x

वोटर लिस्ट विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा कदम: चुनाव आयोग और CEC ज्ञानेश कुमार को नोटिस जारी!

देशभर में मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) और 13 करोड़ से अधिक वोटरों के नाम हटाए जाने के आरोपों को लेकर 'इण्डिया' (INDIA) गठबंधन के नेताओं की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सबसे बड़ी सुनवाई हुई है।


देशभर में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग को लेकर 'इण्डिया' (INDIA) ब्लॉक के नेताओं की याचिका पर सर्वोच्च अदालत में सुनवाई हुई है। देश के करोड़ों नागरिकों के मताधिकार से जुड़ा यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुँच चुका है। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने विपक्ष की याचिका पर संज्ञान लेते हुए चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों—एस.एस. संधू और विवेक जोशी को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है।

राहुल गांधी के सुप्रीम कोर्ट मार्च पर सीजेआई का सख्त रुख

याचिका पर नोटिस जारी करने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने एक बेहद महत्वपूर्ण और सख्त मौखिक टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि वह याचिकाकर्ताओं में से एक के आचरण के बारे में सवाल पूछेगी और उन्हें इस पर सफाई देनी होगी।

अदालत की इस टिप्पणी को सीधे तौर पर 12 अक्टूबर को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में बाराखंबा मेट्रो स्टेशन से सुप्रीम कोर्ट तक निकाले गए विरोध मार्च से जोड़कर देखा जा रहा है। विपक्ष चाहता था कि एसआईआर प्रक्रिया में हो रही गड़बड़ियों और मुख्य चुनाव आयुक्त के रवैये की ओर न्यायपालिका का ध्यान खींचा जाए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट परिसर में जुटी भारी भीड़ और इस तरह के प्रदर्शन के तरीके को मुख्य न्यायाधीश ने पसंद नहीं किया और स्पष्ट शब्दों में कहा कि अदालत को किसी भी तरह से दबाव में नहीं लाया जा सकता।

13 करोड़ वोटरों का नाम हटाने और चुनाव आयोग के भीतर का मतभेद

विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर की आड़ में देश के करीब 13 करोड़ वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए हैं, जो कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि एसआईआर की इस प्रक्रिया पर सिर्फ राजनीतिक दल ही नहीं, बल्कि खुद चुनाव आयोग के भीतर मौजूद दोनों चुनाव आयुक्त—एस.एस. संधू और विवेक जोशी भी सवाल उठा चुके हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों चुनाव आयुक्तों ने करीब 10 महीनों में 14 बार अपनी आपत्तियां दर्ज कराई थीं और कई मनमाने फैसले बिना उनकी सहमति के लिए गए। ऐसे में सवाल उठता है कि जब चुनाव आयोग के अपने शीर्ष अधिकारी ही इस प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे थे, तब इस तरह के फैसलों की संवैधानिक वैधता क्या रह जाती है?

मताधिकार की रक्षा बनाम अदालत की गरिमा

गौरतलब है कि इससे पहले 27 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की इसी बेंच ने बिहार एसआईआर प्रक्रिया को सही ठहराया था। पश्चिम बंगाल के एक मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने टिप्पणी की थी कि यदि कोई नागरिक एक चुनाव में वोट नहीं डाल पाता, तो इसका अर्थ यह नहीं कि उसका अधिकार हमेशा के लिए खत्म हो गया।

लेकिन संविधान के जानकार और विपक्षी नेता सवाल उठा रहे हैं कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को हर चुनाव में अपने मताधिकार का प्रयोग करने का मौलिक अधिकार देता है। चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी इस अधिकार की रक्षा करना है, न कि प्रशासनिक आड़ में किसी का नाम सूची से हटाना। ऐसे में जब नागरिक सड़कों पर उतरकर अपने अधिकारों की बात करते हैं, तो उनकी मंशा पर सवाल उठाने के बजाय प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करना ज्यादा जरूरी हो जाता है।

पत्रकारों पर कार्रवाई और दिल्ली पुलिस को नोटिस

दिल्ली की सड़कों पर मचा यह संग्राम सिर्फ वोटरों के अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अभिव्यक्ति की आजादी और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार से भी जुड़ गया है। 10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई, पत्रकारों को हिरासत में लेने और धारा 144 जैसे प्रतिबंधात्मक आदेशों को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में सवाल उठाए गए हैं।

सरकार की ओर से कोर्ट में कहा गया कि हाथों में मोबाइल लेकर हर कोई पत्रकार बन जाता है और रील बनाने लगता है। इस पर विपक्षी खेमे ने तीखा ऐतराज जताया है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की कार्रवाई का संज्ञान लेते हुए पुलिस को अपने प्रतिबंधात्मक आदेश अदालत के सामने पेश करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही, पुलिस और निजी व्यक्तियों के पास मौजूद सभी सीसीटीवी (CCTV) और वीडियो फुटेज को सुरक्षित रखने के कड़े निर्देश दिए गए हैं।

दो मौलिक अधिकारों की जंग में न्याय की उम्मीद

फिलहाल, यह पूरा मामला दो सबसे बड़े संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों के इर्द-गिर्द घूम रहा है—पहला, नागरिकों के वोट देने का अधिकार और दूसरा, सरकार की नीतियों के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने की आजादी। चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त, केंद्र सरकार और राहुल गांधी इस कानूनी व राजनीतिक लड़ाई के केंद्र बिंदु हैं। अब देखना यह होगा कि चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट में अपना क्या जवाब दाखिल करता है और अदालत राहुल गांधी के मार्च और नागरिकों के मताधिकार को लेकर आगे क्या अंतिम रुख अपनाती है।

Read More
Next Story