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सेंसेक्स और निफ्टी का खराब प्रदर्शन, जानिए क्यों डूब रहे हैं आम निवेशकों के पैसे

भारतीय शेयर बाजार में बीते कुछ समय से लगातार भारी गिरावट दर्ज की जा रही है, जिससे आम निवेशकों को बड़ा नुकसान हुआ है। सेंसेक्स और निफ्टी अपने रिकॉर्ड स्तर से काफी नीचे आ चुके हैं। इस गिरावट की मुख्य वजह वैश्विक तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं।


शेयर बाजार में निवेश करने वाले निवेशक की गाढ़ी कमाई हर रोज कैसे पानी में बह रहा है ये किसी से भी छिपा नहीं है. विदेशी निवेशकों के भारतीय शेयर बाजार में रोजाना की जा रही बिकवाली की आंधी में रिटेल निवेशक कंगाल होते जा रहे हैं. रिटेल निवेशक जब अपना पोर्टफोलियो हर रोज देखता होगा तो उसके आंखों से खून के आंसू निकल रहे होंगे. एक तरफ शेयर बाजार.... निवेशकों को खून के आंसू रुला रहा है उसपर से चौतरफा महंगाई ने घर के किचन के बजट को बिगाड़ रखा है. साग-सब्जियों से लेकर खाने के तेल की महंगाई चरम पर है. उसपर से कम बारिश और अल नीनो का असर अभी से नजर आने लगा है. अल नीनो का असर ऐसा है कि देश में सभी प्रकार का फर्टिलाइजर की सेल्स में इस वित्त वर्ष के पहले छमाही में कमी देखने को मिली है. आप जीडीपी के 7.8 फीसदी के आंकड़े पर मत जाइए..... हालात लगातार ....खराब होते जा रहे हैं विदेशी निवेशकों से लेकर घरेलू निवेशकों का भरोसा हिल चुका है.... महंगाई कमाई में सेंध लगा रही है और पेट्रोल डीजल से लेकर रसोई गैस की सिलेंडर की महंगाई फिर आपके चौखट पर दस्तक देने वाली है. क्योंकि कच्चा तेल 120 डॉलर प्रति बैरल के लेवल पर जा पहुंचा है......तो अपनी कुर्सी की सीट बेल्ट अभी से बांध लिजिए.

हमने आपको पिछले हफ्ते ही सियासत में बताया था कि कैसे भारत के शेयर बाजार निवेशक इन दिनों राम भरोसे निवेश कर रहे हैं. बाजार हर रोज गोता लगा रहा है ...पर सरकार बेपरवाह है. उसपर से बाजार को संभालने वाले कदम उठाने की जगह वो विदेशी निवेशकों और रिटेल निवेशकों द्वारा म्यूचुअल फंड्स, यूलिप के जरिए किए जाने वाले निवेश से आ रही अधिक नगदी को हबाजार में गिरावट के लिए जिम्मेदार ठहरा रही है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण विदेश की धरती पर बैठकर ये बातें कह रही थीं. 2024 में लोकसभा चुनाव के नतीजे आने से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गृह मंत्री अमित शाह निवेशकों को शेयर बाजार में निवेश की सलाह दे रहे थे. हालांकि वे कोई बाजार के एक्सपर्ट नहीं हैं और ना फाइनेंशियल एडवाइजर्स...

लेकिन उनके सलाह के बाद जिन लोगों ने भारतीय शेयर बाजार में निवेश करना शुरू किया होगा वे अपना या तो सिर पकड़ कर आज बैठे होंगे या फिर अपना सिर फोड़ रहे होंगे. क्योंकि लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद सितंबर महीने के आखिरी हफ्ते से शेयर बाजार में गिरावट और बिकवाली का जो दौर शुरू हुआ वो अभी तक जारी है. पिछले 2 वर्ष में सेंसेक्स ने करीब 8 फीसदी और निफ्टी ने 6.5 फीसदी का नेगेटिव रिटर्न दिया है. जबकि साल 2026 में सेंसेक्स ने 14.2 फीसदी और निफ्टी ने 13.6 फीसदी का नेगेटिव रिटर्न दिया है. पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा खराब प्रदर्शन का भारतीय शेयर बाजार का ही रहा है. 1 जनवरी 2026 को बीएसई सेंसेक्स 85188 अंक पर क्लोज हुआ था. जो कि 23 अक्तूबर 2026 को 73123 अँकों पर क्लोज हुआ था. यानी 12065 अंकों की गिरावट सेंसेक्स में इस देखने को मिली है. निफ्टी 50... 1 जनवरी को 26,146 पर क्लोज हुआ था जबकि 23 अक्तूबर को 22,600 अंकों पर बंद हुआ था. निफ्टी में 3546 अंकों की गिरावट इस वर्ष अबतक देखने को मिली है. और जो बाजार में बिकवाली जैसी देखने को मिल रही है ये यहां और भी बढ़ सकता है.

बाजार में बिकवाली के कई कारण बताये जाते हैं. वैश्विक तनाव तो कारण है ही, कच्चे तेल की कीमत में उछाल बड़ी वजह है लेकिन विदेशी निवेशकों का भारतीय शेयर बाजार से मुंह फेरना सबसे अहम कारणों में एक है. बीते दो दशकों में जिस भारतीय शेयर बाजार को सबसे बेहतरीन इमर्जिंग मार्केट्स बताया जा रहा था वो निवेश के लिहाज से सबसे फीका बाजार अब बताया जा रहा है. विदेशी निवेशकों की बिकवाली के कारणों को देखें तो दुनिया के दूसरे बाजार भारतीय बाजार के मुकाबले ज्यादा आकर्षित उन्हें नजर आ रहे हैं तो भारत में निवेशकों पर लगने वाला भारी भरकम टैक्स का टेरर उन्हें सबसे ज्यादा परेशान कर रहा है. सरकार को पिछले कई महीनों से ना जाने कितने लोगों ने भारी भरकम टैक्स लगाने को लेकर आगाह किया था. लेकिन सरकार बेफिक्र हो चुकी थी. जैसे बेफिक्र होकर हाथी सड़कों पर चलता है. निर्मला सीतारमण ने लगातार तीसरी बार केंद्र में मोदी सरकार के बनने के बाद बजट में Long Term Capital Gain tax को 10 फीसदी से बढ़ाकर 12.50 फीसदी कर दिया था तो शार्ट टर्म कैपिटल गेन टैक्स को 15 फीसदी से बढ़ाकर 20 फीसदी कर दिया. जिस Long Term Capital Gain tax को 2004 में खत्म कर दिया गया था क्योंकि तब सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स लगाने की शुरुआत हुई. लेकिन 2018 में मोदी सरकार फिर से Long Term Capital Gain tax ले आई लेकिन सिक्योरिटी ट्रांजैक्शन टैक्स को वापस नहीं लिया. यानी टैक्स पर टैक्स.

विदेशी निवेशकों में भारत की छवि जब एँटी- इँवेस्टर्स की होती जा रही है तो अब मोदी सरकार की नींद खुल रही है. इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक अगले वर्ष 1 फरवरी को जब सरकार वित्त वर्ष 2027-28 के लिए बजट पेश करेगी तो घरेलू और विदेशी निवेशकों के लिए लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स (LTCG) टैक्स को मौजूदा 12.5 फीसदी से कम किया जा सकता है. विदेशी निवेशकों का मानना है कि भारत में 12.5 फीसदी लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स दूसरे देशों के मुकाबले काफी ज्यादा है. चीन, इंडोनेशिया और ब्राजील जैसे कई देशों में शेयरों से होने वाले मुनाफे पर या तो कोई टैक्स नहीं लगता या बहुत कम टैक्स लगाया जाता है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले दिनों कहा था कि लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स पर बहस होना अच्छी बात है और वह इस विषय पर लोगों की राय सुनने के लिए तैयार हैं.

इसके अलावा,विदेशी निवेशकों को इस बात की सुविधा देने पर भी विचार किया जा रहा है कि उन्हें शेयरों से होने वाले मुनाफे पर जो टैक्स देना पड़ता है वो रुपये में हुई बढ़त पर नहीं बल्कि डॉलर में हुई बढ़त के आधार पर देना पड़े. दरअसल डॉलर के मुकाबले रुपये में आ रही कमजोरी के चलते विदेशी निवेशकों को ज्यादा फायदा नहीं हो रहा है. इसलिए भी वे भारतीय शेयर बाजार से रूख् कर रहे हैं. ये माना जा रहा है इन कदमों से भारतीय शेयर बाजार में निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा.

इस रिपोर्ट के मुताबिक सरकार के अधिकारियों की दो चिताएं हैं पहली चिंता ये पिछले दो साल में शेयर बाजार से निवेशकों को कोई रिटर्न नहीं मिला है या उन्हें नुकसान उठाना पड़ा है. इसके साथ ही लोगों की सैलरी में भी बहुत ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई है. इन दोनों वजहों से लोगों का भरोसा कमजोर हुआ है. इसकी सबसे ज्यादा मार मिडिल क्लास पर पड़ी है जो कि कोरोना महामारी के बाद से बड़ी संख्या में शेयर बाजार में निवेश कर रहा था. इस रिपोर्ट में एक डेटा के हवाले से बताया गया कि मार्च 2020 में NSE पर लिस्टेड कंपनियों में छोटे निवेशकों की हिस्सेदारी 6.58 फीसदी थी. उस समय इस हिस्सेदारी का वैल्यू 7.23 लाख करोड़ रुपये था. जून 2024 तक यह हिस्सेदारी बढ़कर 7.66 फीसदी हो गई और इसका वैल्यू 33.16 लाख करोड़ रुपये तक जा पहुंचा. लेकिन मार्च 2026 में छोटे निवेशकों की हिस्सेदारी घटकर 7.12 फीसदी रह गई और वैल्यू घटकर 28.97 लाख करोड़ रुपये पर आ गई. इसका मतलब है कि शेयर बाजार में छोटे निवेशकों को पहले के मुकाबले नुकसान हुआ है. मार्च 2020 में 2.12 करोड़ डीमैट खात थे जो कि सितंबर 2026 में बढ़कर 19.34 करोड़ हो गई. यानी शेयर बाजार में निवेश करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ी, लेकिन बाजार में लगातार गिरावट से उका पोर्टफोलियो नेगेटिव में आ चुका है. सरकार की दूसरी बड़ी चिंता विदेशी निवेशकों के बाजार से पैसा निकालने को लेकर है. पहले सरकार को भरोसा था कि अगर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय शेयर बाजार से बड़ी मात्रा में पैसा निकाल भी लेंगे तो तो घरेलू म्यूचुअल फंड में आने वाला पैसा इस नुकसान की भरपाई कर देगा. आपको याद होगा वित्त मंत्री ने रिटेल निवेशकों को Shock Absorber कहा था.

आपको याद होगा कि वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8 फीसदी जीडीपी का डेटा आया तो कैसे सरकार के लोग उत्सव मना रहे थे. अब सवाल उठता है जब GDP ग्रोथ इतना मजबूत है तो उसका असर शेयर बाजार पर कोई नहीं दिखता है? निवेशक इन आंकड़ों के बाद भी इतने हताश क्यों हैं? सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी है कि वह देश की मजबूत आर्थिक विकास दर और शेयर बाजार की कमजोर स्थिति के बीच तालमेल कैसे समझाए. GDP के बेहतरीन डेटा के बाद भी लोगों का वेतन क्यों नहीं बढ़ रहा है. और इस बात को लेकर खुद देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंथ नागेश्वरन भी चिंता जता चुके हैं.

ये बात हुई शेयर बाजार के निवेशकों की जिन्हें अब निवेश पर नुकसान हो रहा है लेकिन त्योहारी सीजन में महंगाई का करंट भी निवेशकों से लेकर देश के हर नागरिक को परेशान कर सकता है. दरअसल इँटरनेशनल मार्केट में कच्चे तेल की कीमत 115 डॉलर प्रति बैरल के करीब जा पहुंचा है. जबकि भारत के लिए क्रूड ऑयल का बास्केट प्राइस 120 डॉलर प्रति बैरल के लेवल पर है. कच्चे चेल के दामों में उछाल के बाद दीवाली छठ वाले इस त्योहारी सीजन में एयर ट्रैवल करने वालों को ज्यादा जेब ढीली करनी पड़ेगी. तो सरकार पर पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाने का भी दबाव बढ़ता जा रहा है क्योंकि सरकारी तेल कंपनियों को पेट्रोल डीजल बेचने पर नुकसान हो रहा है.

देश में महंगाई में लगातार इजाफा होता जा रहा है. सितंबर महीने में खुदरा महंगाई दर 5.54 फीसदी खाद्य महंगाई दर 7.74 फीसदी पर जा पहुंची है. और कम बारिश, सूखे और अल नीनो के असर के चलते खाद्य महंगाई में और भी इजाफा देखने को मिल सकता है. खरीफ फसल की बुआई पर तो हमने असर देखा ही रबी फसलों की बुआई भी अल नीनो के चलते प्रभावित हो सकती है. भारतीय रिजर्व बैंक ने भी सितंबर महीने में मॉनिटरी पॉलिसी का एलान करने के दौरान इसे लेकर अपनी चिंता जाहिर कर चुका है.

देश में बारिश की कमी और अल नीनो के चलते इस साल देश में यूरिया समेत सभी तरह की खाद की घरेलू बिक्री में गिरावट आई है. अप्रैल से सितंबर 2026 के दौरान खाद की सेल्स में पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले सबसे ज्यादा गिरावट कॉम्प्लेक्स फर्टिलाइजर यानी मिश्रित खाद की बिक्री में दर्ज की गई है. इसकी सेल्स में 22.2 फीसदी की गिरावट आई है. सबसे ज्यादा चिंता यूरिया को लेकर है. बारिश की कमी और अल नीनो के कारण मौसम के सूखे रहने से किसान खाद का कम इस्तेमाल कर रहे हैं जिससे यूरिया की मांग में कमी आई है. जबकि यूरिया का उत्पादन और इँपोर्ट दोनों बढ़ा है लेकिन घरेलू सेल्स में कमी आई है. अल नीनो का ही असर है कि सितंबर महीने में टैक्टर के सेल्स 18 फीसदी की कमी आई है. यानि भले ही अर्थव्यवस्था में आंकड़ों के जरिए मजबूती बताने की कोशिश जा रही हो लेकिन निवेशक किसान मिडिल क्लास हर कोई परेशान नजर आ रहा है. पीएम मोदी जीडीपी के आंकड़ों पर देशवासियों को बधाई देते हैं लेकिन सवाल उठता है कमरतोड़ महंगाई और निवेशकों की गाढ़ी कमाई में लगी रही सेंध को लेकर सरकार कब सुध लेगी? क्या इसके लिए 4 महीने इंतजार करना होगा? जबकि निवेशकों से लेकर आम नागरिकों के सामने हर रोज एक नई मुसीबत सामने आ रही है.

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