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BRICS 2026: क्या ब्रिक्स देशों के लिए अमेरिका का 'मुखबिर' बन गया भारत?

दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन शुरू। शो 'निष्पक्ष' में जानिए कैसे अमेरिका का H-1B वीज़ा संकट और ब्रिक्स में 'ट्रोजन हॉर्स' की छवि भारत के लिए बड़ी चुनौती है।


Nishpaksh: राजधानी नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को होने जा रहे ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन ने वैश्विक कूटनीति का तापमान बढ़ा दिया है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन तय समय से पहले दिल्ली पहुंच चुके हैं और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के साथ उनकी अहम द्विपक्षीय वार्ताएं जारी हैं। वहीं, सात साल बाद चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग महज़ 24 घंटे के लिए भारत आ रहे हैं।


लेकिन इस कूटनीतिक जमावड़े के पीछे की ज़मीनी हकीकत बेहद तनावपूर्ण है। एक तरफ अमेरिका और ईरान के बीच भीषण युद्ध छिड़ा है, तो दूसरी तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की धमकियों ने भारत के लिए 'दो नावों की सवारी' को नामुमकिन बना दिया है। 'द फ़ेडरल देश' के खास शो 'निष्पक्ष' में एंकर नीलू व्यास और अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ संजय कपूर ने इस जटिल भू-राजनीतिक चक्रव्यूह का कड़ा विश्लेषण किया।

आइए समझते हैं कि इस ब्रिक्स सम्मेलन में भारत के सामने असल चुनौतियां क्या हैं और क्यों भारत को ब्रिक्स देशों के बीच एक 'मुखबिर' (Trojan Horse) की नज़र से देखा जा रहा है:

1. ट्रम्प का 'ऑपरेशन आउटकास्ट' और H-1B वीज़ा का हंटर
अमेरिका ने 2 सितंबर को ईरान को पूरी तरह अलग-थलग करने के लिए 'ऑपरेशन आउटकास्ट' (Operation Outcast) शुरू किया है। अमेरिका की सीधी चेतावनी है कि जो भी ईरान से व्यापार करेगा, उस पर पाबंदियां लगेंगी।

भारत की बगावत: रूस और चीन के समर्थन के कारण भारत ने अमेरिका की परवाह किए बिना ईरान को जीवनरक्षक दवाइयों की सप्लाई जारी रखी है।

अमेरिका का पलटवार: जवाब में ट्रम्प प्रशासन ने भारत पर दबाव बनाने के लिए H-1B वीज़ा का ग्रेस पीरियड घटाकर 60 दिन कर दिया है। अमेरिका में 50 लाख से ज़्यादा भारतीय हैं। "Mr. Singh leave the road" जैसे विज्ञापनों के ज़रिए वहां अप्रवासियों के खिलाफ नफरत का माहौल बनाया जा रहा है। संजय कपूर के अनुसार, अगर वीज़ा नियम और सख्त हुए, तो हज़ारों भारतीय प्रोफेशनल्स को रातों-रात बेघर होकर वापस लौटना पड़ सकता है, जो भारत के लिए एक बहुत बड़ा संकट होगा।

2. ब्रिक्स में 'ट्रोजन हॉर्स' (मुखबिर) की छवि और इज़राइल प्रेम
ब्रिक्स देशों (खासकर रूस और चीन) को भारत पर पूरा भरोसा नहीं है।

कूटनीतिक असमंजस: जब ईरान पर युद्ध शुरू हुआ था, उसके ठीक पहले पीएम मोदी इज़राइल दौरे पर गए थे। इससे ब्रिक्स देशों में यह संदेश गया कि भारत, अमेरिका और इज़राइल के पाले में खड़ा है। पिछले रियो डि जेनेरियो ब्रिक्स सम्मेलन में एक ब्राज़ीलियाई अर्थशास्त्री ने भारत को अमेरिका का 'ट्रोजन हॉर्स' (Trojan Horse) तक कह दिया था— यानी ऐसा देश जो ब्रिक्स की अंदरूनी खबरें अमेरिका तक पहुंचाता है।

बिश्केक में दबाव: बिश्केक (SCO) बैठक में रूस और चीन ने भारत पर साफ दबाव डाला कि वह 'इधर भी और उधर भी' की नीति छोड़े। नतीजतन, भारत को एक ऐसा साझा बयान साइन करना पड़ा जो अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ था। इसी वजह से अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो (Marco Rubio) भारत से सख्त नाराज़ हैं।

3. शी जिनपिंग का 24 घंटे का दौरा और 155 अरब डॉलर का घाटा
कल चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग दिल्ली पहुंच रहे हैं।

चीन के साथ भारत का कुल व्यापार लगभग 155 अरब डॉलर है, जो पूरी तरह चीन के पक्ष में (Trade Deficit) झुका हुआ है। चीन भारत से कुछ खरीदता नहीं है, सिर्फ बेचता है। भारत की सबसे बड़ी चुनौती चीन को यह समझाना है कि वह भारत से कच्चे माल और अन्य उत्पादों की खरीद शुरू करे।

4. डीडॉलराइजेशन की ज़िद और 'रुपये' का संकट
सम्मेलन का एक बड़ा एजेंडा स्थानीय मुद्राओं (Local Currency) में व्यापार है।

100% टैरिफ की धमकी: डोनाल्ड ट्रम्प पहले ही धमकी दे चुके हैं कि अगर ब्रिक्स देशों ने अमेरिकी डॉलर को हटाकर अपनी करेंसी (De-dollarization) में व्यापार किया, तो वे उन देशों पर 100% टैरिफ लगा देंगे।

फंस गया रूस: रूस ने भारत के साथ रुपये में व्यापार किया था, लेकिन अब रूस के पास इतने 'भारतीय रुपये' इकट्ठे हो गए हैं कि उसे समझ नहीं आ रहा कि वह इसका क्या करे। दुनिया के बाकी देश रुपया लेने को तैयार नहीं हैं, उन्हें हार्ड करेंसी (डॉलर/यूरो) चाहिए। वहीं, चीन चाहता है कि डीडॉलराइजेशन के नाम पर उसकी करेंसी 'युआन' (Yuan) का दबदबा कायम हो।

निष्कर्ष:
भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) अब एक बंद गली में फंसती दिख रही है। 'निष्पक्ष' शो का स्पष्ट निष्कर्ष है कि भारत को अमेरिका के टैरिफ और वीज़ा हंटर से भी बचना है, और ब्रिक्स देशों के बीच अपना खोया हुआ विश्वास भी वापस पाना है। भारत अब ढुलमुल विदेश नीति के सहारे ज़्यादा दिन तक नहीं चल सकता; उसे अपने सिद्धांतों पर एक कड़ा और स्पष्ट स्टैंड लेना ही होगा।


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