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UP 2027: राम मंदिर पर क्यों फंसी बीजेपी? चंदा विवाद और सियासी पहेली

अयोध्या हार और चंदे में कथित गबन के आरोपों के बीच यूपी 2027 से पहले राम मंदिर मुद्दे पर बीजेपी रक्षात्मक। अखिलेश के तीखे वार और बीजेपी के पलटवार पर रिपोर्ट।


Rajpath: तीन दशकों से अधिक समय तक भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की राजनीति का मुख्य आधार रहा राम मंदिर आंदोलन अब उत्तर प्रदेश के आगामी 2027 विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी के लिए एक पेचीदा राजनीतिक मोड़ पर खड़ा दिखाई दे रहा है। जिस आंदोलन ने 1984 में महज दो लोकसभा सीटों वाली बीजेपी को राष्ट्रीय राजनीति के शिखर पर पहुंचाया, उसी राम मंदिर के मुद्दे पर पार्टी अब पहले के मुकाबले बेहद सतर्क और रक्षात्मक नजर आ रही है।


2024 के लोकसभा चुनावों में अयोध्या (फैजाबाद) सीट पर मिली हार के बाद उम्मीद की जा रही थी कि बीजेपी राम मंदिर को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि के तौर पर और आक्रामक तरीके से पेश करेगी। हालांकि, मंदिर ट्रस्ट और चंदे में कथित अनियमितताओं व चोरी के आरोपों ने पार्टी के प्रचार अभियान की धार को कुंद कर दिया है। नतीजतन, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जैसे दिग्गज नेताओं के चुनावी भाषणों में अब राम मंदिर का पहले जैसा मुखर जिक्र कम ही सुनाई दे रहा है।

दोहरे भंवर में फंसी बीजेपी की रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, बीजेपी इस समय दोहरी चुनौती का सामना कर रही है:

यदि पार्टी राम मंदिर के मुद्दे को जोर-शोर से उठाती है, तो चंदे और चढ़ावे में कथित चोरी का विवाद दोबारा सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में आ जाता है।

यदि पार्टी इस मुद्दे से पूरी तरह दूरी बनाती है, तो उसकी हिंदुत्ववादी राजनीति, वैचारिक वर्चस्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के दावों पर सवाल खड़े होने लगते हैं।

यही वजह है कि पार्टी अब इस मुद्दे पर सोची-समझी खामोशी अख्तियार करती दिख रही है।

विपक्ष का तीखा हमला: ‘चंदा चोरी’ को बनाया मुख्य हथियार
समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस ने इस मुद्दे को लपकते हुए बीजेपी की सबसे मजबूत वैचारिक जमीन पर ही चौतरफा हमला बोल दिया है।

अखिलेश यादव का वार: सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को अयोध्या से चुनाव लड़ने की खुली चुनौती दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि सच्चे सनातनी कभी चढ़ावे और ‘राम धन’ की चोरी नहीं कर सकते। उन्होंने दावा किया कि चंदे और चढ़ावे में कथित गबन के खुलासे से आस्थावान लोग आहत हैं और बीजेपी की नियत व नीति दोनों बेनकाब हो चुकी हैं।

सपा विधायक पवन पांडे की भूमिका: अयोध्या के पूर्व सपा विधायक पवन पांडे ने मंदिर निर्माण और जमीन खरीद से जुड़ी कथित गड़बड़ियों को प्रमुखता से उठाया। सपा नेताओं का आरोप है कि राम मंदिर के नाम पर एकत्र किए गए धन का उपयोग पार्टी और संगठन के कार्यालय बनवाने में किया गया।

कांग्रेस का रुख: कांग्रेस ने भी सवाल खड़ा किया है कि खुद को हिंदू आस्था का सबसे बड़ा संरक्षक बताने वाली बीजेपी इन गंभीर वित्तीय आरोपों पर मौन क्यों साधे हुए है।

बीजेपी का पलटवार: ‘कारसेवकों पर गोली चलाने वाले इतिहास न भूलें’
विपक्ष के हमलों का जवाब देते हुए बीजेपी ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। पार्टी प्रवक्ताओं ने पलटवार करते हुए सपा के पिछले शासनकाल की याद दिलाई:

बीजेपी का कहना है कि समाजवादी पार्टी को इतिहास नहीं भूलना चाहिए, जब अयोध्या में रामभक्त कारसेवकों पर पुलिस से गोलियां चलवाई गई थीं।

बीजेपी ने आरोप लगाया कि तुष्टीकरण की राजनीति के चलते सपा नेता कभी अयोध्या धाम जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते और पूर्व में अयोध्या व काशी में हुए आतंकी धमाकों के आरोपियों के मुकदमे वापस लेने जैसे कदम उठाए गए थे।

पार्टी का दावा है कि राम मंदिर आज भी उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता का अहम हिस्सा है।

2027 का राजनीतिक गणित: क्या कम हो रहा है चुनावी असर?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राम मंदिर निर्माण पूरा होने के बाद अब इसका चुनावी असर पहले जैसा प्रभावी नहीं रह गया है।

छवि को झटका: जानकारों के मुताबिक, चंदे से जुड़े विवादों ने बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व की उस छवि को ज्यादा नुकसान पहुंचाया है, जो खुद को हिंदू हितों की एकमात्र पैरोकार बताती रही है।

अन्य मुद्दे हावी: विशेषज्ञों का आकलन है कि आगामी विधानसभा चुनाव में केवल हिंदुत्व के मुद्दे पर बीजेपी को पूरी तरह घेरना विपक्ष के लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि पार्टी के पास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का एक मजबूत कैडर नेटवर्क मौजूद है। हालांकि, स्थानीय सत्ता विरोधी लहर, बेरोजगारी और मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) जैसे जमीनी प्रशासनिक मुद्दे 2027 में विपक्ष के लिए अधिक कारगर साबित हो सकते हैं।

1984 से 2024 तक जिस राम मंदिर आंदोलन ने बीजेपी को सामाजिक समीकरण साधने और गैर-यादव व गैर-दलित हिंदू वोटों को लामबंद करने में मदद की, 2027 के चुनाव से पहले वही मुद्दा पार्टी के लिए एक नई राजनीतिक पहेली बन गया है।


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