
युवा आंदोलनों पर पुलिस की कार्रवाई! UN के आरोपों पर भारत ने क्या कहा?
फाइनल ----एक लाइन की समरी जो इससे अलग हो युवा प्रदर्शनों के दौरान कथित हिरासत और पुलिस कार्रवाई पर संयुक्त राष्ट्र की चिंता के बीच भारत ने मानवाधिकार रिपोर्टों की निष्पक्षता और तथ्यात्मक आधार पर सवाल उठाए हैं।
भारत ने देश में युवा प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई को लेकर संयुक्त राष्ट्र (UN) के मानवाधिकार विशेषज्ञों की चिंताओं पर आपत्ति जताई है। भारत ने कहा कि मानवाधिकारों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय तंत्र को संवाद, परामर्श, सहयोग, पारदर्शिता और निष्पक्षता के सिद्धांतों पर काम करना चाहिए। मानवाधिकारों का इस्तेमाल किसी देश पर राजनीतिक दबाव बनाने या उसे चुनिंदा रूप से निशाना बनाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
विदेश मंत्रालय में उप सचिव बर्खा ताम्रकार ने 20 अक्टूबर को संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में भारत का पक्ष रखा। यह चर्चा जबरन गुमशुदगी से जुड़े कार्य समूह के संदर्भ में हुई। ताम्रकार ने कहा कि रिपोर्टों और शिकायतों का उल्लेख तथ्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। अपुष्ट आरोपों को अंतिम निष्कर्ष की तरह पेश नहीं किया जाना चाहिए।
UN विशेषज्ञों ने पुलिस कार्रवाई पर क्या सवाल उठाए?
भारत का यह बयान जिनेवा में 20 से अधिक संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों की चिंता के बाद आया। विशेषज्ञों ने पिछले तीन महीनों के दौरान दिल्ली और देश के अन्य हिस्सों में युवाओं के नेतृत्व वाले शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए थे।
विशेषज्ञों ने भारतीय अधिकारियों से शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा करने और कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के मामलों में न्याय सुनिश्चित करने की अपील की। उन्होंने आरोप लगाया कि शांतिपूर्ण सभाओं पर अनुचित पाबंदियां लगाने, जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग करने और लोगों को मनमाने ढंग से हिरासत में लेने की शिकायतें सामने आई हैं।
7,000 से ज्यादा लोगों को हिरासत में लेने का दावा
संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों ने दावा किया कि दिल्ली में 7,000 से अधिक युवाओं, पत्रकारों, वकीलों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और राजनीतिक दलों के सदस्यों को कथित तौर पर हिरासत में लिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, इनमें से ज्यादातर लोगों को 24 घंटे के भीतर छोड़ दिया गया था।
विशेषज्ञों ने प्रदर्शनों और हिरासत के दौरान चोट लगने, दुर्व्यवहार और लैंगिक हिंसा से जुड़े आरोपों पर भी चिंता जताई। हालांकि, ये आरोप हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से सिद्ध तथ्य नहीं माना जाना चाहिए।
मतदाता सूची और प्रदर्शन पर पाबंदियों का मुद्दा
विशेषज्ञों के मुताबिक, छात्र और उनके समर्थक शिक्षा व्यवस्था से जुड़े सरकारी फैसलों के साथ-साथ मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मुद्दे पर भी प्रदर्शन कर रहे थे। उनके अनुसार, मतदाता सूची में बदलाव से करीब 13 करोड़ लोग प्रभावित हुए हैं।
विशेषज्ञों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के कथित इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि इसके जरिए सार्वजनिक सभाओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाने, परिवहन सेवाएं रोकने और इंटरनेट बंद करने जैसी कार्रवाई की गई।
इस पूरे मामले में भारत ने मानवाधिकारों से जुड़े आरोपों और रिपोर्टों को तथ्यों के आधार पर देखने पर जोर दिया है।
