x

TMC पर असली हक किसका? चुनाव आयोग के सामने शिवसेना के बाद सबसे बड़ी परीक्षा

तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न पर ममता बनर्जी और अरूप रॉय के गुटों की दावेदारी ने चुनाव आयोग के सामने बड़ी कानूनी चुनौती खड़ी कर दी है। आयोग को पार्टी संविधान, संगठन में समर्थन और विधायी संख्या समेत कई आधारों पर तय करना होगा कि असली TMC की पहचान किसके पास रहेगी।


“मतभेदों और आपसी झगड़ों के कारण, कोई राजनीतिक पार्टी दो या उससे ज़्यादा गुटों में बंट सकती है, लेकिन उसका चुनाव चिह्न नहीं बंट सकता।”

सुप्रीम कोर्ट ने 1971 में 'सादिक अली बनाम भारत निर्वाचन आयोग' मामले में यह बात कही थी। यह मामला कांग्रेस के बंटवारे और विरोधी गुटों द्वारा पार्टी की पहचान और चुनाव चिह्न पर एक ही तरह के दावे किए जाने के बाद सामने आया था। पांच दशक से भी ज़्यादा समय के बाद, भारत निर्वाचन आयोग (ECI) के सामने पश्चिम बंगाल में लगभग वही सवाल है: दो विरोधी गुटों में से कौन 'ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' होने का दावा कर सकता है?

17 सितंबर को, आयोग ने 'ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम और उसके 'फूल और घास' वाले चुनाव चिह्न को कुछ समय के लिए रोक दिया। ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि दो विरोधी गुट—एक ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला और दूसरा अरूप रॉय के नेतृत्व वाला—दोनों ही मान्यता प्राप्त पार्टी का प्रतिनिधित्व करने का दावा कर रहे थे।

एक दिन बाद, होने वाले उपचुनावों के लिए, ममता के नेतृत्व वाले गुट को 'ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस' नाम और 'फ़ुटबॉल खिलाड़ी' का चुनाव चिह्न दिया गया, जबकि अरूप रॉय के नेतृत्व वाले गुट को 'डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस' नाम और 'लिफ़ाफ़ा' का चुनाव चिह्न मिला।

ये अंतरिम इंतज़ाम हैं। मुख्य विवाद का फ़ैसला 'चुनाव चिह्न (आरक्षण और आवंटन) आदेश, 1968' के पैरा 15 के तहत किया जा रहा है। यह आदेश ECI को किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के विरोधी गुटों की बात सुनने और यह तय करने की इजाज़त देता है कि क्या उनमें से किसी एक को, या किसी को भी नहीं, चुनावी मक़सद के लिए असली पार्टी के तौर पर मान्यता दी जानी चाहिए।

दोनों पक्षों की क्या दलीलें हैं?
यह विवाद मुख्य रूप से तृणमूल कांग्रेस के संविधान और उसकी राष्ट्रीय कार्यसमिति के कार्यकाल पर केंद्रित है।

अरूप रॉय-ऋतब्रत बनर्जी गुट का तर्क है कि फरवरी 2022 में चुनी गई कमिटी का कार्यकाल तीन साल का था, जो फरवरी 2025 में खत्म हो गया। इसी आधार पर वे 22 जून 2026 को हुए उस विशेष सत्र को सही ठहराते हैं, जिसमें रॉय के नेतृत्व में नई लीडरशिप चुनी गई थी।

ममता बनर्जी गुट इस व्याख्या को नहीं मानता। उनका कहना है कि पार्टी के नियमों के अनुसार कार्यकाल पांच साल का होता है, इसलिए जून में हुई बैठक के समय भी मौजूदा संगठन वैध था।

आयोग के सामने एक अहम आधिकारिक रिकॉर्ड होगा। ECI के अपने संगठनात्मक-चुनाव पेज पर अभी "ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस संगठनात्मक चुनाव (02.02.2022 से 31.01.2027)" की जानकारी दी गई है। यह एंट्री अपने आप में पैराग्राफ 15 से जुड़े विवाद का फैसला नहीं करती, क्योंकि आयोग को अभी भी विरोधी दावों पर फैसला करना है, लेकिन यह इस बात से सीधे तौर पर जुड़ी है कि क्या 2022 में चुनी गई संस्था 2025 में खत्म हो गई थी।

इसलिए, आयोग को सिर्फ़ इस बात से आगे देखना होगा कि कितने विधायक (MLA) किस गुट का समर्थन कर रहे हैं। उसे यह भी तय करना पड़ सकता है कि उस समय पार्टी के संविधान का कौन-सा वर्शन लागू था, जून की बैठक बुलाने का अधिकार किसे था, उसमें कौन शामिल हो सकता था, क्या संगठनात्मक चुनाव पार्टी के नियमों के अनुसार हुए थे और मान्यता प्राप्त पार्टी ढांचे के भीतर किस पक्ष को कितना समर्थन हासिल है। ECI अपने आधिकारिक राजनीतिक-पार्टी रिकॉर्ड में तृणमूल का संविधान भी रखता है।

दो-तिहाई का आंकड़ा मामला क्यों नहीं सुलझाता
बागी गुट की बताई गई विधायी ताकत अहम है, लेकिन अक्सर जिस दो-तिहाई आंकड़े का ज़िक्र किया जाता है, वह एक अलग कानूनी ढांचे से जुड़ा है।

संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 4 के तहत, दलबदल विरोधी कानून के उस प्रावधान के तहत सुरक्षा पाने के लिए किसी विधायी दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों की विलय के लिए सहमति ज़रूरी है। 'सिंबल ऑर्डर' (चुनाव चिह्न आदेश) के पैरा 15 में ऐसा कोई दो-तिहाई का नियम नहीं है जिससे यह तय किया जा सके कि कौन सा गुट राजनीतिक दल का प्रतिनिधित्व करता है।

विधायी ताकत अब भी आयोग के सामने एक मज़बूत सबूत हो सकती है, लेकिन इससे अपने-आप यह तय नहीं होता कि पार्टी का नाम और चुनाव चिह्न किसे मिलेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने 2023 में 'सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र के राज्यपाल के प्रधान सचिव' मामले में इस अंतर को स्पष्ट किया था; यह मामला शिवसेना में विभाजन से जुड़ा था। कोर्ट ने कहा कि राजनीतिक पार्टी और लेजिस्लेटिव पार्टी (विधायकों की पार्टी) अलग-अलग इकाइयाँ हैं और आयोग को हर गुटीय विवाद के लिए एक ही तरह का यांत्रिक टेस्ट (mechanical test) लागू करने की ज़रूरत नहीं है। सबूतों के आधार पर, वह संगठनात्मक ताकत, विधायी ताकत, पार्टी के संविधान या इनके संयोजन की जांच कर सकता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि ECI के सामने चल रही कार्यवाही और स्पीकर के सामने दलबदल-रोधी कार्यवाही स्वतंत्र रूप से चल सकती हैं। यह बात तब महत्वपूर्ण हो जाती है जब जिन विधायकों का समर्थन गिना जा रहा है, उनके खिलाफ अयोग्यता की कार्यवाही चल रही हो, क्योंकि हो सकता है कि स्पष्ट विधायी बहुमत पर ही सवाल उठ रहे हों।

AIADMK समेत पहले हुई पार्टियों की टूट को कैसे सुलझाया गया
इसका मुख्य उदाहरण 1969 में कांग्रेस का बंटवारा है। कांग्रेस (J) — जिसके संगठन की कमान बाद में जगजीवन राम ने संभाली और जो राजनीतिक रूप से प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से जुड़ी थी — और S. निजलिंगप्पा के नेतृत्व वाली कांग्रेस (O), दोनों ने ही इंडियन नेशनल कांग्रेस और उस समय उसके लिए आरक्षित चुनाव चिह्न "जुए के साथ दो बैल" पर अपना दावा किया।

ECI ने संसद, राज्य विधानसभाओं और पार्टी संगठन में समर्थन की जांच की और कांग्रेस (J) को मान्यता दी। सुप्रीम कोर्ट ने सादिक अली मामले में उस फैसले को सही ठहराया और अपने सामने मौजूद तथ्यों के आधार पर संख्या बल को एक अहम और उपयोगी पैमाना माना। इस फैसले ने बहुमत को भविष्य में पार्टी के किसी भी विवाद के लिए कोई कठोर नियम नहीं बनाया।

2017 का समाजवादी पार्टी विवाद एक ऐसा मामला था जिसमें बहुमत के पैमाने से साफ़ जवाब मिला। अखिलेश यादव के गुट ने चुने हुए प्रतिनिधियों और पार्टी डेलीगेट्स के बीच भारी समर्थन दिखाया, और आयोग ने इसे ही समाजवादी पार्टी माना और "साइकिल" चुनाव चिह्न का हकदार ठहराया।

जे. जयललिता की मौत के बाद AIADMK का विवाद तृणमूल मामले से प्रक्रिया के लिहाज़ से ज़्यादा मिलता-जुलता है। ECI ने शुरू में "दो पत्ती" (Two Leaves) चुनाव चिह्न को फ्रीज़ कर दिया था, क्योंकि विरोधी गुट पार्टी पर कंट्रोल के लिए लड़ रहे थे। ओ. ​​पनीरसेल्वम और एडप्पादी के. पलानीस्वामी के एक साथ आने के बाद, आयोग ने नवंबर 2017 में यह निष्कर्ष निकाला कि संयुक्त गुट का विधायी और संगठनात्मक दोनों हिस्सों में बहुमत है और उन्हें चुनाव चिह्न वापस दे दिया।

2024 का नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP) विवाद दिखाता है कि जब संगठनात्मक स्थिति पर ही विवाद हो, तो क्या हो सकता है। शरद पवार और अजित पवार के विरोधी दावों और संगठनात्मक ताकत का सही पता लगाने में मुश्किलों का सामना करते हुए, आयोग ने विधायी हिस्से को ज़्यादा महत्व दिया और अजित पवार गुट को नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी के तौर पर मान्यता दी, जिसे "घड़ी" चुनाव चिह्न मिला। इसके बाद शरद पवार गुट को "नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी-शरदचंद्र पवार" नाम और "तुरहा बजाता हुआ व्यक्ति" चुनाव चिह्न मिला, जबकि उनकी चुनौती जारी रही।

शिव सेना का मामला अभी क्यों अहम है?
शिव सेना का विवाद हाल के समय का सबसे मिलता-जुलता उदाहरण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट इस हफ़्ते फिर से कमीशन के फ़ैसले की समीक्षा कर रहा है।

ECI ने फरवरी 2023 में एकनाथ शिंदे गुट को मान्यता देने से पहले, 2022 में शिव सेना के नाम और "धनुष-बाण" चुनाव चिह्न को रोक दिया था। इस साल 16 और 17 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने कमीशन के विधायी ताकत पर निर्भर रहने के तरीके पर सवाल उठाए और पूछा कि क्या उसने दोनों गुटों को पुराना चुनाव चिह्न न देने और दोनों को अलग-अलग चुनाव चिह्न के साथ चुनाव लड़ने के लिए कहने पर विचार किया था। ये बातें चल रही सुनवाई के दौरान की टिप्पणियां थीं, न कि कोई अंतिम फ़ैसला।

यह समय तृणमूल के लिए भी खास तौर पर अहम है क्योंकि कमीशन ने अब अंतरिम तौर पर इसी तरह की व्यवस्था अपनाई है। अभी किसी भी गुट के पास "फूल और घास" वाला चिह्न नहीं है; दोनों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न दिए गए हैं, जबकि कमीशन यह तय कर रहा है कि कौन सा गुट (अगर कोई हो) मूल पार्टी की पहचान का उत्तराधिकारी बनेगा।

EC को क्या तय करना है?

इसलिए, तृणमूल मामले की कार्यवाही किसी एक संख्यात्मक सीमा के बजाय कई तरह के सबूतों की विश्वसनीयता पर निर्भर करेगी।

अगर पार्टी का संविधान, संगठनात्मक रिकॉर्ड और विधायकों की संख्या - ये सभी एक ही गुट के पक्ष में हों, तो जांच काफी आसान हो जाती है। अगर सबूत अलग-अलग दिशाओं की ओर इशारा करते हैं, तो आयोग को यह तय करना होगा कि किस सबूत को कितना महत्व दिया जाए।

ECI का अपना रिकॉर्ड, जिसमें तृणमूल के 2022 के संगठनात्मक चुनावों को 31 जनवरी 2027 तक चलने वाला बताया गया है, उस दावे के लिए खास तौर पर अहम हो सकता है कि पिछला संगठन फरवरी 2025 में खत्म हो गया था। साथ ही, आयोग को 22 जून की बैठक की कानूनी वैधता और उसके प्रतिनिधि स्वरूप की जांच करनी होगी, और यह भी देखना होगा कि हर गुट कितना समर्थन जुटा पाता है।

फिलहाल, फुटबॉल खिलाड़ी और लिफाफा इन दोनों गुटों को चुनावी तौर पर अलग बनाए हुए हैं। अंतिम फैसला उस सवाल का जवाब देगा जो कांग्रेस के बंटवारे से लेकर शिवसेना तक, बार-बार चुनाव आयोग के सामने आता रहा है: जब कोई राजनीतिक पार्टी विरोधी संगठनों में बंट जाती है, तो उसकी चुनावी पहचान किसके साथ आगे बढ़ती है?

Read More
Next Story