
सरकारी नौकरी का सपना या सिस्टम का छलावा? पेपर लीक से बर्बाद हो रहा युवाओं का भविष्य
देशभर में सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए पेपर लीक, परीक्षा रद्द होने और भर्ती प्रक्रिया में देरी बड़ी चुनौती बनती जा रही है। दिल्ली के मुखर्जी नगर में तैयारी कर रहे छात्रों ने बताया कि सालों की मेहनत, पैसा और उम्र दांव पर लगाने के बावजूद सिस्टम की खामियों से उनका भविष्य प्रभावित हो रहा है।
देश में युवाओं की पहली पसंद सरकारी नौकरी पाना होती है। ये पसंद आज से नहीं बल्कि आज़ादी के समय से ही है। समय के साथ साथ देश में सरकारी नौकरी को लेकर जितना आकर्षण बढ़ा उतनी प्रतिस्पर्धा भी बढ़ी। जनसँख्या के बढ़ने के साथ साथ सरकारी नौकरी की संख्या में कमी आती रही और आज की बात करें तो समूचे देश में सरकारी नौकरियों की भर्ती काफी कम हो चुकी है, जिसकी वजह से मात्र एक सीट पर हजारों उम्मीदवारों के बीच कड़ा मुकाबला होता है। इसी बीच सालों से नक़ल और पेपर लीक जैसी समस्या समय से साथ दीमक की तरह फैलती चली गयी और अब ये आलम हो गया कि सरकार के तमाम दावों को धत्ता बताते हुए हर परीक्षा में पेपर लीक लगभग आम बात बन गयी। इस समस्या के चलते लाखों करोड़ों युवाओं के भविष्य के साथ जो खिलवाड़ होता आ रहा है, हाल ही में एक आन्दोलन ने देश के युवाओं को लामबंद किया और फिर कुछ राज्यों में इस समस्या को लेकर छात्रों के प्रदर्शन शुरू हो गए।
द फ़ेडरल देश ने इस समस्या से जूझ चुके कुछ छात्रों से बात की, जो अपने गाँव घर को छोड़ कर दिल्ली आये ताकि यहाँ तैयारी करके अच्छी सरकारी नौकरी हासिल कर पाए लेकिन नक़ल और पेपर लीक ने उनके इस सफ़र को और लम्बा कर दिया है।
यूँ तो देश में बड़े पैमाने पर कॉर्पोरेट, IT और प्राइवेट नौकरियां है और जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है तो आत्मनिर्भर/स्वरोजगार पर जोर दिया है लेकिन फिर भी युवाओं में सरकारी नौकरी पाने की चाह कम नहीं हुई है। हिंदी बेल्ट की बात करें तो पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में आज भी सरकारी नौकरी को ही महत्व दिया जाता है। जिसकी सरकारी नौकरी रुतबा उसी का, कुछ ऐसा ही माहौल है, यही वजह भी है कि आज भी यहाँ के युवा किसी भी हाल में सरकारी नौकरी पाने के लिए जी तोड़ मेहनत करते हैं।
दिल्ली में आतें हैं देशभर के युवा
दिल्ली की बात करें तो यहाँ के दो इलाके मुख़र्जी नगर और ओल्ड राजेन्द्र नगर सरकारी नौकरी की तैयारी कराने के हब यानी केंद्र माने जाते हैं। देश भर से युवा यहाँ के महंगे और नामी कोचिंग संस्थानों में एडमिशन लेकर पढ़ते हैं और यहाँ किराए के कमरों में रहते हैं। रात दिन मेहनत और एक ही लक्ष्य अच्छी सरकारी नौकरी।
द फ़ेडरल देश की टीम पेपर लीक आदि की समस्या झेल चुके छात्रों की तलाश में ओल्ड राजेंद्र नगर और मुख़र्जी नगर जाकर पता लगाया। कभी चाय की दुकान पर तो कभी किसी स्नैक्स के खोमचे पर। अधिकतर छात्र जो UPSC परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं, ने कहा कि उन्होंने ऐसी कोई समस्या नहीं झेली है क्योंकि UPSC में कभी पेपर लीक या नक़ल जैसी कोई समस्या नहीं आई है। ऐसी समस्या अधिकतर स्टेट लेवल की परीक्षाओं में आती है। छात्रों ने कहा कि मुख़र्जी नगर में अगर शाम के समय जाया जाए तो ऐसे छात्र जरुर मिल सकते हैं, जिन्होंने ऐसी समस्या का सामना किया होगा।
ये संवाददाता शाम के समय मुख़र्जी नगर पहुंचा और इत्तिफाकन ऐसे 5 छात्रों से मुलाक़ात हुई, जो इन समस्याओं का सामना कर चुके हैं।
छात्रा ने क्या बताया?
सबसे पहले मुलाक़ात हुई कानपूर, उत्तर प्रदेश की रहने वाली शिवानी से, जो एक चाय की दुकान के बाहर मौजूद थीं। उन्होंने अपनी फोटो आदि प्रकाशित ना करने की बात कही। शिवानी ने बताया कि उन्होंने पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में एमए किया हुआ है। वर्ष 2023 में वो कानपूर से दिल्ली UPSC की तैयारी करने के लिए आयीं थीं। उनके परिवार में माता-पिता हैं। पिता UPSRDC में नौकरी करते हैं। शिवानी 2 बहनें और 2 भाई हैं।
शिवानी ने बताया कि उन्होंने दिल्ली आने के बाद एक कोचिंग सेंटर से कोचिंग ली, जिसकी फीस 1 लाख 66 हजार रूपये थी। कोचिंग पूरी होने के बाद अब वो सेल्फ स्टडी करती हैं। यहाँ पीजी का खर्चा 15 हजार रूपये प्रति माह है और लाइब्रेरी में पढ़ने का खर्चा 2400 रूपये प्रति माह। कुल मिलाकार हर महीने 20 से 25 हजार रूपये का खर्चा हो रहा है।
वर्ष 2026 में शिवानी ने बिहार सहायक शिक्षा विकास अधिकारी के पद के लिए आयोजित की गयी परीक्षा का एग्जाम दिया, जो 17-18 अप्रैल को था। शिवानी का सेंटर बक्सर जिले के डुमराह में था। शिवानी बताती हैं कि उनके साथ उनकी माँ भी गयीं थी। शिवानी ने दिल्ली से ट्रेन ली और कानपुर से उनकी माँ भी उसी ट्रेन में स्वर हो गयीं। परीक्षा दो दिन थी, इसलिए उन्होंने 4500 रूपये का कमरा भी किराए पर लिया। पहले दिन परीक्षा हुई लेकिन अगले दिन की परीक्षा रद्द कर दी गयी। रेल की टिकट ही बड़ी मुश्किल में कन्फर्म हुई थी। इतना सारा झमेला तो परीक्षा केंद्र तक पहुँचने के लिए ही था।
सबसे दुखद बात ये रही कि इस परीक्षा के लिए तैयारी के साथ साथ जो खर्चा हुआ वो भी बहुत अखरा। इसके अलावा परीक्षा केंद्र तक जाने के लिए जो सफ़र था वो भी बहुत जद्दो जिहाद वाला था। परीक्षा केंद्र के लिए डुमराह से ट्रेन से जाना पड़ा था।
कुल 935 पद थे, जिसके लिए लगभग 11 लाख अभ्यर्थियों ने आवेदन भरा था।इस परीक्षा में पहली बार ये प्रावधान था कि लिखित परीक्षा पास होने पर सीधे नियुक्ति। लेकिन परीक्षा कैंसिल होने के बाद अब तक कुछ नहीं पता है कि अब ये परीक्षा कब होगी।
शिवानी से जब ये पूछा गया कि कानपुर भी बड़ा शहर है तो फिर दिल्ली आकर ही तयारी करने का निर्णय क्यों लिया?
इस पर शिवानी ने कहा कि वहां भी कोचिंग सेंटर हैं और अब नामी कोचिंग इंस्टिट्यूट भी खुलने लगे हैं लेकिन जो फैकल्टी दिल्ली में होती है वो वहां नहीं मिल पाती, इसलिए दिल्ली आने का निर्णय लिया। अभी मेरी उम्र और एटेम्पट दोनों ही बचे हुए हैं, परिवार भी जैसे तैसे मेरा सपोर्ट कर रहा है, इसलिए मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी है और तयारी में जुटी हुई हूँ। शिवानी का कहना है कि सरकार को पारदर्शिता पर ज्यादा जोर देना चाहिए और पेपर लीक और नक़ल पर गंभीरता पूर्वक रोक लगानी चाहिए ताकि किसी भी युवा के साथ अन्याय न हो। क्योंकि प्रताड़ित सिर्फ एक छात्र नहीं बल्कि उसका पूरा परिवार होता है।
तीन दोस्तों के संघर्ष की कहानी
फिर एक सोडा की रेहड़ी पर तीन दोस्त मिले, जो मुख़र्जी नगर के नजदीक गोपालपुर गाँव में किराए के कमरे में रह कर प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं।
इनमें से एक कुलदीप पाण्डेय ने बताया कि वो आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। कुलदीप की उम्र 25 साल है। उन्होंने भूगोल में एमए किया हुआ है और बीएड भी। वर्ष 2021 में कुलदीप अपने गाँव से दिल्ली आये थे। कुलदीप के पिता किसान हैं। माँ आजमगढ़ में ही प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं और बड़ा भाई दिल्ली में ही रहते हैं और प्राइवेट जॉब करते हैं। कुलदीप पाण्डेय ने बताया कि वो यहाँ रहकर खुद ही तयारी कर रहे हैं। जब उनसे पूछा की दिल्ली में रह कर क्यों, तैयारी तो गाँव में भी कर सकते थे, तो उन्होंने कहा कि गाँव में रह कर वो माहौल नहीं मिलता। वहां रह कर सिर्फ पढाई नहीं हो पाती क्योंकि अपनी आँखों के सामने पिता को काम करते देखा नहीं जाता, पशु भी हैं तो उनकी भी देख रेख करनी रहती है।
जब कुलदीप पाण्डेय से पूछा की सरकारी नौकरी ही क्यों तो उन्होंने कहा कि दरअसल हमारे पूर्वांचल में प्रभाव ही सरकारी नौकरी का रहता है और तो कुछ है नहीं, बस हर किसी के मन में ये ही सपना रहता है कि जैसे भी करके अच्छी सरकारी नौकरी हासिल की जाए।
कुलदीप बताते हैं कि वर्ष 2023 में उत्तर प्रदेश में रिव्यु ऑफिसर( RO) की नौकरी निकली थीं। कुल पद 435 थे, जिसके लिए 10 लाख 76 हजार आवेदन प्राप्त हुए थे। इनमें से लगभग साढ़े 4 लाख छात्रों ने परीक्षा दी थी। राज्य के 65 जिलों में सेंटर डाला गया था। लेकिन पेपर लीक और चीटिंग की वजह से ये परीक्षा रद्द हो गयी, क्योंकि जैसे ही छात्रों को लीक और चीटिंग का पता चला तो धरना आदि किया गया था। इसके बाद फिर से परीक्षा हुई, इसके लिए पैटर्न बदला गया और एक ही दिन में एक ही शिफ्ट में सभी की परीक्षा ली गयी, इससे पहले अलग अलग शिफ्ट और अलग दिन परीक्षा ली गयी थी। लेकिन आप देखिये कि ये वकंसी अभी तक रुकी हुई है।
दरअसल रिजर्वेशन माइग्रेशन की वजह से मामला इलाहबाद हाई कोर्ट में विचाराधीन है।
रिजर्वेशन को लेकर सरकार का कहना है कि इसका लाभ एक ही बार मिलेगा या तो प्रे परीक्षा में या फिर मुख्य परीक्षा में, जबकि आरक्षण वाले उम्मीदवारों की मांग है कि दोनों में आरक्षण दिया जाना चाहिए। इसी विषय पर मामला अदालत पहुंचा है।
अन्यथा ये होता है कि जो पद आरक्षित होते हैं और वो रिक्त रहते हैं तो उन्हें माइग्रेशन के तहत सामान्य सीट में तब्दील कर दिया जाता है। हम तयारी कर रहे हैं, इसी उम्मीद में कि सिस्टम की जो ये खामियां हैं वो ख़त्म होंगी और हम जरुर सफलता हासिल करेंगे।
कुलदीप के साथ ही मौजूद देवेन्द्र दुबे की उम्र 26 साल है। वो प्रयागराज, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। देवेन्द्र साल 2022 में दिल्ली आये थे। उन्होंने 85 हजार रूपये खर्च करके कोचिंग ली। उनके परिवार में माता-पिता, एक भाई और एक बहन हैं। पिता की दुकान है।
देवेन्द्र ने बताया कि वो भी कुलदीप पांडेय के साथ रूम शेयर करते हैं। 6000 रूपये प्रति माह रूम का खर्चा है। अब वो भी सेल्फ स्टडी करते हैं और परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। वर्ष 2023 में देवेन्द्र ने भी RO की परीक्षा दी थी और उनके साथ भी वही हुआ जो कुलदीप के साथ हुआ। देवेन्द्र का कहना है कि ऐसा नहीं है कि पेपर लीक रुक नहीं सकता। लेकिन रोकने की इक्छा नहीं है। सोचिए सरकारी नौकरी की परीक्षा होती है और पेपर छपता है प्राइवेट प्रेस में। पपेर लीक कहाँ से हो सकता है या तो जो लोग पेपर सेट करते हैं वहां से या फिर प्रिंटिंग प्रेस से। पेपर को छापने के लिए प्राइवेट एजेंसी को शामिल क्यों किया जाता? हमें लगता है कि बड़े अधिकारी या नेता अपनों को लाभ दिलाने के चक्कर में नक़ल और पेपर लीक जैसी गड़बड़ियाँ होने देते हैं। जो बहुत दुखद है।
इन्ही एक और दोस्त हैं रिकेश, जिनकी उम्र 25 साल है। रिकेश गोवेर्धन, मथुरा, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। रिकेश एसएससी और रेलवे की परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं। इनके पिता का अपना ही काम है।रिकेश लगभग 2 साल से दिल्ली में रह रहे हैं। वो भी गोपालपुर में ही रहते हैं और 6 हजार रूपये प्रति माह के हिसाब से कमरे का किराया देते हैं। रिकेश का कहना है कि एसएससी जैसी परीक्षा का ये हाल बना दिया गया है कि परीक्षार्थी को परीक्षा देना जैसे जंग लड़ना जैसा लगता है। कुछ समय पहले तक ये परीक्षा TCS आयोजित करवाती थी। लेकिन लगभग 2 साल पहले TCS की जगह एडिक्युटी को टेंडर दिया गया, जो वजह हम लोगों को समझ आई वो ये कि उसने कम पैसे में परीक्षा कराने का दावा किया लेकिन इसकी सजा छात्रों को झेलनी पड़ रही है।
रिकेश का कहना है कि 2025 में उन्होंने एसएससी की परीक्षा भरी थी, दिल्ली से ही लेकिन उनका सेंटर अंदमान निकोबार में डाल दिया गया। रिकेश ने जब ये मुद्दा उठाया तो फिर उनका सेंटर आनन फानन में ही दिल्ली में डाला गया लेकिन ऐसी जगह की वहां कंप्यूटर सिस्टम ही सही से नहीं चल रहे थे। रिकेश ने दावा किया जब छात्रों ने अतिरिक्त समय की मांग की तो परीक्षा केंद्र में ही उन्हें बंदी बना लिया गया और बाउंसरों से पिटवाया गया। देर रात को कहीं जाकर छात्रों को सेंटर से बाहर जाने दिया गया। कई जगहों से ऐसा भी सुनने में आया गया कि सेंटर तबेले में या फिर ओयो होटल के नीचे डाल दिए गए थे। रिकेश का कहना है कि बड़ी संख्या में छात्रों ने इसे लेकर विरोध प्रदर्शन भी किये थे। जानकारी ये भी मिली थी कि एतिक्युटी कंपनी पहले किसी और नाम से सक्रीय थी लेकिन उसे ब्लैक लिस्ट किया गया था, फिर नाम बदल दिया गया।
मुख़र्जी नगर में ही एक अन्य चाय की दुकान पर हमारी मुलाकात पंकज कुमार से हुई। 28 साल के पंकज आजमगढ़, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इनके पिता किसान हैं। एक भाई कुछ समय पहले UPPCL में जूनियर इंजिनियर के पद पर नियुक्त हुए हैं। पंकज बताते हैं कि उनके भाई परिवार के पहले सदस्य हैं, जो सरकारी नौकरी में गए हैं।
पंकज का कहना है कि वो 5 साल पहले दिल्ली आये थे। मुख़र्जी नगर के नजदीक परमानन्द कॉलोनी में रहकर वो तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने कोचिंग भी ली थी, जिसके लिए एक लाख रूपये फीस दी थी। अब वो खुद ही तैयारी कर रहे हैं। वो एसएससी और रेलवे की तैयारी कर रहे हैं, साथ ही यूपीएससी की भी।
पंकज का कहना है कि एसएससी एग्जाम की बात करें तो वो डिले होता रहा है। पहले TCS परीक्षा कराती थी लेकिन फिर एडिक्युटी को टेंडर जब से दिया गया है तब से मामला बहुत ज्यादा ढीला हो गया है। मार्च में परीक्षा का कैलेंडर आना था लेकिन अभी तक जारी नहीं किया गया।
रेलवे की परीक्षा में भी ऐसे ही लेट लतीफी जारी है। 2019 की वकंसी के लिए परीक्षा 2022 में ली गयी थी। काफी प्रोटेस्ट किया गया था तब जाकर कैलेंडर जारी किया गया। परीक्षा प्रक्रिया को सामान्य बनाने के लिए भी छात्रों को काफी हंगामा/प्रदर्शन करना पड़ा।
आप ये दिखिए कि युवा रोज़गार के लिए और अपने व परिवार के भविष्य के लिए प्रयासरत रहते हैं लेकिन सरकारी प्रक्रिया उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करने में लगी रहती है। उत्तर प्रदेश की UPSSC की परीक्षा के लिए ये प्रावधान है कि इसका PET एग्जाम यानी प्री टेस्ट साल में दो बार किया जाना चाहिए लेकिन ऐसा होता नहीं है। UPSSSC की परीक्षा हर साल होने की बात थी लेकिन होती नहीं है।
अभी हम लोगों को ये जानकारी मिल रही है कि UPSC जो देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा है, उसमें भी आरक्षण को लेकर गड़बड़ी की जा रही है। कई उम्मीदवार ऐसे हैं, जो आर्थिक तौर पर मजबूत परिवार से आते हैं लेकिन फर्जीवाड़ा कर EWS यानी आर्थिक तौर पर कमजोर का सर्टिफिकेट बनवा कर आवेदन कर रहे हैं, ताकि उन्हें EWS कोटे का लाभ मिल सके। UPSC को चाहिए कि वो इस फर्जीवाड़े को रोकने के लिए सख्त कदम उठाये और EWS सर्टिफिकेट लगाने वालों की अच्छे से जांच करे।
पंकज कुमार का कहना है कि हम छात्र अपनी उम्र, मेहनत और पैसा लगा कर तैयारी करते हैं लेकिन इस गंदे सिस्टम की वजह से हमारे साथ अन्याय होता है। समय समय पर हम लोगों ने धरना प्रदर्शन करके आवाज उठाई है लेकिन फिर भी गड़बड़ी हो रही हैं।

