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जंतर-मंतर 2.0: कनाट प्लेस में हंगामा, दिल्ली पुलिस की पाबंदी के बाद सड़कों पर उतरा छात्र आक्रोश!

दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की सूची से हटाए जाने और वहां कड़ी सुरक्षा व्यवस्था लागू करने के बाद राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। इस पाबंदी के खिलाफ और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर वामपंथी (Left) छात्र संगठनों और कांग्रेस की छात्र इकाई NSUI के कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया।


क्या दिल्ली की सड़कों पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना अब प्रशासन की मर्जी पर निर्भर करेगा? क्या जंतर-मंतर जैसी ऐतिहासिक जगह पर ताला लगाकर सरकार और पुलिस जनता की आवाज को दबा सकती हैं? यह सवाल आज इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि दिल्ली पुलिस द्वारा जंतर-मंतर पर लगाए गए प्रतिबंध के बावजूद राजधानी में विरोध की आग ठंडी नहीं हुई है, बल्कि और भड़क गई है। जब पुलिस ने जंतर-मंतर को छावनी में तब्दील कर सील कर दिया, तो देश के सजग छात्र और युवा दिल्ली के सबसे प्रमुख व्यापारिक और सांस्कृतिक केंद्र यानी कनाट प्लेस (Connaught Place) की सड़कों पर उतर आए।

कनाट प्लेस में जब गूंजे चुनाव आयोग विरोधी नारे

दिल्ली पुलिस के विवादित फैसले के खिलाफ और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर वामपंथी (Left) छात्र संगठनों और कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई (NSUI) के कार्यकर्ताओं ने कनाट प्लेस में अलग-अलग समय पर पहुंचकर जोरदार शक्ति प्रदर्शन किया। एक तरफ जहां पुलिस जंतर-मंतर पर बैरिकेड्स लगाकर निश्चिंत बैठी थी, वहीं दूसरी तरफ छात्रों ने कनाट प्लेस के इनर और आउटर सर्कल में अचानक एकत्र होकर पुलिसिया चाक-चौबंद दावों की हवा निकाल दी। छात्रों के इस अचानक कदम से पूरे इलाके में हलचल मच गई।

लेफ्ट और NSUI का अलग-अलग समय पर धावा: पुलिस के छूटे पसीने

छात्र संगठनों का यह तरीका बेहद रणनीतिक और योजनाबद्ध नजर आया। दोपहर के समय पहले वामपंथी छात्र संगठनों—जैसे आइसा (AISA), एसएफआई (SFI) और अन्य संगठनों के कार्यकर्ताओं ने कनाट प्लेस के ब्लॉक में पहुंचकर नारेबाजी शुरू की। इसके बाद, कुछ ही घंटों के अंतराल पर एनएसयूआई (NSUI) के कार्यकर्ताओं का एक बड़ा दस्ता वहां पहुंचा और प्रदर्शन शुरू कर दिया। छात्रों के हाथों में तख्तियां थीं, जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे और पुलिस की तानाशाही के खिलाफ कड़े संदेश लिखे थे। कनाट प्लेस जैसे अत्यधिक व्यस्त इलाके में अचानक हुए इस प्रदर्शन से दिल्ली पुलिस के हाथ-पांव फूल गए।

जंतर-मंतर की किलेबंदी पर उठते गंभीर प्रशासनिक सवाल

इस पूरी खींचतान की जड़ 11 अक्टूबर का वह आदेश है, जिसके तहत दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थलों की आधिकारिक सूची से बाहर का रास्ता दिखा दिया। पुलिस का तर्क है कि जंतर-मंतर पर होने वाले रोज-रोज के प्रदर्शनों से लुटियंस दिल्ली में ट्रैफिक जाम होता है और आम लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है। लेकिन नागरिक समाज, विपक्षी दलों और छात्र संगठनों का स्पष्ट मानना है कि जंतर-मंतर पर पाबंदी का असली मकसद ट्रैफिक संभालना नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों के खिलाफ उठने वाली हर लोकतांत्रिक आवाज को मुख्यधारा से दूर धकेलना है।

मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग पर क्यों अड़े हैं छात्र?

छात्रों और विपक्षी संगठनों के इस बढ़ते गुस्से के केंद्र में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) के इस्तीफे की मांग भी शामिल है। 2 अक्टूबर से ही छात्र संगठन और विपक्षी दल कथित 'वोट चोरी' और चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं। छात्रों का आरोप है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख लगातार गिर रही है और चुनाव आयोग अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को निभाने में विफल साबित हुआ है। इसी मांग को लेकर छात्र जंतर-मंतर पर जुटना चाहते थे, लेकिन वहां सुरक्षा का कड़ा पहरा होने के कारण उन्होंने कनाट प्लेस को अपनी आवाज उठाने का माध्यम बनाया।

प्रशासनिक नाकेबंदी का उल्टा असर: CP में बढ़ा सुरक्षा जोखिम

कनाट प्लेस में हुए इन प्रदर्शनों ने यह साबित कर दिया है कि जन-आक्रोश को केवल एक जगह की नाकेबंदी करके नहीं दबाया जा सकता। अगर प्रशासन जंतर-मंतर जैसी तय जगह को छीन लेगा, तो प्रदर्शनकारी शहर के दूसरे संवेदनशील और भीड़भाड़ वाले हिस्सों में पहुंचकर अपनी बात रखेंगे। कनाट प्लेस जैसी जगह पर बिना पूर्व सूचना के प्रदर्शन होना आम नागरिकों, व्यापारियों और सुरक्षा व्यवस्था तीनों के लिहाज से पुलिस के लिए कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण साबित हुआ है।

क्या लोकतंत्र में सड़कों पर विरोध दर्ज कराना भी जुर्म बन जाएगा?

भारत का संविधान अनुच्छेद 19 के तहत देश के हर नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से एकत्र होने और सरकार की नीतियों पर अपना विरोध दर्ज कराने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। जंतर-मंतर दशकों से देश के लोकतंत्र की वह खिड़की रहा है जहां से किसान, मजदूर, छात्र और पीड़ित वर्ग अपनी फरियाद सत्ता के गलियारों तक पहुंचाते थे। यदि विरोध की इस ऐतिहासिक जगह को पैसों के खेल (रामलीला मैदान का भारी किराया) और प्रशासनिक पाबंदियों में उलझा दिया जाएगा, तो आम नागरिक का संवैधानिक अधिकार खतरे में पड़ जाएगा।

विरोधाभास की राजनीति या हक की लड़ाई? आगे क्या?

कनाट प्लेस की सड़कों पर छात्रों के इस तीखे प्रदर्शन ने सरकार और दिल्ली पुलिस को साफ संदेश दे दिया है कि अधिकारों की लड़ाई किसी प्रशासनिक फरमान की मोहताज नहीं होती। जब-जब विरोध के जायज रास्ते बंद करने की कोशिश की जाएगी, तब-तब आवाजें नए रास्तों से होकर निकलेगी। अब देखना यह होगा कि दिल्ली पुलिस अपने इस विवादित फैसले पर कायम रहती है या फिर बढ़ते राजनीतिक और सामाजिक दबाव के आगे जंतर-मंतर को दोबारा खोलने पर मजबूर होती है।

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