UP चुनाव 2027: विधायकों की कटेगी टिकट? यूपी के 6 क्षेत्रों के लिए RSS-BJP का मास्टरप्लान
2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव भले ही कैलेंडर के हिसाब से दूर दिखे, लेकिन राजनीतिक बिसात पर शह और मात का खेल शुरू हो चुका है। अब देखना यह होगा कि क्या 2024 के कड़वे अनुभवों से सीख लेते हुए बीजेपी संघ के इस रिपोर्ट कार्ड के आधार पर कड़े और बड़े फैसले ले पाएगी या नहीं।
उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव आधिकारिक तौर पर भले ही अभी दूर हो, लेकिन राज्य के सियासी गलियारों और जमीनी राजनीति में इसकी गूंज साफ सुनाई देने लगी है। 2027 के महासमर को फतह करने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने अपनी चुनावी मशीनरी को अभी से सक्रिय कर दिया है। इस पूरी कवायद का सबसे अहम केंद्र है संघ का विशेष 'फीडबैक नेटवर्क', जो चुपचाप पूरे प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों का जमीनी सर्वे कर रहा है।
संघ के कार्यकर्ता और प्रचारक गांव-गांव और मोहल्ले-मोहल्ले पहुंचकर मौजूदा विधायकों की साख, संभावित दावेदारों की छवि, स्थानीय मुद्दों और कार्यकर्ताओं के मिजाज की टटोल ले रहे हैं। यानी चुनाव का ऐलान होने से बहुत पहले ही विधायकों का एक गोपनीय 'रिपोर्ट कार्ड' तैयार किया जा रहा है।
दिल्ली से लखनऊ तक बैठकों का दौर
इस जमीनी अभियान की रूपरेखा हवा में नहीं बनी है, बल्कि इसके पीछे बैठकों का एक लंबा दौर चला है। 17 सितंबर को लखनऊ में संघ और बीजेपी के शीर्ष पदाधिकारियों के बीच एक बेहद महत्वपूर्ण समन्वय बैठक हुई थी। इस बैठक में बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बी. एल. संतोष और राष्ट्रीय महामंत्री विनोद तावड़े ने संघ के प्रांतीय अधिकारियों से विधानसभा वार जमीनी रिपोर्ट ली।
इससे पहले देश की राजधानी दिल्ली में भी संघ के सह-सरकार्यवाह अरुण कुमार के साथ बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं की रणनीतिक चर्चा हुई थी। दिल्ली में बने इस फीडबैक का खाका ही लखनऊ की समन्वय बैठक तक पहुंचा, जिसके बाद पूरे उत्तर प्रदेश में संघ के नेटवर्क को अलर्ट मोड पर डाल दिया गया।
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद गोस्वामी का मानना है कि संघ का यह फीडबैक नेटवर्क बीजेपी को ज़मीनी हकीकत का आईना दिखाता है। अक्सर पार्टी के नेता जो बातें आलाकमान से छिपा जाते हैं या अपनी रिपोर्ट में सब कुछ ठीक-ठाक बताते हैं, संघ का कार्यकर्ता वही सच सीधे बिना किसी लाग-लपेट के शीर्ष नेतृत्व तक पहुँचा देता है।
6 क्षेत्रों के लिए अलग-अलग रणनीति
संघ इस बार पूरे उत्तर प्रदेश के लिए एक जैसी सामान्य रणनीति अपनाने के बजाय 'क्षेत्रीय समीकरणों' पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। उत्तर प्रदेश को संघ के छह सांगठनिक क्षेत्रों में बांटा गया है—पश्चिमी यूपी, ब्रज, कानपुर-बुंदेलखंड, अवध, गोरखपुर और काशी।
हर क्षेत्र में संघ का ध्यान वहां के स्थानीय सामाजिक-जातीय समीकरणों, युवा मतदाताओं की आकांक्षाओं और बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक की मौजूदा स्थिति पर है। रणनीति यह है कि पश्चिमी यूपी के मुद्दे पूर्वांचल से अलग हैं, इसलिए फैसले भी स्थानीय जरूरतों के हिसाब से ही होने चाहिए।
क्या 2024 के झटके से सबक लेगी BJP?
संघ की इस पूरी कवायद का सबसे बड़ा और संवेदनशील पहलू है—'टिकट वितरण'। अगर किसी सीट पर मौजूदा विधायक या दावेदार के खिलाफ नकारात्मक रिपोर्ट आती है या कार्यकर्ताओं में भारी रोष दिखता है, तो उसका असर सीधे तौर पर उनके टिकट पर पड़ सकता है। लेकिन यहाँ 2024 के लोकसभा चुनावों का कड़वा सच भी सामने आता है।
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता मनोज यादव का कहना है कि बीजेपी में आंतरिक लोकतंत्र खत्म हो चुका है। संघ चाहे कितनी भी रिपोर्ट बना ले, लेकिन अंत में सरकार और संगठन में तानाशाही फैसले ही हावी रहते हैं। उनका दावा है कि 2024 में भी जनता ने बीजेपी के खिलाफ जनादेश दिया था और 2027 में भी यूपी की जनता सपा के साथ खड़ी होगी।
2024 के लोकसभा चुनावों से पहले भी बीजेपी के पास कई सांसदों और उम्मीदवारों को लेकर नकारात्मक इनपुट्स आए थे। यह सलाह दी गई थी कि कई चेहरों को बदला जाए, लेकिन पार्टी ने पुराने नामों पर ही दांव खेला। इसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी की सीटें 2019 के 62 से गिरकर 2024 में 33 पर सिमट गईं। अब 2027 के चुनाव में संघ के इस फीडबैक को बीजेपी नेतृत्व कितनी तरजीह देता है, यही सबसे बड़ा सवाल है।
अफ़सरशाही, कार्यकर्ताओं का असंतोष और PDA की चुनौती
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद गोस्वामी के अनुसार, इस समय बीजेपी संगठन के सामने दो बड़ी आंतरिक और बाहरी चुनौतियां हैं:
कार्यकर्ताओं की अनदेखी: ग्राउंड पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं की सबसे बड़ी शिकायत यह है कि थाना, तहसील और ब्लॉक स्तर पर प्रशासनिक अधिकारी उनकी बातें नहीं सुनते। विधायकों और स्थानीय नेताओं के रवैये से भी कार्यकर्ताओं में भारी असंतोष है। चुनाव सिर्फ बड़े नेताओं के भाषणों से नहीं, बल्कि बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं की मेहनत से जीते जाते हैं। इसलिए संघ का पहला मकसद कार्यकर्ताओं का मनोबल बहाल करना है।
सपा का PDA फॉर्मूला: विपक्षी दल समाजवादी पार्टी 'PDA' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) के मुद्दे को आक्रामक तरीके से उठा रही है। बीजेपी के सामने चुनौती यह है कि केवल हिंदुत्व और राष्ट्रवाद के सहारे चुनाव नहीं जीता जा सकता। उसे पिछड़ी और दलित जातियों के बीच अपने जनाधार को बचाए रखना होगा।
