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जाति जनगणना पर नया सियासी भूचाल: राहुल-खरगे के खत से घिरी मोदी सरकार

द फ़ेडरल देश के शो निष्पक्ष में नीलू व्यास के साथ जानिए क्या राहुल-खरगे की साझा चिट्ठी से जाति जनगणना के मुद्दे पर बीजेपी बैकफुट पर आ जाएगी।


Nishpaksh: देश में आगामी जनगणना को लेकर एक बार फिर राजनीतिक तापमान चढ़ गया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक साझा पत्र लिखकर आगामी जनगणना में जाति जनगणना के तरीकों और उसमें पूछे जाने वाले प्रश्नों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म 'द फ़ेडरल देश' के खास शो 'निष्पक्ष' में वरिष्ठ पत्रकार और एंकर नीलू व्यास ने इस बड़े राजनीतिक कदम के सामाजिक व चुनावी असर पर जेएनयू के प्रोफेसर अजय गुडावर्ती और कांग्रेस कार्यकर्ता व राजनीतिक विश्लेषक आयुष्मान पांडे के साथ गहन विश्लेषण किया।

चिट्ठी में उठाए गए मुख्य बिंदु

कांग्रेस नेतृत्व ने प्रधानमंत्री को भेजी अपनी साझा चिट्ठी में जनगणना 2027 की प्रक्रिया को लेकर निम्नलिखित प्रमुख मांगें और आपत्तियां जताई हैं:

एक ही जाति के विभिन्न नामों से दर्ज होने पर आपत्ति: ओपन-एंडेड प्रश्नों के कारण एक ही जाति या उपजाति के अलग-अलग नामों से दर्ज होने की संभावना है, जिससे जातिगत आबादी के सही आंकड़े सामने नहीं आ पाएंगे।

'पिछड़ा वर्ग' (OBC) शब्द न होने पर सवाल: जनगणना के प्रारूप में 'पिछड़ा वर्ग' (OBC) शब्द के स्पष्ट समावेश न होने पर आपत्ति जताई गई है।

तेलंगाना और बिहार मॉडल की मांग: जनगणना प्रक्रिया में पारदर्शिता और सही आंकड़े जुटाने के लिए तेलंगाना (2024) और बिहार (2022) में अपनाई गई सर्वे प्रक्रियाओं तथा ड्रॉप-डाउन सूचियों को लागू करने का सुझाव दिया गया है।

राजनीतिक दलों व विशेषज्ञों से परामर्श: जनगणना के अंतिम प्रश्नपत्र को तय करने से पहले सभी राजनीतिक दलों, विशेषज्ञों और आम जनता से व्यापक सलाह लेने की मांग की गई है।

विशेषज्ञों का विश्लेषण और राजनीतिक अर्थ

डिबेट में शामिल विशेषज्ञों ने इस कदम के दूरगामी राजनीतिक असर और सामाजिक न्याय की दिशा में इसके महत्व पर अपनी राय रखी:

राजनीतिक नैरेटिव पर प्रभाव (प्रो. अजय गुडावर्ती, JNU):

प्रो. अजय ने कहा कि राहुल गांधी और खरगे की यह चिट्ठी हालिया राजनीतिक बहसों के बीच एक 'क्लटर ब्रेकर' की तरह आई है। राहुल गांधी लगातार 'सामाजिक न्याय' और जाति जनगणना के मुद्दे पर स्पष्ट रुख अपनाए हुए हैं। बीजेपी जहाँ ओबीसी और उच्च जातियों के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रही है, वहीं विपक्ष का यह आक्रामक रुख सत्तापक्ष को असहज कर सकता है।

नीतिगत प्रतिबद्धता और दस्तावेजीकरण (आयुष्मान पांडे, राजनीतिक विश्लेषक):

आयुष्मान पांडे ने कहा कि यह पत्र केवल एक विरोध दर्ज कराना नहीं है, बल्कि देश की 85% बहुजन और वंचित आबादी के प्रति कांग्रेस की प्रतिबद्धता का लिखित दस्तावेज है। उन्होंने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार लगातार सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों को पारदर्शी तरीके से सामने लाने से बच रही है, जबकि तेलंगाना जैसे राज्यों ने इसे सफलतापूर्वक लागू करके दिखाया है।

आगे का रास्ता और चुनौतियाँ

जनगणना 2027 में 40 से अधिक सवाल पूछे जाने हैं, जिनमें कोविड वैक्सीन, मोबाइल नंबर और बैंक खातों से जुड़े प्रश्न शामिल हैं। लेकिन विपक्ष का मुख्य ध्यान इस बात पर केंद्रित है कि जातिगत आंकड़ों का संकलन पारदर्शी और त्रुटिहीन हो, ताकि नीति-निर्माण और सामाजिक कल्याण योजनाओं का लाभ सही मायनों में वंचित वर्गों तक पहुँच सके।

अब देखना यह होगा कि क्या केंद्र सरकार विपक्ष की इन मांगों पर ध्यान देती है या फिर जाति जनगणना का यह मुद्दा आगामी विधानसभा चुनावों में एक बड़ा राजनीतिक हथियार बनेगा।

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