कूटनीति में वाहवाही, व्यापार में मात: कैसे पटेगी 171 अरब डॉलर की खाई?
दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन। 'द फ़ेडरल देश' के शो 'सियासत' में एंकर मनीष कुमार ने बताया कैसे चीन-रूस के साथ बढ़ता 171 अरब डॉलर का व्यापार घाटा बड़ी चुनौती है।
Siyasat: पश्चिम एशिया के सुलगते तनाव और रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत की राजधानी नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन का शंखनाद हो चुका है। पूरी दुनिया की नज़रें नई दिल्ली पर टिकी हैं, क्योंकि 2020 की गलवान झड़प के बाद पहली बार चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत की धरती पर हैं, और उनके साथ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भी मंच साझा कर रहे हैं। कूटनीतिक रूप से इसे भारत की एक बड़ी कामयाबी माना जा रहा है।
लेकिन, इन शानदार तस्वीरों और कूटनीतिक समझौतों के पीछे एक बहुत कड़वा आर्थिक सच छिपा है। 'द फ़ेडरल देश' के खास शो 'सियासत' में एंकर मनीष कुमार ने इस कूटनीतिक चमक के पीछे के सबसे बड़े आर्थिक संकट का विस्तार से विश्लेषण किया। मनीष कुमार ने बताया कि चीन और रूस के साथ भारत का व्यापार असंतुलन (Trade Deficit) अब संयुक्त रूप से 171 अरब डॉलर के खतरनाक स्तर को पार कर चुका है।
'सियासत' शो में पेश किए गए आंकड़ों के आधार पर आइए इस आर्थिक चुनौती की ज़मीनी हकीकत को समझते हैं:
1. गलवान के बाद भी चीन पर निर्भरता चरम पर
एंकर मनीष कुमार ने अपने विश्लेषण में स्पष्ट किया कि सीमा पर जारी तनातनी के बावजूद, भारत और चीन के बीच आर्थिक निर्भरता कम होने के बजाय और गहरी हुई है।
घाटे का पहाड़: वर्तमान में चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 112 अरब डॉलर से अधिक हो चुका है। एक दशक पहले (2016-17) यह 61.28 अरब डॉलर था। यानी हम चीन को जितना माल बेचते हैं, उससे 6 गुना ज्यादा वहां से खरीदते हैं।
आयात में बेतहाशा उछाल: गलवान झड़प वाले वित्तीय वर्ष (2020-21) में भारत का चीन से आयात 65 अरब डॉलर था। वहीं, वित्त वर्ष 2025-26 में यह उछलकर रिकॉर्ड 131.63 अरब डॉलर पर पहुंच गया है।
चीन की व्यापारिक चालाकी: चीन भारत से लौह अयस्क और कपास जैसे कच्चे माल मंगाता है। लेकिन जब भारत अपनी ताकत यानी आईटी (IT) और फार्मास्यूटिकल्स को चीनी बाजार में बेचना चाहता है, तो चीन जटिल 'गैर-टैरिफ बाधाएं' (Non-Tariff Barriers) खड़ी कर देता है।
2. रूस के साथ व्यापार: सस्ते तेल ने बिगाड़ा समीकरण
'सियासत' में इस बात पर भी जोर दिया गया कि रूस के साथ भारत की ऐतिहासिक दोस्ती है, लेकिन व्यापारिक समीकरण पूरी तरह एकतरफा बना हुआ है।
आयात 55 अरब, निर्यात 5 अरब से भी कम: वित्त वर्ष 2025-26 में दोनों देशों के बीच कुल व्यापार लगभग 60 अरब डॉलर रहा। इसमें से भारत ने 55 अरब डॉलर का भारी आयात किया, जबकि रूस को हमारा निर्यात 4.88 अरब डॉलर से भी कम रहा।
कच्चे तेल की हिस्सेदारी: इस भारी असंतुलन की मुख्य वजह रियायती दरों पर रूसी कच्चे तेल की खरीद है। आज भारत अपनी घरेलू तेल खपत का 35% से 40% हिस्सा रूस से पूरा कर रहा है।
रूसी बाजार में पिछड़े हम: जहां चीन ने 2025 में रूस को 103 अरब डॉलर से अधिक का औद्योगिक और इलेक्ट्रॉनिक सामान बेचा, वहीं भारत अपनी कमजोर विनिर्माण क्षमता के कारण इस दौड़ में काफी पीछे है।
3. 'मेक इन इंडिया' की ज़मीनी हकीकत और विनिर्माण की सीमाएं
भारत के इस भारी व्यापार घाटे की जड़ हमारी सीमित घरेलू मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में छिपी है, जिसका शो में प्रमुखता से ज़िक्र किया गया:
आयातित पुर्जों पर निर्भरता: भारत जो सामान दुनिया को निर्यात करता है, उसके भी मुख्य पुर्जे— जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स, भारी मशीनरी और जीवनरक्षक दवाओं के लिए जरूरी (APIs)— चीनी बाजारों से ही आते हैं।
GDP में घटती हिस्सेदारी: केंद्र सरकार ने विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी को जीडीपी (GDP) के 25% तक ले जाने का लक्ष्य रखा था। लेकिन 2013-14 में जो हिस्सेदारी 17.3% थी, वह अब घटकर 13% से भी नीचे आ चुकी है।
तकनीकी पिछड़ापन: चीन आज ह्यूमनॉइड रोबोटिक्स और प्रिसिजन इंजीनियरिंग में दुनिया को पछाड़ रहा है, जबकि भारत में जटिल हार्डवेयर मैन्युफैक्चरिंग का ढांचा अभी शुरुआती चरण में है।
ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत को वैश्विक मंच पर अपनी स्थिति मजबूत करने का अवसर जरूर देता है। लेकिन अर्थशास्त्र का नियम स्पष्ट है कूटनीति केवल बाजार के दरवाजे खोल सकती है। उन बाजारों में बिकने वाला प्रतिस्पर्धी और सस्ता उत्पाद बनाना आपकी औद्योगिक नीतियों पर निर्भर करता है। जब तक भारत अपनी ज़मीनी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को बड़े पैमाने पर अपग्रेड नहीं करता, तब तक कूटनीतिक जीत के बावजूद व्यापार घाटे की यह खाई पाटना नामुमकिन बना रहेगा।

