'वोट बचाओ' बनाम 'लोकतंत्र बचाओ', 13 करोड़ वोटों के विवाद पर सड़क पर उतरा सत्ता-विपक्ष
देश की राजनीति इस समय 'वोट बचाओ, देश बचाओ' और 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता भगाओ' जैसे दो ध्रुवीय नारों के बीच कुरुक्षेत्र बन चुकी है। चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के तहत करीब 13 करोड़ (लगभग 15%) वोटरों के नाम हटाने के बाद विपक्ष और छात्र संगठन आक्रामक हैं।
'वोट बचाओ, देश बचाओ' बनाम 'लोकतंत्र बचाओ, अराजकता भगाओ'... इन दो नारों के बीच इस वक्त देश की राजनीति पूरी तरह से कुरुक्षेत्र के मैदान में तब्दील हो चुकी है। एक तरफ जहां कांग्रेस और समूचा विपक्ष (INDIA गठबंधन) चुनाव आयोग से लेकर मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री और दिग्गज नेता गलियों और सड़कों की धूल छानते नजर आ रहे हैं।
दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में विपक्षी दलों ने हुंकार भरी, तो इसके जवाब में बीजेपी ने हैदराबाद से लेकर गोरखपुर और बरेली तक 'लोकतंत्र बचाओ' पदयात्राओं का आक्रामक सिलसिला शुरू कर दिया। लेकिन इस राजनीतिक रार के बीच सबसे बड़ा और दिलचस्प सवाल यही उठता है—जो दल देश के 72 फीसदी भूभाग पर शासन कर रहा हो, उसे आखिर किससे लोकतंत्र बचाने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है?
SIR विवाद और 13 करोड़ वोटों का 'खेल'
इस पूरे विवाद की जड़ में चुनाव आयोग द्वारा देशभर में कराया गया 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) है। आंकड़ों के मुताबिक, इस प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची से करीब 13 करोड़ वोटरों के नाम हटा दिए गए, जो कि देश के कुल मतदाताओं का लगभग 15 फीसदी है। विपक्ष का गंभीर आरोप है कि इस प्रक्रिया में घुसपैठिया बताकर पात्र नागरिकों, विशेष रूप से अल्पसंख्यकों (मुसलमानों) और महिलाओं के नाम काटे गए हैं।
बात सिर्फ विपक्ष के आरोपों तक सीमित नहीं है। चुनाव आयोग के भीतर से आई खबरों ने भी आग में घी का काम किया। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली और एसआईआर को लेकर साथी चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधु और विवेक जोशी ने 10 महीनों में 14 बार अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। फॉर्म-6 में बदलाव से लेकर कई फैसलों पर आयोग के भीतर ही मतभेद उभरे, जिसके बाद अक्टूबर से छात्र संगठन और विपक्षी दल मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर सड़कों पर हैं।
सत्ता पक्ष की जवाबी पदयात्रा और दोहरे मापदंड का सवाल
विपक्ष की लामबंदी का असर फीका करने के लिए बीजेपी ने पूरे देश में पदयात्राएं और रोड शो शुरू किए। हैदराबाद में गृह मंत्री अमित शाह हाथ में तिरंगा लेकर सड़क पर उतरे, तो बरेली में स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और कोलकाता-गोरखपुर में बीजेपी नेता नितिन नबीन ने कमान संभाली। बीजेपी का तर्क है कि राहुल गांधी और INDIA ब्लॉक चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम कर रहे हैं और जनादेश का अपमान कर रहे हैं।
लेकिन यहां एक बड़ा विरोधाभास भी देखने को मिला। रामलीला मैदान में INDIA ब्लॉक की रैली को लेकर बीजेपी और व्यापारी संगठनों ने यह तर्क दिया था कि त्योहारी सीजन में इससे 10 से 15 हजार करोड़ रुपये का व्यावसायिक नुकसान हो रहा है। सवाल यह है कि जब बीजेपी के दिग्गज नेता देश के अलग-अलग शहरों में भारी लामबंदी के साथ रोड शो और जनसभाएं कर रहे हैं, तो क्या उससे व्यापारियों पर धनवर्षा हो रही है? यह दोहरा रवैया क्यों?
72% भूभाग पर राज करने वाली BJP सड़कों पर क्यों?
बीजेपी पिछले 12 सालों से केंद्र की सत्ता में है। देश के 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में बीजेपी या उसके एनडीए (NDA) सहयोगियों की सरकारें हैं। गृह मंत्री अमित शाह, जिनकी तुलना बीजेपी के समर्थक सरदार पटेल से करते हैं, उनके रहते हुए भी अगर सरकार को सड़कों पर उतरना पड़े, तो यह कई सवाल खड़े करता है।
लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता बनाए रखना, चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करना और नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना सत्ता की जिम्मेदारी होती है। यदि मतदाता सूची को लेकर सवाल उठ रहे हैं, तो उनका जवाब तथ्यों और आंकड़ों के साथ देने की जिम्मेदारी किसकी है?
क्या बीजेपी को यह लग रहा है कि विपक्ष का 'वोट बचाओ, देश बचाओ' अभियान आम जनता के दिलों में जगह बना रहा है? क्या पार्टी को डर है कि SIR और 'वोट चोरी' का मुद्दा 2027 के विधानसभा चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव में उसकी राजनीतिक जमीन खिसका सकता है?
राजनीतिक रैलियों से खत्म नहीं होंगे संवैधानिक सवाल
इतिहास गवाह है कि जब देश में पेपर लीक को लेकर आंदोलन हुआ था, तो सरकार उसे पहले खारिज कर रही थी, लेकिन बाद में शिक्षा मंत्री को कदम वापस खींचने पड़े थे। ठीक वैसे ही, बीजेपी देश के हर जिले में पदयात्रा करे या रोड शो, लेकिन इससे एसआईआर (SIR) को लेकर उठे सवाल अपने आप खत्म नहीं होंगे।
संवैधानिक संस्थाओं का सम्मान जरूरी है, लेकिन उनकी जवाबदेही उससे भी ज्यादा जरूरी है। यदि चुनाव आयोग पर आरोप गलत हैं, तो आयोग को खुद मीडिया के सामने आकर तथ्यों के साथ अपनी सफाई देनी चाहिए। आरोप लगाने वालों को 'लोकतंत्र विरोधी' करार देने या राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन करने से मतदाता का भरोसा वापस नहीं जीता जा सकता। लोकतंत्र रैलियों से नहीं, बल्कि संस्थाओं की पारदर्शिता से बचता है।
