पितृसत्ता से छुआछूत तक: राहुल गांधी के वार से गरमाई सियासत
'निष्पक्ष' में विशेषज्ञों की राय: राहुल द्वारा 'शुद्धिकरण' व 'पितृसत्ता' का विरोध महज़ राजनीति नहीं, Gen-Z और सामाजिक न्याय को साधने का बड़ा दांव है।
Nishpaksh: राजनीति में केवल चुनावी हार-जीत से आगे बढ़कर अब 'समाज सुधार' और सत्ता के पुराने ढांचों (Power Structures) को चुनौती देने की बहस तेज हो गई है। 'द फ़ेडरल देश' के खास शो 'निष्पक्ष' में एंकर नीलू व्यास ने इसी संवेदनशील और अहम मुद्दे पर एक विस्तृत चर्चा की।
हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 'पितृसत्ता को खत्म करने' (Smash the Patriarchy) का आह्वान किया था। इसी कड़ी में अब उन्होंने उत्तराखंड में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के बाद हुए 'शुद्धिकरण' को सीधे तौर पर 'छुआछूत' और संविधान के खिलाफ एक बड़ा अपराध बताया है। राहुल गांधी के इस आक्रामक रुख के राजनीतिक और सामाजिक मायने समझने के लिए शो की एंकर नीलू व्यास के साथ दो खास मेहमान जुड़े— दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज के प्रोफेसर व राजनीतिक विश्लेषक तनवीर ऐजाज़ और वरिष्ठ पत्रकार व पॉलिटिकल कमेंटेटर टी.के. राजलक्ष्मी।
क्या है 'शुद्धिकरण' का पूरा विवाद?
चर्चा की शुरुआत करते हुए एंकर नीलू व्यास ने दर्शकों के सामने पूरा घटनाक्रम रखा। दरअसल, 8 अगस्त को उत्तराखंड के हल्द्वानी के रामलीला मैदान में मल्लिकार्जुन खरगे की एक रैली हुई थी। आरोप है कि 10 अगस्त को वहां बीजेपी और आरएसएस के कार्यकर्ताओं ने गंगाजल छिड़क कर उस जगह का 'शुद्धिकरण' किया। राहुल गांधी ने इस घटना के 20 दिन बीत जाने के बाद भी कोई कार्रवाई न होने पर गहरी नाराजगी जताई है और एससी/एसटी एक्ट (SC/ST Prevention of Atrocities Act) के तहत एफआईआर दर्ज करने की मांग की है।
बीजेपी-आरएसएस को चुभेगा यह मुद्दा: प्रोफेसर तनवीर ऐजाज़
शो में प्रोफेसर तनवीर ऐजाज़ ने राहुल गांधी के इस कदम को बेहद महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा बीजेपी और आरएसएस को काफी हर्ट (आहत) करेगा, क्योंकि उन्हें लगता था कि उनके वैचारिक वर्चस्व पर कोई सवाल नहीं उठाएगा।
प्रोफेसर तनवीर ने कानूनी पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए कहा, "संविधान के अनुच्छेद 17 के तहत छुआछूत का पूरी तरह से उन्मूलन किया गया है। किसी इतने बड़े दलित नेता के कार्यक्रम के बाद सार्वजनिक स्थल का शुद्धिकरण करना न केवल एक असंवेनशील कृत्य है, बल्कि यह हमारे कानून का मखौल उड़ाना है। इसके खिलाफ 'प्रिवेंशन ऑफ एट्रोसिटीज एक्ट' के तहत सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।" उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राहुल गांधी का 'स्मैश पेट्रियार्की' और छुआछूत के खिलाफ बोलना महज़ राजनीति नहीं है, बल्कि यह समाज के भीतर गहरी जड़ें जमा चुके पुरुषवादी और जातिवादी सत्ता के ढांचों को तोड़ने का प्रयास है।
अवसरवादी नेताओं और राज्य सरकार पर राजलक्ष्मी का कड़ा प्रहार
वरिष्ठ पत्रकार टी.के. राजलक्ष्मी ने इस पूरे कृत्य को असंवैधानिक करार देते हुए सिस्टम की नाकामी पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि यह घटना राज्य सरकार की नाक के नीचे हुई, इसलिए उन्हें स्वतः संज्ञान (Suo-moto) लेते हुए एफआईआर दर्ज करनी चाहिए थी। इसके उलट, राज्य के बीजेपी अध्यक्ष इस शुद्धिकरण का बचाव करते नज़र आए।
राजलक्ष्मी ने बीजेपी के सहयोगी और दलित नेता चिराग पासवान पर भी तीखा तंज कसा। चिराग के गोलमोल बयानों का ज़िक्र करते हुए राजलक्ष्मी ने कहा, "ये अवसरवादी नेता हैं। मंत्री पद या अन्य राजनीतिक स्वार्थों के चलते ये लोग इस तरह की घटनाओं पर स्पष्ट स्टैंड नहीं लेते और 'जलेबी जैसी बातें' करते हैं। यदि एक दलित नेता के इतने बड़े अपमान पर ये चुप हैं, तो ये समाज में होने वाले अन्य अन्यायों पर क्या बोलेंगे? इन्हें जनता के बीच जवाब देना मुश्किल होगा।"
जेन-ज़ी (Gen-Z) वोटर्स पर पड़ेगा गहरा प्रभाव
क्या राहुल गांधी के इन मुद्दों से कांग्रेस को कोई चुनावी फायदा होगा? इस सवाल पर टी.के. राजलक्ष्मी ने बहुत ही प्रासंगिक तर्क दिया। उन्होंने कहा कि यह मुद्दा सिर्फ दलित वोट बैंक तक सीमित नहीं रहने वाला है। आज की युवा पीढ़ी यानी 'जेन-ज़ी' (Gen-Z) के बीच यह विचारधारा गहराई से रेज़ोनेट (अपील) करेगी।
आज का युवा एक प्रोग्रेसिव (प्रगतिशील), फॉरवर्ड-लुकिंग और जेंडर-कास्ट जस्टिस (लैंगिक व जातीय न्याय) वाले समाज की उम्मीद करता है। वह 'राइट टू चूज़' (चुनने के अधिकार) में विश्वास रखता है। ऐसे में रूढ़िवादी और संकीर्ण सोच वाले नैरेटिव अब युवाओं को बिल्कुल भी आकर्षित नहीं करते। राहुल गांधी का यह स्टैंड सीधे तौर पर इस एस्पिरेशनल युवा वर्ग को कांग्रेस की तरफ मोड़ सकता है।
निष्कर्ष
चर्चा का समापन करते हुए एंकर नीलू व्यास ने कहा कि राहुल गांधी का यह रुख यह दर्शाता है कि वे सिर्फ चुनावी राजनीति नहीं, बल्कि समाज सुधार की एक बड़ी लड़ाई लड़ने की कोशिश कर रहे हैं। अब गेंद बीजेपी और एनडीए में शामिल दलित नेताओं के पाले में है। देखना दिलचस्प होगा कि वे इस मुद्दे पर अपनी चुप्पी तोड़ते हैं या नहीं, और राहुल गांधी के इस सामाजिक न्याय के नैरेटिव का मुकाबला आरएसएस व बीजेपी किस प्रकार करती है।
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