
क्या NEET पेपर लीक के खिलाफ हुआ छात्र आंदोलन हाल के वर्षों का सबसे प्रभावी जन आंदोलन बनकर उभरा है। इसमें आंदोलन, सरकार की प्रतिक्रिया और युवाओं की भागीदारी का विश्लेषण किया गया है।
दिल्ली की सड़कों पर 20 जुलाई को जो कुछ हुआ, वह सिर्फ एक और विरोध प्रदर्शन नहीं था। यह छात्रों और युवाओं के गुस्से का ऐसा विस्फोट था, जिसने सरकार की तैयारी और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों को चुनौती दी। हजारों छात्र और युवा जंतर-मंतर पर जुटे। इनमें बड़ी संख्या उन छात्रों की थी, जो दिल्ली के बाहर के कोचिंग हब से आए थे।
उनकी मांग साफ थी—NEET पेपर लीक, परीक्षा में कथित अनियमितताओं और शिक्षा व्यवस्था में सुधार। प्रदर्शनकारी संसद तक मार्च करना चाहते थे, लेकिन दिल्ली पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए लाठीचार्ज और आंसू गैस का इस्तेमाल किया। संसद परिसर के आसपास भारी बैरिकेडिंग, लोहे के गेट और दमकल वाहन तैनात किए गए, फिर भी बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी डटे रहे।
पहले के आंदोलनों से क्यों अलग है यह प्रदर्शन?
यह आंदोलन 2012 के निर्भया आंदोलन और 2011-12 के अन्ना हजारे आंदोलन से कई मायनों में अलग है। उस समय की राजनीतिक परिस्थितियां अलग थीं। केंद्र की तत्कालीन सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप थे और विपक्ष मजबूत स्थिति में था। अन्ना हजारे के आंदोलन को भी विपक्ष और नागरिक संगठनों का व्यापक समर्थन मिला था।
हालांकि, यह भी उल्लेखनीय है कि उन आंदोलनों के दौरान भी प्रशासन पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ बल प्रयोग करने के आरोप लगे थे। लेकिन मौजूदा दौर में सरकार के पास बड़े प्रदर्शनों को नियंत्रित करने के लिए अधिक मजबूत प्रशासनिक तंत्र, कानूनी उपाय और संचार तंत्र मौजूद है। इसके बावजूद 20 जुलाई को लगातार बड़ी संख्या में छात्र प्रदर्शन स्थल पर पहुंचते रहे और आंदोलन जारी रहा।
विपक्ष से अलग, छात्रों का अपना आंदोलन
यह आंदोलन किसी राजनीतिक दल के आह्वान पर नहीं हुआ। पिछले कई वर्षों से विपक्षी दल संसद, प्रेस कॉन्फ्रेंस और सोशल मीडिया पर NEET पेपर लीक और शिक्षा व्यवस्था के मुद्दे उठाते रहे, लेकिन वे इसे बड़े जन आंदोलन का रूप नहीं दे सके।इसके विपरीत, यह प्रदर्शन छात्रों और युवाओं की नाराजगी से स्वतः विकसित हुआ। कई महीनों से चल रहे असंतोष ने आखिरकार हजारों युवाओं को सड़कों पर ला दिया। लेखक का मानना है कि यह आंदोलन चुनावी राजनीति या किसी राजनीतिक नेतृत्व के बजाय सीधे प्रभावित छात्रों की भागीदारी से आगे बढ़ा।
मुख्यधारा मीडिया से दूर, सोशल मीडिया बना ताकत
निर्भया और अन्ना आंदोलन को मुख्यधारा मीडिया ने लगातार व्यापक कवरेज दी थी। इसके विपरीत, CJP के आंदोलन को बड़े टीवी चैनलों और अखबारों में अपेक्षाकृत कम जगह मिली। आंदोलन की जानकारी और तस्वीरें मुख्य रूप से सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंचीं, जिससे प्रदर्शन लगातार चर्चा में बना रहा।
सरकार की प्रतिक्रिया पर उठे सवाल
लेख में सरकार की कार्यप्रणाली पर चार प्रमुख सवाल उठाए गए हैं।सरकार छात्रों के गुस्से का सही आकलन नहीं कर सकी। प्रदर्शन को बिना बल प्रयोग के संभालने में प्रशासन असफल रहा।करीब एक महीने तक प्रदर्शन के बावजूद समय रहते बातचीत शुरू नहीं हुई।शिक्षा मंत्री की जवाबदेही को लेकर सरकार ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया।
जब आंदोलन ने बड़ा रूप लिया, तब प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधिमंडल की वरिष्ठ नेताओं से बातचीत हुई और उनकी मांगें सुनी गईं। इसके बाद सोनम वांगचुक ने भी बातचीत की अपील के बाद अपना अनशन समाप्त किया।
लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए क्या संदेश?
यह आंदोलन एक बड़ा सवाल खड़ा करता है कि जब शिक्षा जैसी समस्या लाखों युवाओं के भविष्य को प्रभावित करती है, तब प्रशासनिक नियंत्रण की भी एक सीमा होती है। यदि छात्रों की समस्याओं का समय पर समाधान नहीं होता, तो असंतोष स्वतः बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है।
आगे की चुनौती
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार आगे क्या कदम उठाती है। CJP प्रतिनिधिमंडल ने तीन प्रमुख मांगें रखी हैं। सोनम वांगचुक को तत्काल अस्पताल से रिहा किया जाए।केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद से हटाया जाए।NEET विवाद से जुड़े आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को 1 करोड़ रुपये का मुआवजा दिया जाए।
यदि इन मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो युवाओं का असंतोष और बढ़ सकता है। वहीं, यदि सरकार बातचीत और समाधान का रास्ता अपनाती है, तो यह लोकतांत्रिक जवाबदेही को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जाएगा।


