटका लगा है। उनके कई करीबी सहयोगियों ने जन सुराज का साथ छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थाम लिया है।
इसमें सबसे प्रमुख नाम प्रोफेसर के.सी. सिन्हा का है, जो 2025 के चुनाव में बांकीपुर से जन सुराज के उम्मीदवार रहे थे। उनके साथ दीघा विधानसभा क्षेत्र से पूर्व प्रत्याशी बिट्टू सिंह और मनेर से पूर्व प्रत्याशी गोपाल सिंह भी भाजपा में शामिल हो गए हैं। भाजपा के प्रदेश महासचिव संजय सरावगी ने इन सभी को पार्टी की सदस्यता दिलाई।
अतिथियों के विचार और चर्चा का विश्लेषण
1. गगन गौरव (राजनीतिक विश्लेषक) का दृष्टिकोण:
बिहार के राजनीतिक विश्लेषक गगन गौरव ने बांकीपुर के चुनावी समीकरणों और जन सुराज की स्थिति पर अपनी राय रखी:
रणनीतिक झटका: गौरव ने माना कि इन प्रमुख चेहरों का भाजपा में जाना प्रशांत किशोर के लिए एक तात्कालिक झटका है। प्रोफेसर के.सी. सिन्हा और बिट्टू सिंह के क्षेत्रों (कुम्हारार और दीघा) की सीमाएं बांकीपुर से सटी हुई हैं।
कम वोटिंग प्रतिशत का गणित: बांकीपुर सीट पर पारंपरिक रूप से बहुत कम मतदान (लगभग 40-41%) होता रहा है। पिछले चुनाव में भाजपा को कुल मतदाताओं का मात्र 25% वोट मिला था, जिसके दम पर वे जीते थे।
भाजपा के लिए चुनौती: प्रशांत किशोर की जमीन पर लगातार मेहनत और रैलियों के कारण भाजपा भी खुद को थोड़ा फंसा हुआ महसूस कर रही है। यदि इस उपचुनाव में वोटिंग का प्रतिशत 65 से 70% तक बढ़ता है, तो भाजपा के लिए कड़ी चुनौती खड़ी होगी। हालांकि, मतदान कम रहने पर भाजपा सुरक्षित रह सकती है।
त्रिकोणीय मुकाबला: फिलहाल इस लड़ाई में आरजेडी (RJD) भी रेस में दिख रही है। लेकिन चुनाव नजदीक आने तक यह मुकाबला सीधे तौर पर भाजपा बनाम प्रशांत किशोर (जन सुराज) के बीच केंद्रित होने की संभावना है।
2. फैजान अहमद (वरिष्ठ पत्रकार) का दृष्टिकोण:
वरिष्ठ पत्रकार फैजान अहमद ने भाजपा की रणनीति और उम्मीदवारों के चयन पर गहरा विश्लेषण प्रस्तुत किया:
भाजपा की गंभीर रणनीति: फैजान अहमद ने कहा कि इस घटनाक्रम से साफ है कि भाजपा अब बांकीपुर उपचुनाव को बहुत गंभीरता से ले रही है। पहले वे प्रशांत किशोर को हल्के में ले रहे थे क्योंकि उन्होंने कभी कोई चुनाव नहीं लड़ा था।
डैमेज कंट्रोल की कोशिश: भाजपा के पूर्व उम्मीदवार अखिलेश सिंह के मैदान से हटने के बाद पार्टी को जो नुकसान हुआ था, के.सी. सिन्हा जैसे प्रतिष्ठित चेहरों को शामिल करके भाजपा उसी 'डैमेज' को पाटने (Undo करने) की कोशिश कर रही है।
गैर-राजनीतिक चेहरा: प्रोफेसर के.सी. सिन्हा मूल रूप से एक शिक्षाविद हैं, राजनेता नहीं। समाज में उनकी एक अलग प्रतिष्ठा है। भाजपा उन्हें अपने पाले में लाकर कायस्थ वोटों का ध्रुवीकरण करना चाहती है।
प्रतिष्ठा की लड़ाई: फैजान के अनुसार, यह सिर्फ एक सामान्य उपचुनाव नहीं है, बल्कि यह दोनों पक्षों के लिए 'प्रतिष्ठा की लड़ाई' (Prestige Fight) बन चुका है। प्रशांत किशोर के पास यहाँ खोने के लिए कुछ नहीं है, क्योंकि वे पिछले चुनाव में लगभग सब कुछ हार चुके हैं। अगर वे यहाँ जीतते हैं, तो यह उनके लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।
शो के अंत में एंकर नीलू व्यास ने रेखांकित किया कि बांकीपुर का यह उपचुनाव पल-पल करवट बदल रहा है। प्रशांत किशोर के करीबियों के भाजपा में जाने से चुनावी मुकाबला और भी रोमांचक हो गया है। अब देखना होगा कि अगले 15 दिनों में ऊँट किस करवट बैठता है।

