असम के छह समुदायों का ST दर्जा फिर अधर में, केंद्र ने टाला फैसला
x

असम के छह समुदायों का ST दर्जा फिर अधर में, केंद्र ने टाला फैसला

केंद्र ने मानसून सत्र में असम के छह समुदायों को ST दर्जा देने वाला विधेयक नहीं लाने का फैसला किया। आरक्षण, प्रक्रिया और नई ST-Valley श्रेणी पर अब भी संशय बना है।


केंद्र सरकार द्वारा आगामी मानसून सत्र में असम के छह समुदायों—ताई अहोम, कोच-राजबोंगशी, चुटिया, मोरान, मटक और टी ट्राइब (आदिवासी)—को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा देने संबंधी कोई विधेयक पेश न करने के फैसले ने एक बार फिर उस वादे पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जो 2014 से लगभग हर बड़े चुनाव से पहले दोहराया जाता रहा है।

मंजूरी की लंबी प्रक्रिया अब भी अधूरी

पिछले सप्ताह केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम ने स्पष्ट किया कि इन छह समुदायों को ST का दर्जा देने वाला कोई विधेयक मानसून सत्र में इसलिए नहीं लाया जा रहा है, क्योंकि प्रस्ताव अभी तक संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत निर्धारित पूरी प्रक्रिया से नहीं गुजरा है।

संसद में कोई विधेयक प्रस्तुत किए जाने से पहले असम सरकार की सिफारिश का भारत के रजिस्ट्रार जनरल (RGI) द्वारा परीक्षण किया जाता है। इसके बाद राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST) इसकी समीक्षा करता है। फिर इसे केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी मिलनी होती है और उसके बाद ही इसे संसद में विधेयक के रूप में पेश किया जा सकता है।

जुएल ओराम ने इस प्रक्रिया के पूरा होने की कोई समय-सीमा बताने से इनकार किया। उन्होंने केवल इतना कहा कि केंद्र सरकार "उचित समय पर" इस संबंध में निर्णय लेगी।

संगठनों में बढ़ी नाराज़गी

इन छह समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों का कहना है कि केंद्र सरकार के इस बयान ने उनकी वर्षों पुरानी निराशा को और गहरा कर दिया है।ऑल असम ताई अहोम स्टूडेंट्स यूनियन (AATASU) के अध्यक्ष बसंत गोगोई ने चेतावनी दी कि यदि सरकार इस मुद्दे पर लगातार देरी करती रही, तो संगठन आंदोलन शुरू करेगा।उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स (GoM) की रिपोर्ट से भी स्थिति स्पष्ट नहीं होती। रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि संबंधित समुदायों को सरकारी नौकरियों, संसद, विधानसभा या केंद्र सरकार की सेवाओं में आरक्षण का लाभ शायद नहीं मिल पाएगा।

ताई अहोम युवा परिषद असम (TYPA) के अध्यक्ष विजय राजकोंवर ने कहा कि ताजा घटनाक्रम ने लोगों के उस विश्वास को और मजबूत कर दिया है कि ST दर्जे का वादा मुख्यतः चुनावी राजनीति से प्रेरित रहा है। उनके अनुसार, मानसून समाप्त होने के बाद संगठन अपनी अगली रणनीति तय करेगा।

कोच राजबोंगशी डेवलपमेंट काउंसिल (KRDC) के अध्यक्ष प्रणब नारायण देव ने अपेक्षाकृत संयमित प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि उन्हें इस वर्ष इस मुद्दे के हल होने की कोई उम्मीद नहीं थी। उनका मानना है कि अब विभिन्न संगठनों में पहले जैसी व्यापक जन-आंदोलन खड़ा करने की क्षमता भी नहीं बची है। उनके अनुसार, अब प्राथमिकता विकास पर केंद्रित होनी चाहिए।

सभी छह समुदायों की मांगों का समन्वय करने वाले जनगोष्ठीय महासभा ने दोहराया कि उसकी सबसे प्रमुख मांग संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश (संशोधन) विधेयक को संसद से पारित कराया जाना है।यदि संसद फिलहाल इस विधेयक पर विचार नहीं कर सकती, तो संगठन ने सुझाव दिया है कि भारत के राष्ट्रपति अध्यादेश जारी करें।

महासभा ने केंद्रीय गृह मंत्री, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और संगठन की समन्वय समिति के बीच त्रिपक्षीय बैठक बुलाने की भी मांग की है। साथ ही उसने राज्य सरकार से इस पूरे मुद्दे पर अपना स्पष्ट रुख सार्वजनिक करने का आग्रह किया है।हालांकि, अनिश्चितता केवल संसद में हो रही देरी तक सीमित नहीं है। स्वयं इस प्रस्ताव की व्यवहारिकता को लेकर भी कई गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं।

ताई अहोम समुदाय के शोधकर्ता अरुणाभ कोनवार ने प्रस्तावित "एसटी-वैली (ST-Valley)" श्रेणी की उपयोगिता पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि उपलब्ध जानकारी से ऐसा नहीं लगता कि इस नई श्रेणी के तहत आरक्षण का कोई वास्तविक लाभ मिलेगा।वहीं, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)] ने अपने प्रकाशन पीपुल्स डेमोक्रेसी में इस पूरी कवायद को चुनावी दिखावा (Electoral Optics) बताया है। पार्टी का आरोप है कि सरकार इस मुद्दे को विधायी प्रक्रिया तक पहुँचाने के बजाय इसे जानबूझकर लंबित रख सकती है।

यह मांग कोई नई नहीं है। जनवरी 2019 में राज्यसभा में इस संबंध में एक विधेयक पेश किया गया था, लेकिन उसे पारित नहीं किया जा सका और लोकसभा का कार्यकाल समाप्त होने के साथ ही वह स्वतः निरस्त (लैप्स) हो गया।उस समय असम के मौजूदा अनुसूचित जनजाति संगठनों, विशेषकर कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ ट्राइबल ऑर्गनाइजेशंस ऑफ असम (CCTOA) और ऑल असम ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन (AATSU) ने इसका कड़ा विरोध किया था।

GoM रिपोर्ट की प्रमुख सिफारिशें

असम सरकार द्वारा गठित ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स (GoM) ने 29 नवंबर, 2025 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी।रिपोर्ट में सिफारिश की गई है कि ताई अहोम, चुटिया, टी ट्राइब (आदिवासी) तथा कोच-राजबोंगशी (जो अविभाजित गोलपाड़ा जिले के बाहर रहते हैं) के लिए एक अलग "ST-Valley" श्रेणी बनाई जाए।इसके अलावा, रिपोर्ट में यह भी सुझाव दिया गया है कि मोरान, मटक तथा अविभाजित गोलपाड़ा और पुराने कोकराझार जिले (बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र—BTR) में रहने वाले कोच-राजबोंगशी समुदाय को मौजूदा अनुसूचित जनजाति (मैदानी) [ST (Plains)] श्रेणी में शामिल किया जाए।हालांकि, रिपोर्ट अपने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर देने में असफल रही है।

इसमें यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि प्रस्तावित ST-Valley श्रेणी के अंतर्गत इन समुदायों को सरकारी नौकरियों, संसद, विधानसभा या अन्य केंद्रीय सेवाओं में आरक्षण किस प्रकार मिलेगा। रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि इस संबंध में कोई व्यावहारिक व्यवस्था विकसित नहीं की जा सकी।इस प्रकार, आरक्षण संबंधी अंतिम निर्णय प्रभावी रूप से केंद्र सरकार पर छोड़ दिया गया है।

राइजोर दल के अध्यक्ष और शिवसागर के विधायक अखिल गोगोई ने भी इस प्रस्ताव की आलोचना की है। उनका कहना है कि "ST-Valley" नाम की कोई श्रेणी न तो संविधान में मान्यता प्राप्त है और न ही केंद्र की अनुसूचित जनजातियों की सूची में इसका कोई प्रावधान है।उनके अनुसार, ST (Plains) और ST (Hills) के अतिरिक्त तीसरी श्रेणी बनाने का प्रयास लोगों को वास्तविक समाधान देने के बजाय भ्रमित करने जैसा है।

असम में कोच-राजबोंगशी समुदाय की आबादी लगभग 70 लाख मानी जाती है, जो राज्य की कुल आबादी का लगभग एक-चौथाई है।इसी प्रकार, टी ट्राइब (आदिवासी) समुदाय की जनसंख्या भी लगभग 70 लाख आंकी जाती है, जो राज्य की आबादी का करीब 18 से 20 प्रतिशत है।ताई अहोम समुदाय की जनसंख्या के अनुमान 20 लाख से 46 लाख के बीच हैं। कुछ आकलनों में यह संख्या इससे भी अधिक बताई गई है, यदि मूल अहोम बसने वालों के सभी वंशजों को इसमें शामिल किया जाए।

चुटिया और मटक समुदायों की आबादी भी 20 लाख से अधिक मानी जाती है, जबकि मोरान समुदाय की जनसंख्या लगभग एक लाख बताई जाती है।

चूंकि अनुसूचित जनजातियों की सूची में किसी समुदाय को शामिल करना संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत केंद्र सरकार का विषय है, इसलिए विपक्षी दलों ने भाजपा पर आरोप लगाया है कि वह बार-बार इन समुदायों की उम्मीदें तो जगाती है, लेकिन प्रक्रिया को कभी अंतिम मंजिल तक नहीं पहुंचाती।इसके विपरीत, असम में वर्तमान में आधिकारिक रूप से मान्यता प्राप्त 14 मैदानी (ST-Plains) और 15 पहाड़ी (ST-Hills) अनुसूचित जनजातियों की कुल आबादी, नवीनतम जनगणना के अनुसार, 38,84,371 है, जो राज्य की कुल आबादी का 12.44 प्रतिशत है।

यदि इन छह समुदायों को भी अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिल जाता है, तो राज्य की कुल जनजातीय आबादी लगभग 12 प्रतिशत से बढ़कर करीब 40 प्रतिशत हो सकती है। इससे असम का सामाजिक और राजनीतिक संतुलन पूरी तरह बदल सकता है।

वर्तमान में असम में आरक्षण की व्यवस्था इस प्रकार है—

अनुसूचित जाति (SC) – 7 प्रतिशत

अनुसूचित जनजाति (मैदानी) [ST-Plains] – 10 प्रतिशत

अनुसूचित जनजाति (पहाड़ी) [ST-Hills] – 5 प्रतिशत

अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तथा अधिक पिछड़ा वर्ग (MOBC) – कुल 27 प्रतिशत

आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) – 10 प्रतिशत

मौजूदा जनजातीय संगठन इसका विरोध क्यों कर रहे हैं?

राज्य के मौजूदा जनजातीय संगठन इस प्रस्ताव के खिलाफ मजबूती से खड़े हैं। कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ ट्राइबल ऑर्गनाइजेशंस ऑफ असम (CCTOA) के अध्यक्ष आदित्य खाखलारी का कहना है कि इन छह समुदायों की संयुक्त आबादी 80 से 90 लाख के बीच है, जो वर्तमान अनुसूचित जनजातियों की कुल आबादी से दो गुना से भी अधिक है।उनकी मुख्य चिंता यह है कि यदि भविष्य में सभी अनुसूचित जनजातियों को एक ही श्रेणी के रूप में माना गया, तो परिसीमन (Delimitation) के दौरान वर्तमान जनजातीय समुदाय पंचायतों, स्वायत्त परिषदों, विधानसभा और संसद में अपना राजनीतिक प्रतिनिधित्व खो सकते हैं, क्योंकि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण स्थानीय ST आबादी के आधार पर किया जाता है।

वर्तमान में असम में केवल दो लोकसभा सीटें—कोकराझार और दीफू—अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं। इसके अलावा, 126 सदस्यीय विधानसभा में 19 सीटें ST समुदायों के लिए आरक्षित हैं।इसलिए इन छह समुदायों को ST दर्जा मिलेगा या नहीं, यह केवल राजनीतिक इच्छा-शक्ति पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि संवैधानिक जांच, प्रशासनिक स्वीकृतियों और मौजूदा जनजातीय संगठनों द्वारा उठाई गई चिंताओं के समाधान पर भी निर्भर करेगा।

आदित्य खाखलारी ने आरक्षण व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।उन्होंने कहा कि वर्तमान में असम में कुल आरक्षण 59 प्रतिशत है। यदि इन छह समुदायों को भी अनुसूचित जनजाति में शामिल कर लिया गया, तो आरक्षण 70 प्रतिशत से अधिक पहुंच सकता है, जो 1992 के इंद्रा साहनी (Indra Sawhney) मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित 50 प्रतिशत की सीमा से काफी अधिक होगा।

हालांकि GoM ने अलग ST-Valley रोस्टर का सुझाव दिया है, लेकिन CCTOA का मानना है कि जब छात्रवृत्ति, छात्रावास, कल्याणकारी योजनाओं और सरकारी नौकरियों में प्रतिस्पर्धा शुरू होगी, तब इस अलग व्यवस्था को लंबे समय तक बनाए रखना व्यावहारिक रूप से बेहद कठिन होगा।

ऑल असम ट्राइबल स्टूडेंट्स यूनियन (AATSU) लगातार यह दावा करता रहा है कि ये छह समुदाय जनजातीय पहचान के उन मानकों को पूरा नहीं करते, जिन्हें 1965 की लोकुर समिति (Lokur Committee) ने निर्धारित किया था।संगठन का कहना है कि अहोम, चुटिया, मोरान और मटक समुदाय ऐतिहासिक रूप से मुख्यधारा के असमिया समाज का हिस्सा रहे हैं। यही कारण है कि इन्हें संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश, 1950 तथा उससे पहले की बोरदोलोई-ठक्कर समिति की रिपोर्ट में अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल नहीं किया गया था।

टी ट्राइब (चाय जनजाति) के मुद्दे पर भी AATSU का कहना है कि 1947 की बोरदोलोई-ठक्कर समिति और बाद में लोकुर समिति—दोनों ने यह माना था कि औपनिवेशिक काल में मध्य भारत से असम के चाय बागानों में काम करने के लिए लाए गए श्रमिकों को असम की मूल निवासी जनजाति नहीं माना जा सकता।

AATSU और कोऑर्डिनेशन कमेटी ऑफ ट्राइबल ऑर्गनाइजेशंस ऑफ असम (CCTOA) दोनों का यह भी कहना है कि इन समुदायों को पहले से ही OBC या MOBC श्रेणियों के तहत आरक्षण का लाभ मिल रहा है। साथ ही इनके लिए अलग-अलग स्वायत्त परिषदें या विकास परिषदें भी बनाई गई हैं।उनका तर्क है कि वर्तमान मांग का वास्तविक उद्देश्य कल्याणकारी सुविधाएं प्राप्त करना नहीं, बल्कि राजनीतिक आरक्षण हासिल करना है।

विपक्ष का आरोप—भाजपा ने बार-बार किए 'झूठे' वादे

चूंकि संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल करना केंद्र सरकार का विषय है, इसलिए विपक्षी दलों ने भाजपा पर आरोप लगाया है कि वह वर्षों से लोगों की उम्मीदें बढ़ाती रही है, लेकिन इस प्रक्रिया को कभी अंतिम निष्कर्ष तक नहीं पहुंचाया।

असम कांग्रेस के अध्यक्ष और लोकसभा सांसद गौरव गोगोई ने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह एक ऐसे राज्य पर एकरूप पहचान (Uniform Identity) थोपने की कोशिश कर रही है, जिसकी असली ताकत उसकी जातीय, भाषाई और सांस्कृतिक विविधता में निहित है।उनके अनुसार, असम की पहचान उसकी अलग-अलग समुदायों, भाषाओं और परंपराओं को सम्मान देने में है। उन्होंने कहा कि ST दर्जे का यह मुद्दा हर चुनाव से पहले फिर उभर आता है, लेकिन इसका कोई स्थायी समाधान कभी नहीं निकलता।

भाजपा ने पहली बार 2014 में केंद्र में सरकार बनने के बाद इन छह समुदायों को ST का दर्जा देने का वादा किया था।इसके बाद भी यही आश्वासन बार-बार दोहराया गया—

2016 का असम विधानसभा चुनाव,

2019 का लोकसभा चुनाव,

2021 का विधानसभा चुनाव,

2024 का लोकसभा चुनाव,

और 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले भी।

अब भी अधूरी है पूरी प्रक्रिया

केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री के ताजा बयान से यह भी स्पष्ट होता है कि प्रस्ताव अभी तक भारत के रजिस्ट्रार जनरल (RGI) की जांच प्रक्रिया भी पूरी नहीं कर पाया है।

इससे भी अधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि राज्य सरकार द्वारा गठित ग्रुप ऑफ मिनिस्टर्स (GoM) स्वयं यह तय नहीं कर सका कि प्रस्तावित ST-Valley श्रेणी के तहत आरक्षण का लाभ किस प्रकार दिया जाएगा।जब तक इन मूलभूत प्रश्नों का समाधान नहीं होता, तब तक यह प्रस्ताव अधूरा ही माना जाएगा।इन छह समुदायों को अंततः अनुसूचित जनजाति का दर्जा मिलेगा या नहीं, यह केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर नहीं करेगा, बल्कि संवैधानिक जांच, प्रशासनिक स्वीकृतियों और मौजूदा जनजातीय संगठनों की आपत्तियों के समाधान पर भी निर्भर करेगा।

फिलहाल स्थिति यह है कि केंद्र सरकार ने कोई समय-सीमा घोषित नहीं की है। संसद के मानसून सत्र में कोई विधेयक नहीं लाया जा रहा है।प्रस्तावित ST-Valley व्यवस्था के तहत आरक्षण कैसे मिलेगा, इस पर भी कोई स्पष्टता नहीं है।एक दशक से अधिक समय तक लगातार किए गए राजनीतिक वादों के बावजूद, यह मुद्दा आज भी वहीं खड़ा दिखाई देता है, जहां पहली बार इन समुदायों को ST दर्जा देने का आश्वासन दिया गया था।

Read More
Next Story