
रूसी तेल प्रतिबंध : पहले से उलझे भारत-अमेरिका रिश्तों पर एक और तलवार
रूस से तेल खरीदने वाले सबसे बड़े देशों में से एक भारत के लिए, यह बिल वॉशिंगटन के साथ पहले से ही मुश्किल भरे रिश्तों में एक नई और गंभीर समस्या पैदा कर सकता है।
US हाउस ऑफ़ रिप्रेज़ेंटेटिव्स ने 'लिंडसे ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट' पास कर दिया है। इससे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को उन देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिल गया है जो रूस से तेल और गैस खरीदते हैं। यह बिल, जिसे पिछले महीने सीनेट में 86-11 के भारी बहुमत से मंज़ूरी मिली थी, अब ट्रंप के पास उनके हस्ताक्षर के लिए जाएगा।
रूस से तेल खरीदने वाले सबसे बड़े देशों में से एक भारत के लिए, यह कानून वॉशिंगटन के साथ पहले से ही मुश्किल भरे रिश्तों में एक नई और गंभीर समस्या पैदा कर सकता है। यह बिल अपने-आप टैरिफ लागू नहीं करता, बल्कि ट्रंप को ऐसा करने की शक्ति देता है। इससे रूसी ऊर्जा पर भारत की लगातार निर्भरता सीधे तौर पर US की नीति के दायरे में आ जाती है।
क्या यह अमेरिका के लिए कोई संदेश है?
नई दिल्ली स्थित ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के वाइस-प्रेसिडेंट हर्ष पंत ने कहा, "भारत को चिंता होनी चाहिए क्योंकि इससे अमेरिका के साथ ट्रेड डील पर बातचीत और भी जटिल हो जाएगी, क्योंकि इसका इस्तेमाल दबाव बनाने के तरीके के तौर पर किया जा सकता है। अमेरिका के साथ भारत की किसी भी बातचीत में यह बात अहम भूमिका निभाएगी।"
पंत ने आगे कहा, "मुझे लगता है कि भारत अपनी ज़रूरतों के हिसाब से रूस से तेल खरीदना जारी रखेगा। अमेरिका को यह संदेश जाएगा कि हम अमेरिका के साथ संबंध बनाए रखेंगे, लेकिन किसी दबाव में नहीं झुकेंगे। खासकर भारत के घरेलू हालात को देखते हुए, मुझे नहीं लगता कि भारत रूस से संबंध तोड़ने की मांग मानेगा। लेकिन यह चुनौती भारत-अमेरिका संबंधों पर असर डालती रहेगी।"
ट्रंप जल्दबाजी क्यों नहीं करेंगे
कुछ जानकारों का मानना है कि नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले रूस पर प्रतिबंध लगाने की जल्दबाजी ट्रंप शायद ही करें। ट्रंप तेल की कीमतों को लेकर भी संवेदनशील हैं, और प्रतिबंधों से सप्लाई और कम हो सकती है। ऐसे समय में जब न सिर्फ़ होर्मुज़ जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), बल्कि बाब-अल-मंदेब जलमार्ग (Bab el-Mandeb waterway) में भी रुकावट आ सकती है, क्योंकि सऊदी अरब और हूतियों के बीच लड़ाई जारी है। तेल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से अमेरिकी उपभोक्ताओं पर दबाव बढ़ सकता है।
राजदूत केपी फैबियन ने कहा, "इस बात की संभावना कम है कि ट्रंप रूस पर प्रतिबंध लगाने या चीन और भारत पर टैरिफ लगाने में जल्दबाजी करेंगे। हालांकि, वह भारत को अंतरिम व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर करने के वास्ते इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।"
फैबियन ने आगे कहा, "अगर ट्रंप शी जिनपिंग को धमकाने का फ़ैसला करते हैं, तो चीनी नेता 'रेयर अर्थ' की सप्लाई रोककर और भी कड़ा जवाब देंगे।" भारत के पास ऐसा कोई दांव नहीं है।
भू-राजनीतिक सिरदर्द
फिर भी, प्रतिबंधों का खतरा भारत-अमेरिका संबंधों पर हमेशा मंडराता रहेगा।
'द एशिया ग्रुप' में इंडिया प्रैक्टिस के पार्टनर और चेयर, अशोक मलिक ने कहा, "लिंडसे ग्राहम के 'रूस और ईरान पर प्रतिबंध लगाने वाले कानून' के मामले में कई अहम पड़ाव देखने होंगे। एक तो, इस कानून का कोई भी इस्तेमाल ट्रंप की मंज़ूरी से ही हो सकता है। उनके सामने कई चुनौतियां हैं: मध्यावधि चुनाव, रूस पर दबाव बनाने की ज़रूरत, ईरान संकट और ऊर्जा पर उसका असर। इससे उनके जोखिम का हिसाब-किताब और उनके अप्रत्याशित व्यवहार की संभावना बढ़ जाती है। फिर भी, यह कानून दोनों देशों के संबंधों में परेशानी का सबब बनेगा।" उन्होंने कहा, "भले ही असल में कोई टैरिफ न लगाया जाए, लेकिन इससे जो छवि बन रही है, वह अच्छी नहीं है। व्हाइट हाउस में अस्थिरता एक बड़ी जियोपॉलिटिकल (भू-राजनीतिक) समस्या बन गई है। इसका असर भारत-अमेरिका संबंधों पर भी पड़ रहा है।"
भारत का रुख बदलना
इसलिए, भारत के पास अपनी प्रतिक्रिया तय करने और ऐसी स्थिति की योजना बनाने के लिए कुछ समय होगा, जिसमें ट्रंप रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों के खिलाफ़ प्रतिबंध लगाने का फ़ैसला करते हैं। जैसा कि पंत ने बताया, घरेलू राजनीतिक असर को देखते हुए इस बात की संभावना कम है कि भारत आसानी से झुक जाएगा।
लेकिन ज़्यादा बड़ी बात भारत की विदेश नीति में बदलाव की दिशा हो सकती है। सऊदी अरब में भारत के पूर्व राजदूत तलमीज़ अहमद के अनुसार, "भारत पहले से ही अपनी विदेश नीति में सुधार कर रहा है।" उनका तर्क है कि ऐसा इसलिए नहीं है कि भारत को यह समझ आ गया है कि अमेरिका पर भरोसा नहीं किया जा सकता—खासकर ट्रंप जैसे अनिश्चित नेता के रहते—बल्कि इसलिए भी है क्योंकि चीन ने 'ग्लोबल साउथ' का नेतृत्व करने की दिशा में तेज़ी से कदम बढ़ाए हैं। भारत उस जगह को चीन के हाथों में नहीं जाने देना चाहता।
अहमद ने कहा कि नीति में यह बदलाव चीन के साथ रिश्ते सुधारने के भारत के फ़ैसले के साथ-साथ SCO और BRICS के घोषणापत्रों में भी साफ़ दिखता है। हालाँकि भारत को टेक्नोलॉजी, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) और मैन्युफ़ैक्चरिंग के लिए अमेरिका की ज़रूरत है, लेकिन अब इस बात की संभावना कम है कि नई दिल्ली आसानी से झुक जाएगी।
विदेश मंत्रालय की तुरंत प्रतिक्रिया
पहले ऐसा नहीं होता था; जब भी अमेरिका के साथ कोई मुद्दा उठता था—खासकर जब ट्रंप ने नई दिल्ली के खिलाफ तीखी बातें कही थीं—तो भारत आमतौर पर सार्वजनिक रूप से जवाब देने से बचता था। लेकिन इस बार, अमेरिकी कांग्रेस में बिल पास होने पर भारत ने तुरंत प्रतिक्रिया दी।
विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा एक प्राथमिकता है। मंत्रालय ने यह भी बताया कि हाल के महीनों में अमेरिकी अधिकारियों के साथ इस मुद्दे पर बातचीत हुई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वाशिंगटन सरकार की मजबूरियों से वाकिफ था। बयान में यह भी कहा गया कि भारत ने "अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाने के अपने संकल्प को स्पष्ट कर दिया है।"
भारत बरसों से इस बात पर ज़ोर देता रहा है कि रणनीतिक स्वायत्तता का मतलब है एक-दूसरे से होड़ करने वाले सत्ता के केंद्रों में से किसी एक को चुनने से इनकार करना। रूसी ऊर्जा खरीदने वालों पर अमेरिकी प्रतिबंधों से जुड़ा कानून इस संतुलन को बनाए रखने के काम को काफी मुश्किल बना सकता है।
अब सवाल यह है कि क्या वॉशिंगटन से बढ़ता दबाव नई दिल्ली को पश्चिम के करीब ले जाएगा या भारत को अपनी रणनीतिक दूरी बनाए रखने के लिए और भी ज़्यादा दृढ़ बना देगा।

