चुनाव आयोग क्यों पलट रहा अपने पुराने फैसले? क्या दबाव में है ज्ञानेश कुमार?
चुनाव आयोग अब रोलबैक आयोग बन चुका है....तो ये कहना गलत नहीं होगा. हालांकि, आयोग के रोलबैक वाले फैसलों से यह साबित नहीं होता कि पहले की प्रक्रिया में हुई सभी समस्याएं दूर हो गई हैं और ना तो राजनीतिक दलों के सवाल खत्म हो गए हैं
क्या ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व वाला चुनाव आयोग दबाव में आ चुका है? क्या ज्ञानेश कुमार को न्यायपालिका का शिंकजा कसने का डर है? क्या ज्ञानेश कुमार को खुद पर महाभियोग चलने का भी डर सता रहा है. ये बात हम इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इंडियन एक्सप्रेस के विस्फोटक खुलासे के बाद चुनाव आयोग में फैसलों को लेकर रोलबैक का अभियान चल रहा है. चुनाव आयोग अपने जिन फैसलों और खासतौर से एसआईआर के निर्णय को लेकर इतरा रहा था अब उन्हीं फैसलों को वापस लेने या पलटने में जुटा है. क्या सड़क पर विपक्ष और छात्रों का आंदोलन अपना रंग दिखा रहा है.
लोकतंत्र में चुनाव सिर्फ वोट डालने का नाम नहीं है. लोकतंत्र की बुनियाद इस भरोसे पर टिकी होती है कि हर पात्र नागरिक को वोट देने का अधिकार मिलेगा, उसकी आवाज मतपेटी तक पहुंचेगी और चुनाव कराने वाली संस्था किसी भी राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर काम करेगी. लेकिन जब इसी संस्था के भीतर फैसले लेने के तरीके पर सवाल उठने लगें, जब दो चुनाव आयुक्त अपने ही मुख्य चुनाव आयुक्त के नेतृत्व में लिए जा रहे फैसलों पर बार-बार लिखित आपत्ति दर्ज कराएं, जब नए वोटरों के रजिस्ट्रेशन के फॉर्म में ऐसा सवाल जुड़ जाए जिसकी जरूरत और वैधता पर विवाद हो, और जब इन मामलों को लेकर विपक्ष सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाए तो सवाल सिर्फ एक प्रक्रिया का नहीं रह जाता है. सवाल चुनाव आयोग की संस्थागत विश्वसनीयता का बन जाता है.
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की मुश्किलें बढ़ती जा रही है. एक तरफ इंडियन एक्सप्रेस की वह रिपोर्ट है, जिसमें चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की ओर से दस महीनों में कम-से-कम 14 बार दर्ज की गई आपत्तियों का खुलासा हुआ. दूसरी तरफ राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के नेताओं की याचिका है, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग, ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों से जवाब मांगा है. और तीसरी तरफ देश की राजधानी नई दिल्ली की सड़कों पर विपक्ष यानी इँडिया गठबंधन को विरोध प्रदर्शन, छात्र संगठनों और सीजेपी यानी कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन है, जिसके केंद्र में ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग और मोदी सरकार पर वोट चोरी कर चुनाव जीतने के आरोप शामिल हैं. इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यही है जब चुनाव आयोग के भीतर ही निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल उठ रहे हो तो देश के मतदाता आयोग द्वारा लिए गए फैसलों पर भरोसा कैसे करें?
विवाद की शुरुआत इंडियन एक्सप्रेस की उस रिपोर्ट से हुई जिसने 23-25 सितंबर के दौरान चुनाव आयोग के भीतर दोनों चुनाव आयुक्त द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर जताई गई आपत्तियां सार्वजनिक हो गई. रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कम-से-कम 14 बार अलग-अलग फैसलों और प्रक्रियाओं पर लिखित आपत्ति दर्ज कराई. ये आपत्तियां मतदाता सूची में नाम जोड़ने, नाम हटाने, नए मतदाताओं के रजिस्ट्रेशन, चुनावी डेटा तक पहुंच और सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से संबंधित थीं. रिपोर्ट में ये भई बातें सामने आई कि कुछ कदम उनकी जानकारी या सहमति लिए बिना लिये गए जिसकी जानकारी उन्हें आयोग के भीतर नहीं बल्कि मीडिया रिपोर्ट्स से बता लगा. कुछ मामलों में दोनों चुनाव आयुक्त ने फैसलों को अनधिकृत और अवैध तक करार दिया. इन खबरों के सामने आए एक महीने होने को है लेकिन मुख्य चुनाव आयुक्त ने सामने आकर सफाई देना भी अब तक जरूरी नहीं समझा है.
केवल प्रेस रिलीज जारी की जा रही है. और पुराने फैसलों के रोलबैंक का एलान किया जा रहा है. इँडिया ब्लॉक के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका दायर की है उसमें चुनाव आयोग से बताने को कहा गया है कि एसआईआर को लेकर किस प्रकार और कब फैसले लिए गए? विपक्ष और छात्र संगठनों के आंदोलन और सुप्रीम कोर्ट में मामला पहुंचने के बाद और उसके पहले से लगातार चुनाव आयोग अपने पुराने फैसलों को पलटने में लगा है. चुनाव आयोग ने नए वोटरों को जोड़ने के लिए स्पेशल समरी रिवीजन को शुरू करने की घोषणा की है जो कि साल 2025 के शुरुआत से ही बंद था. आयोग पर आरोप लग रहे थे कि जेन-जी जो इन दिनों सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरा हुआ उन्हें वोटर बनने से रोक रहा है. लेकिन स्पेशल समरी रिवीजन फिर से शुरू किया जा रहा है. यानि जो युवा 1 जनवरी को 18 वर्ष या उससे ज्यादा के हो गए वे अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वा सकेंगे.
चुनाव आयोग ने एक और बड़ा फैसला लिया है. आयोग ने राजनीतिक दलों को Readable Format में मतदाता सूचियां उपलब्ध कराने का फैसला लिया है जिसकी मांग लगातार राहुल गांधी करते आ रहे थे और चुनाव आयोग उनकी मांग को खारिज कर रहा था. इससे राजनीतिक दल मतदाता सूची में दर्ज नामों की जांच कर सकेंगे. वे नामों की गलतियों, छूटे हुए मतदाताओं और दूसरी विसंगतियों की पहचान कर सकेंगे. चुनाव आयोग ने दिल्ली और महाराष्ट्र में मतदाता सूची से जुड़े दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की समयसीमा को बढ़ाया है. जिन 20 राज्यों में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन का काम पूरा हो चुका है और अगर किसी वोटर का एसआईआर के दौरान छूट गया है उन राज्यों में उन वोटरों के नाम को फिर से जोड़ने के लिए स्पेशल ड्राइव चलाया जा रहा है. इसमें वो दो राज्य बिहार पश्चिम बंगाल भी शामिल हैं जहां सबसे ज्यादा एसआईआर के दौरान नाम कटे थे.
फॉर्म -7 के दुरुउपयोग को लेकर भी चुनाव आयोग विपक्ष के निशाने पर था. क्योंकि कई जगहों पर ये बात सामने आई कि लोग बल्क में वोटरों के नाम सूची से हटाने के लिए फॉर्म -7 भरकर जना कर रहे हैं. ये भी आरोप है कि मुसलमानों के नाम सबसे ज्यादा फॉर्म -7 के जरिए काटे जा रहे हैं. इस विवाद के बढ़ने के बाद चुनाव आयोग ने एक व्यक्ति की ओर से जमा किए जा सकने वाले फॉर्म-7 की संख्या सीमित कर दी. SIR के दौरान एक व्यक्ति ऑनलाइन या ऑफलाइन, दोनों माध्यमों को मिलाकर अधिकतम 10 फॉर्म-7 जमा कर सकता है. फॉर्म-7 का इस्तेमाल किसी मतदाता का नाम वोटर लिस्ट से हटाने की मांग करने या किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में शामिल किए जाने पर आपत्ति दर्ज कराने के लिए किया जाता है.
अब बात करते हैं उस फॉर्म-6 की, जिसका इस्तेमाल नए मतदाता के रूप में रजिस्ट्रेशन के लिए किया जाता है. जुलाई 2026 में ऑनलाइन फॉर्म-6 में SIR से संबंधित एक अतिरिक्त घोषणा जोड़ी गई. इसमें आवेदक से पूछा जाने लगा कि क्या उसका या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन में मौजूद था या नहीं. इस प्रश्न का उत्तर दिए बिना आवेदन आगे नहीं बढ़ता था. रिपोर्ट में बताया गया कि चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने 16 मई को इस तरह के बदलाव की वैधता पर सवाल उठाए थे. सुखबीर सिंह संधू ने 19 मई को इस आपत्ति से सहमति जताई थी. इसके बावजूद जुलाई में ऑनलाइन फॉर्म में यह अतिरिक्त घोषणा दिखाई देने लगी. 13 अगस्त को संधू ने इसे अनधिकृत बताते हुए हटाने की बात कही थी.
अब सवाल है कि जब दो चुनाव आयुक्त पहले ही इस बदलाव पर आपत्ति दर्ज करा चुके थे, तो फिर इसे लागू करने का निर्णय कैसे हुआ? क्या नियमों में आवश्यक संशोधन किया गया था? क्या संबंधित मंजूरी ली गई थी? और अगर यह बदलाव जरूरी था, तो इसके पीछे कानूनी आधार क्या था? ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि मतदाता बनने की प्रक्रिया किसी तकनीकी पोर्टल तक सीमित नहीं है। यह नागरिक के संवैधानिक अधिकार से जुड़ी प्रक्रिया है.
मान लीजिए कोई युवा पहली बार वोटर बनने के लिए आवेदन करता है. उसके पास अपनी उम्र और निवास से संबंधित जरूरी दस्तावेज हैं, लेकिन उसके माता-पिता या दादा-दादी का नाम पुरानी मतदाता सूची में नहीं मिलता है. क्या सिर्फ इस वजह से उसका आवेदन अटकना चाहिए? यही वह सवाल है जिसने फॉर्म-6 के बदलाव को राजनीतिक और कानूनी विवाद का विषय बना दिया. चुनाव आयोग के इस फैसले को लेकर मचे बवाल के बाद सितंबर के आखिर में आयोग ने SIR पूरा कर चुके राज्यों में ECINet पोर्टल से इस अतिरिक्त घोषणा को हटा दिया. यह एक महत्वपूर्ण बदलाव था. लेकिन अब यह जानना भी जरूरी है कि जिन आवेदकों को इस शर्त के कारण परेशानी हुई, उनके मामलों का क्या हुआ? क्या उनके आवेदन दोबारा जांचे गए? क्या उन्हें नाम दर्ज कराने में राहत मिली? क्या आयोग ने ऐसी स्थिति से निपटने के लिए कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए?
रिपोर्ट में गोवा का एक मामला सामने आया, जहां अधिकारियों ने सुनवाई और दस्तावेजों की जांच के बाद 97 मतदाताओं को पात्र पाया, लेकिन तकनीकी व्यवस्था में उनके नाम बहाल करने का विकल्प उपलब्ध नहीं था. रिपोर्ट के मुताबिक, इस समस्या के समाधान के लिए अधिकारियों ने कई बार चिठ्ठी लिखना पड़ा. अगर किसी अधिकारी को जांच के बाद यह लगता है कि नागरिक मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने का पात्र है, लेकिन सॉफ्टवेयर में उसका नाम बहाल करने की सुविधा ही नहीं है, तो यह सिर्फ तकनीकी परेशानी नहीं है. यह ERO के प्रशासनिक अधिकार में हस्तक्षेप भी है. आयोग ने 26 सितंबर को सॉफ्टवेयर की समीक्षा के लिए समिति बनाने और मतदाताओं के सत्यापन की प्रक्रिया में राहत देने जैसे कदम घोषित किए. कुछ मामलों में अधिकारियों को घर जाकर दस्तावेजों का सत्यापन करने की व्यवस्था भी सामने आई.
2 अक्टूबर से विपक्ष और छात्रों ने चुनाव आयोग के खिलाफ सड़क पर आंदोलन छेड़ दिया है. एक तरफ सड़कों पर संग्राम देखने को मिला तो विपक्ष ने अदालत की चौखट पर भी चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के नेताओं ने भी सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. चुनाव आयोग के एसआईआर से जुड़े निर्णयों और प्रक्रियाओं को चुनौती देते हुए अदालतों में याचिकाएं दाखिल की गईं. उनकी याचिका में SIR के दौरान चुनाव आयोग की सामूहिक शक्तियों के कथित एकतरफा इस्तेमाल और मतदाता सूची में नाम हटाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए. सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों से जवाब मांगा है
इस विवाद का एक उल्लेखनीय पहलू यह है कि ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग केवल विपक्षी दलों तक सीमित नहीं रही है.दिल्ली मुंबई में भी सीजेपी का प्रदर्शन देखने को मिला. तो ये सभी जंतर मंतर पर भी प्रदर्शन करना चाहते थे. लेकिन प्रदर्शन करने वालें जगहों में से जंतर मंतर का नाम ही सरकार ने हटा दिया. सरकार और दिल्ली पुलिस के इस फैसले को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. 12 अक्टूबर को दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन से संबंधित अपनी व्यवस्था में बदलाव करते हुए जंतर-मंतर को अधिसूचित प्रदर्शन स्थल के रूप में हटाया और बुराड़ी मैदान, रामलीला मैदान तथा CBD ग्राउंड जैसे वैकल्पिक स्थान को प्रदर्शन करने के लिए बताया. सवाल उठ रहा है कि जब कनॉट प्लेस जंतर मंतर पर भारी विरोध प्रदर्शन की आवाज सरकार के कानों तक नहीं पहुंच रही तो बुराड़ी और सीबीडी ग्राउंड से उठने वाली आवाज कहां पहुंचेगी?
बहरहाल चुनाव आयोग अब रोलबैक आयोग बन चुका है....तो ये कहना गलत नहीं होगा. हालांकि, आयोग के रोलबैक वाले फैसलों से यह साबित नहीं होता कि पहले की प्रक्रिया में हुई सभी समस्याएं दूर हो गई हैं और ना तो राजनीतिक दलों के सवाल खत्म हो गए हैं...ऐसा भी नहीं है कि चुनाव आयोग द्वारा एक के बाद एक वापस लिए जा रहे अपना फैसलों के बाद देशभर में चला रहा आंदोलन खत्म होने वाला है. विपक्ष के साफ मानना है कि इन प्रक्रियाओं के जरिए पश्चिम बंगाल समेत कई राज्यों के चुनाव नतीजे प्रभावित करने की कोशिश की गई है. फ्लैश प्रोटेस्ट जारी है. और नवंबर महीने से विपक्ष फिर से ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर बड़ा आंदोलन शुरू करने वाला है. ऐसे में ज्ञानेश कुमार और मोदी सरकार की मुश्किलें थमने वाली नहीं है भले रिजिम चेंज जैसे मुद्दों को सामने लाकर भ्रम पैदा करने की कोशिश की जा रही हो.
