यूपी से दिल्ली तक बीजेपी पर विपक्ष का डबल अटैक
यूपी में कांग्रेस-सपा के बीच सीटों और बयानबाजी से गठबंधन पर सवाल उठ रहे हैं, वहीं दिल्ली में सुंदरकांड पाठ और राम मंदिर चढ़ावा विवाद के जरिए AAP बीजेपी के हिंदुत्व नैरेटिव को चुनौती देती नजर आ रही है।
Rajpath: क्या बीजेपी को विपक्ष अलग अलग तरीके से घेरने का काम कर रहा है। क्या यूपी में इंडिया गठबंधन के अंदर जो खींचतान मची हुई है वो महज दिखावा है। क्या सुंदरकांड पाठ के जरिए आम आदमी पार्टी दिल्ली में बीजेपी पर हल्लाबोल कर रही है। क्या राम मंदिर चढ़ावा चोरी के मुद्दे पर बीजेपी बैकफुट पर है या विपक्ष की चाल को बीजेपी कुंद कर देगी। यूपी में इंडिया गठबंधन की गाड़ी चुनाव से पहले ही पटरी से उतरने लगी है? क्या कांग्रेस, समाजवादी पार्टी पर दबाव की राजनीति कर रही है? क्या मुस्लिम समाज का मुद्दा सीटों के गणित का नया हथियार बन चुका है? अगर कांग्रेस को अपनी ताकत पर इतना भरोसा है, तो क्या वह यूपी में अकेले चुनाव लड़ने का जोखिम उठाएगी? उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अभी वक्त है, लेकिन उससे पहले ही इंडिया गठबंधन के भीतर खींचतान खुलकर सामने आने लगी है। कांग्रेस सांसद इमरान मसूद के समाजवादी पार्टी पर सीधे हमले ने सियासी गलियारों में बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ बयानबाजी का नहीं बल्कि सीट बंटवारे से पहले ताकत दिखाने की राजनीति का भी है।
बोली के तीर जब अपनों पर चलने लगे तो समझिए गठबंधन की दीवारों में दरार पड़ने लगी है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिल रहा है। सहारनपुर से कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने समाजवादी पार्टी पर ऐसा हमला बोला है जिसने इंडिया गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मसूद का कहना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में सबसे ज्यादा फायदा समाजवादी पार्टी को कांग्रेस के साथ गठबंधन का मिला। उनके मुताबिक, इसी गठबंधन की बदौलत सपा 37 लोकसभा सीटें जीत सकी क्योंकि 2022 के विधानसभा चुनाव में वह 120 सीटों का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई थी। यहीं नहीं इमरान मसूद ने मुस्लिम नेतृत्व का मुद्दा उठाते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी को बोलता हुआ मुसलमान पसंद नहीं है। जो मुसलमान खुलकर अपनी बात रखता है वह आज कांग्रेस में है और यही बात समाजवादी पार्टी को अखर रही है। बता दें कि इमरान मसूद का नाता समाजवादी पार्टी से भी रहा है।
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी ने भी पलटवार में देर नहीं लगाई। पार्टी नेता उदयवीर सिंह ने इमरान मसूद को सुर्खियों में बने रहने वाला नेता बताते हुए उनके बयान को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। लेकिन मुद्दा सिर्फ बयान का नहीं बल्कि उसके समय का है। क्या यह महज व्यक्तिगत राय है या सीट बंटवारे से पहले दबाव बनाने की सोची-समझी रणनीति?अगर कांग्रेस को लगता है कि उत्तर प्रदेश में उसका जनाधार तेजी से बढ़ा है, तो फिर गठबंधन की मजबूरी क्यों? आखिर अकेले मैदान में उतरने से परहेज क्यों?
आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर कुछ और ही कहानी कहती है। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया था। कांग्रेस 105 सीटों पर लड़ी लेकिन जीत सिर्फ 7 सीटों पर मिली। पार्टी का वोट शेयर करीब 6.25 प्रतिशत रहा। यानी गठबंधन भी कांग्रेस को बड़ी सफलता नहीं दिला सका। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने अकेले दम पर चुनाव लड़ा। नतीजा यह रहा कि पूरे उत्तर प्रदेश में पार्टी सिर्फ रायबरेली सीट बचा सकी। वोट शेयर करीब 6.36 प्रतिशत रहा। फिर आया 2022 का विधानसभा चुनाव। कांग्रेस ने लड़की हूं, लड़ सकती हूं जैसे बड़े अभियान के साथ चुनाव लड़ा, लेकिन नतीजे बेहद निराशाजनक रहे। पार्टी 403 में से सिर्फ 2 सीटें जीत सकी और उसका वोट शेयर घटकर लगभग 2.33 प्रतिशत रह गया। यानी कि कांग्रेस को ना तो अकेले लड़ने से या गठबंधन से कोई खास फायदा नहीं मिला। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या कांग्रेस जमीन पर उतनी मजबूत है जितनी बयानों में दिखाई देती है?
अगर गठबंधन के नेता ही एक-दूसरे पर सार्वजनिक हमले करेंगे तो इसका सबसे बड़ा फायदा किसे मिलेगा? जाहिर है विपक्ष की इस कलह पर भारतीय जनता पार्टी की नजर जरूर होगी। समाजवादी पार्टी पहले ही साफ कर चुकी है कि सीट बंटवारे पर अंतिम फैसला अखिलेश यादव करेंगे। ऐसे में कांग्रेस के दूसरे स्तर के नेताओं की लगातार बयानबाजी यह संकेत देती है कि पार्टी सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए राजनीतिक दबाव की रणनीति अपना रही है। मुस्लिम नेतृत्व का मुद्दा भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। क्योंकि उत्तर प्रदेश की कई सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका निभाते हैं और कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि वह इस वर्ग की मजबूत आवाज है। लेकिन राजनीति में संदेश के साथ साथ संगठन और जमीन भी मायने रखते हैं।
अब देखना होगा कि सीटों के बंटवारे तक यह बयानबाजी थमती है या फिर गठबंधन की रस्साकशी और तेज होती है। क्योंकि कहा जाता है रस्सी जल गई, मगर बल नहीं गया। सवाल यही है कि क्या यह गठबंधन चुनाव तक मजबूती से साथ रहेगा या फिर बयानों की तल्खी इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन जाएगी।
क्या आम आदमी पार्टी का सुंदरकांड पाठ सिर्फ धार्मिक आयोजन था या दिल्ली की नई सियासी पटकथा? क्या राम मंदिर के चढ़ावे में कथित चोरी का मुद्दा उठाकर आम आदमी पार्टी बीजेपी के हिंदुत्व नैरेटिव को चुनौती देना चाहती है? क्या AAP मान चुकी है कि सिर्फ मुस्लिम वोटों के भरोसे सत्ता की वापसी संभव नहीं? और क्या दिल्ली में अब हिंदुत्व बनाम असली आस्था की राजनीतिक लड़ाई शुरू हो चुकी है?
दिल्ली की सियासत में एक बार फिर धर्म और राजनीति का संगम दिखाई देने लगा है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार निशाने पर बीजेपी है और चुनौती देने की कोशिश कर रही है आम आदमी पार्टी। AAP की ओर से आयोजित सुंदरकांड पाठ को महज धार्मिक कार्यक्रम मानना शायद जल्दबाजी होगी। इसे ऐसे समय आयोजित किया गया है, जब पार्टी सत्ता से बाहर है और अपनी राजनीतिक जमीन दोबारा मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। बीजेपी ने इस आयोजन को लेकर तंज कसा तो आम आदमी पार्टी ने भी पलटवार में कोई कसर नहीं छोड़ी।
राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने वीडियो जारी कर कहा कि अगर सुंदरकांड के पाठ से भाजपाई इतने बिलबिला गए तो लंकाकांड से इनका क्या हाल होगा?" यह बयान साफ संकेत देता है कि AAP अब बीजेपी को उसी के सबसे मजबूत राजनीतिक मुद्दे हिंदुत्व पर घेरने की तैयारी में है।यहीं पर राम मंदिर के चढ़ावे में कथित चोरी का मुद्दा भी राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है। आम आदमी पार्टी का संदेश सीधा है अगर आस्था के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टी के राज में ही मंदिर का चढ़ावा सुरक्षित नहीं है, तो नैतिकता का दावा किस आधार पर किया जा रहा है?
दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस लंबे समय से अरविंद केजरीवाल पर सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति करने का आरोप लगाती रही है। दूसरी ओर बीजेपी का आरोप रहा कि AAP ने तुष्टीकरण की राजनीति में कांग्रेस को भी पीछे छोड़ दिया। लेकिन अब तस्वीर बदलती नजर आ रही है।सवाल यह है कि क्या आम आदमी पार्टी ने चुनावी गणित का नया हिसाब लगा लिया है? राजनीतिक हकीकत यही कहती है कि दिल्ली में सरकार बनाने के लिए सिर्फ एक वर्ग के वोट पर्याप्त नहीं होते। "एक हाथ से ताली नहीं बजती। अगर सत्ता में वापसी करनी है तो बहुसंख्यक हिंदू मतदाता का भरोसा जीतना भी उतना ही जरूरी है।
शायद यही वजह है कि AAP अब यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि वह हिंदू आस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि हिंदुत्व के नाम पर होने वाली राजनीति के खिलाफ है। सुंदरकांड पाठ हो या राम मंदिर के चढ़ावे का मुद्दा दोनों के जरिए पार्टी यह नैरेटिव गढ़ना चाहती है कि बीजेपी ने हिंदुत्व को राजनीतिक हथियार बनाया, जबकि वह खुद आस्था का सम्मान करती है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या मतदाता इस रणनीति को स्वीकार करेगा या इसे महज चुनावी मजबूरी मानेगा?
लोकसभा चुनाव 2029 में और दिल्ली विधानसभा चुनाव 2030 में हैं यानी आम आदमी पार्टी के पास समय जरूर है। लेकिन राजनीतिक जमीन तैयार करने की चुनौती भी उतनी ही बड़ी है। ऐसे में वह मुद्दों की नई बिसात बिछा रही है। शायद यही वजह है कि आम आदमी पार्टी अब बीजेपी के सबसे मजबूत राजनीतिक हथियार हिंदुत्व को उसी की भाषा में चुनौती देने की कोशिश कर रही है। देखना यह होगा कि यह दांव जनता के बीच असर छोड़ता है या फिर चुनावी मौसम आते आते यह मुद्दा भी राजनीतिक शोर में कहीं खो जाएगा।

