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UP की बात : UP Election 2027: चुनाव से पहले BJP की चुनौतियां, विपक्ष की रणनीति और बदलते सियासी समीकरण

UGC विवाद, सोशल मीडिया की चुनौती और विपक्ष की सक्रियता के बीच उत्तर प्रदेश में 2027 की चुनावी जंग के नए समीकरण बन रहे हैं।


UP की बात :

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव अभी कुछ महीने दूर हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। चुनाव में किसका पलड़ा भारी होगा, इसका फैसला तो जनता करेगी, लेकिन चुनाव से पहले जो संकेत मिल रहे हैं, वे दिलचस्प भी हैं और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण भी।

एक तरफ भाजपा के सामने UGC के नए नियमों को लेकर अगड़े वर्ग की नाराजगी चुनौती बनती दिखाई दे रही है। मामला इतना बढ़ा कि विधान परिषद चुनाव के मतपत्रों पर उम्मीदवारों के नाम के आगे वोट देने के बजाय UGC Roll Back लिखकर विरोध दर्ज कराया गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी इस विवाद पर हस्तक्षेप करना पड़ा। अब भाजपा के सामने सवाल है कि वह सामाजिक न्याय और सामाजिक संतुलन के बीच ऐसा रास्ता कैसे निकाले, जिससे उसके किसी भी बड़े सामाजिक आधार में नाराजगी न बढ़े।

दूसरी तरफ सोशल मीडिया के मोर्चे पर एक अलग तस्वीर दिखाई दे रही है। समाजवादी पार्टी की डिजिटल सक्रियता और इंगेजमेंट के आंकड़े उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए चिंता का विषय बताए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की लोकप्रियता और भाजपा के राष्ट्रीय अकाउंट की ताकत अपनी जगह है, लेकिन प्रदेश भाजपा के संगठनात्मक अकाउंट की गिरती पहुंच ने पार्टी और संघ को समीक्षा के लिए मजबूर किया है।

उधर भाजपा ने अब सड़क पर उतरकर 'लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ' अभियान शुरू करने की तैयारी की है। केंद्रीय मंत्रियों से लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक अलग-अलग इलाकों में पदयात्रा करेंगे। जाहिर है, यह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि चुनाव से पहले कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने और राजनीतिक माहौल अपने पक्ष में बनाने की कोशिश है।

और इस पूरे राजनीतिक माहौल में अखिलेश यादव भी पीछे नहीं हैं। कभी सनातन समाज की एकता के सवाल पर कथावाचक धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को घेर रहे हैं, तो कभी भाजपा पर संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं के दुरुपयोग का आरोप लगा रहे हैं।

यानी उत्तर प्रदेश में 2027 की लड़ाई का मैदान धीरे-धीरे साफ हो रहा है। सामाजिक समीकरण, डिजिटल नैरेटिव, सड़क की राजनीति और धार्मिक-सांस्कृतिक विमर्श—हर मोर्चे पर राजनीतिक दल अपनी ताकत आजमा रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा अपने पुराने सामाजिक और राजनीतिक समीकरणों को संभाल पाएगी, या विपक्ष इन नई दरारों को अपने लिए राजनीतिक अवसर में बदलने में कामयाब होगा?

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उत्तर प्रदेश की राजनीति में UGC के नए इक्विटी रेगुलेशन को लेकर एक ऐसा विवाद खड़ा हुआ है, जिसका असर अब विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के परिसरों से निकलकर चुनावी राजनीति तक पहुंचता दिखाई दे रहा है।

इसकी झलक विधान परिषद की स्नातक सीटों के चुनाव में देखने को मिली। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ पोस्टल बैलेट पर भाजपा उम्मीदवारों को वोट देने के बजाय उनके नाम के सामने 'UGC Roll Back' लिखकर विरोध दर्ज कराया गया। ऐसे हजारों मतपत्रों को अमान्य करार दिया गया।

तकनीकी तौर पर इन मतपत्रों को किसी उम्मीदवार के पक्ष में मिला वोट नहीं माना जा सकता, लेकिन राजनीतिक तौर पर इनका महत्व जरूर है। क्योंकि यह विरोध उन शिक्षित मतदाताओं की तरफ से आया, जिनके बीच भाजपा को पारंपरिक रूप से समर्थन मिलता रहा है।

यहां भाजपा के लिए चिंता का विषय सिर्फ कुछ हजार मतपत्र नहीं हैं। चिंता इस बात की है कि UGC के नियमों पर नाराजगी कहीं अगड़े वर्ग के एक हिस्से में व्यापक राजनीतिक असंतोष का रूप न ले ले। खासकर तब, जब उत्तर प्रदेश में 2027 का चुनाव सामाजिक समीकरणों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होने वाला है।

मामला अब इतना बड़ा हो चुका है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी इस पर विचार करना पड़ा है।

इंदौर में संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से मिले फीडबैक पर चर्चा हुई। संघ के पदाधिकारियों ने नियमों को संतुलित बनाने और सामाजिक एकता को बनाए रखने पर जोर दिया। संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर पहले ही UGC के सर्कुलर को असंतुलित बता चुके हैं।

संघ की चिंता को समझना जरूरी है। भाजपा का राजनीतिक आधार केवल एक जाति या समुदाय तक सीमित नहीं है। पार्टी ने पिछले एक दशक में अगड़ी जातियों, गैर-यादव पिछड़ों और गैर-जाटव दलितों समेत अलग-अलग सामाजिक वर्गों को साथ लेकर एक व्यापक राजनीतिक गठबंधन बनाया है। ऐसे में किसी एक वर्ग में बढ़ती नाराजगी का असर पार्टी के दूसरे सामाजिक समीकरणों पर भी पड़ सकता है।

खासकर तब, जब विपक्ष लगातार सामाजिक न्याय और संविधान के मुद्दे पर भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहा है।

UGC के नियमों पर विवाद आखिर है क्या?

इस विवाद की जड़ में 13 जनवरी 2026 को UGC की ओर से जारी किए गए नए इक्विटी रेगुलेशन हैं। विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से ये नियम लाए गए थे। लेकिन इनकी कुछ व्यवस्थाओं को लेकर विरोध शुरू हो गया। 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी थी।

नियमों की धारा 3(c) में जातिगत उत्पीड़न की परिभाषा के तहत SC, ST और OBC छात्रों को शामिल किया गया था। सामान्य वर्ग के विरोध करने वाले छात्रों और संगठनों की दलील है कि जातिगत उत्पीड़न किसी भी वर्ग के छात्र के साथ हो सकता है। इसलिए शिकायत और सुरक्षा की व्यवस्था सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध होनी चाहिए।

उनकी दूसरी चिंता शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर सख्त कार्रवाई के निर्देशों को लेकर है। उनका कहना है कि बिना निष्पक्ष जांच और पर्याप्त बचाव के प्रावधानों के इस तरह की व्यवस्था का दुरुपयोग हो सकता है। इससे सामान्य वर्ग के छात्रों में असुरक्षा की भावना पैदा हो सकती है।

लेकिन इस विवाद का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

SC, ST और OBC समुदायों के छात्रों का तर्क है कि विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव आज भी एक वास्तविक समस्या है। पढ़ाई के दौरान ताने, अपमान और असमान व्यवहार जैसी स्थितियों से निपटने के लिए मजबूत कानूनी व्यवस्था और इक्विटी कमेटियों की जरूरत है। उनके मुताबिक, अगर शिकायत निवारण की व्यवस्था प्रभावी नहीं होगी तो समान अवसर और निष्पक्ष शैक्षणिक माहौल केवल कागजों पर रह जाएगा।

यानी एक पक्ष को नियमों के दुरुपयोग और असमान सुरक्षा का डर है, तो दूसरे पक्ष को शिकायतों की अनदेखी और संस्थागत भेदभाव का।

राजनीतिक चुनौती यही है कि एक वर्ग की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए दूसरे वर्ग में असुरक्षा पैदा न हो। सामाजिक न्याय और निष्पक्ष प्रक्रिया एक-दूसरे के विरोधी नहीं होने चाहिए। किसी भी व्यवस्था का उद्देश्य भेदभाव रोकना होना चाहिए, न कि समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच अविश्वास बढ़ाना।

प्रयागराज में विरोध, भाजपा के मंच पर ही उठे सवाल

इस विवाद की राजनीतिक गंभीरता का अंदाजा प्रयागराज में हुए घटनाक्रम से लगाया जा सकता है।

एक नवंबर को परेड ग्राउंड में आयोजित सवर्ण-ब्राह्मण सम्मेलन में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य मुख्य अतिथि के तौर पर पहुंचे थे। मंच पर मौजूद दो युवाओं ने UGC के नियमों का विरोध करते हुए उनसे पार्टी का रुख स्पष्ट करने को कहा।

केशव प्रसाद मौर्य ने दोनों युवाओं को समझाकर शांत कराने की कोशिश की, लेकिन सम्मेलन में विवाद बढ़ गया। वहां मौजूद भाजपा पार्षद विनय मिश्रा की विरोध कर रहे युवाओं से कहासुनी हुई और उन्होंने एक युवक को थप्पड़ मार दिया। इसके बाद कार्यक्रम में मौजूद लोगों में नाराजगी फैल गई।

इस घटना का राजनीतिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि विरोध भाजपा के किसी विरोधी दल की रैली में नहीं, बल्कि भाजपा के ही कार्यक्रम में हुआ। इससे यह संकेत मिला कि पार्टी के पारंपरिक समर्थक माने जाने वाले वर्ग के भीतर भी इस मुद्दे को लेकर असंतोष मौजूद है।

अब भाजपा इस नाराजगी को संभालने के लिए छात्र संवाद का सहारा ले रही है।

भाजपा युवा मोर्चा प्रदेश के 294 विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रों से बातचीत कर रहा है। इन कार्यक्रमों में 'लोकतंत्र बनाम अराजकता' जैसे विषयों पर चर्चा की जा रही है। आने वाले समय में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पार्टी के दूसरे बड़े नेता भी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाकर युवाओं से संवाद करेंगे।

भाजपा के सामने समाधान के चार रास्ते?

पार्टी से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार इस विवाद को विधानसभा चुनावों से पहले सुलझाने के लिए चार संभावित विकल्पों पर विचार कर सकती है।

पहला, सुप्रीम कोर्ट में प्रभावी पैरवी करके ऐसी व्यवस्था की बहाली का रास्ता निकालना जिसमें सभी सामाजिक वर्गों के हितों का संतुलन हो।

दूसरा, केंद्र सरकार UGC के विवादित सर्कुलर को वापस लेने का फैसला कर सकती है।

तीसरा, सरकार अदालत में नए नियमों की व्यावहारिक कठिनाइयों को स्वीकार करते हुए उन्हें निरस्त किए जाने का रास्ता अपना सकती है।

चौथा, UGC एक नया सर्कुलर जारी करे जिसमें विवादित और असंतुलित प्रावधानों को हटाकर नई व्यवस्था बनाई जाए।

हालांकि ये अभी संभावित विकल्प हैं, सरकार का घोषित फैसला नहीं।

भाजपा के प्रदेश प्रभारी विनोद तावड़े ने भी संकेत दिया है कि चुनाव की तारीखों के ऐलान से पहले इस विवाद का समाधान निकालने की कोशिश की जाएगी।

अब यहां राजनीति का एक बड़ा सवाल है। भाजपा के सामने सिर्फ UGC के नियमों में बदलाव का सवाल नहीं है, बल्कि उस भरोसे को बनाए रखने की चुनौती है जिसने अलग-अलग जातीय समूहों को पार्टी के साथ जोड़ा है।

क्योंकि विपक्ष के लिए यह मुद्दा भाजपा के सामाजिक गठबंधन में सेंध लगाने का अवसर बन सकता है। और भाजपा के लिए इसे संभालना केवल कानूनी नहीं, राजनीतिक जरूरत भी है।

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चुनाव की राजनीति अब केवल रैली में जुटने वाली भीड़, अखबारों के विज्ञापनों या टीवी पर दिखने वाली बहसों तक सीमित नहीं है। मोबाइल फोन की स्क्रीन पर भी राजनीतिक प्रभाव और जनसमर्थन का एक अलग मैदान बन चुका है।

उत्तर प्रदेश में इसी डिजिटल मैदान को लेकर एक दिलचस्प तस्वीर सामने आ रही है। सोशल मीडिया पर पोस्ट के लाइक, शेयर और कमेंट यानी इंगेजमेंट के मामले में समाजवादी पार्टी, उत्तर प्रदेश भाजपा से आगे बताई जा रही है।

हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा। भाजपा के राष्ट्रीय अकाउंट के अलावा अलग-अलग राज्यों के अकाउंट भी हैं, जबकि समाजवादी पार्टी का एक ही अकाउंट राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर इस्तेमाल होता है। इसलिए दोनों की तुलना पूरी तरह समान आधार पर नहीं की जा सकती।

फिर भी उत्तर प्रदेश भाजपा के अपने सोशल मीडिया अकाउंट को लेकर कुछ आंकड़े पार्टी के लिए चिंता का कारण बने हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, संघ के सह सरकार्यवाह अरुण कुमार ने 22 अक्टूबर को लखनऊ दौरे के दौरान इस मुद्दे पर बैठक की थी। उन्हें बताया गया कि केवल 20 दिनों के भीतर उत्तर प्रदेश भाजपा का सोशल मीडिया इंगेजमेंट लगभग 35 प्रतिशत घट गया।

28 सितंबर से 12 अक्टूबर के बीच 1,734 लोगों ने यूपी भाजपा के इंस्टाग्राम अकाउंट को अनफॉलो भी किया।

दूसरी तरफ, समाजवादी पार्टी के इंस्टाग्राम फॉलोअर्स में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है।

लेकिन तस्वीर इतनी सीधी भी नहीं है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निजी इंस्टाग्राम अकाउंट पर बीते एक महीने में हर रील को औसतन 15 लाख से अधिक व्यूज मिले, जबकि अखिलेश यादव की रील को औसतन लगभग 55 हजार व्यूज मिले। यानी इस तुलना में योगी की पहुंच करीब 27 गुना अधिक बताई गई।

इससे एक अहम अंतर सामने आता है। मुख्यमंत्री के व्यक्तिगत सोशल मीडिया प्रभाव और भाजपा के प्रदेश संगठन के डिजिटल प्रदर्शन को एक ही पैमाने पर नहीं देखा जा सकता। योगी की डिजिटल लोकप्रियता मजबूत हो सकती है, लेकिन इससे यह जरूरी नहीं कि पार्टी के हर राज्य स्तरीय अकाउंट की पहुंच और सक्रियता भी उतनी ही मजबूत हो।

क्या ज्यादा लाइक का मतलब ज्यादा वोट है?

यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या सोशल मीडिया पर बढ़ती लोकप्रियता 2027 के विधानसभा चुनाव में वोटों में भी बदल सकती है?

राजनीतिक विश्लेषक अमिताभ तिवारी के मुताबिक, सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स होने का यह अर्थ नहीं है कि चुनाव में उतने ही लोग वोट भी देंगे। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का सोशल मीडिया इंगेजमेंट भाजपा से अधिक होने का उदाहरण देते हुए वे बताते हैं कि डिजिटल लोकप्रियता और चुनावी जीत के बीच सीधा संबंध नहीं होता।

इसकी कई वजहें हैं।

पहली, सोशल मीडिया पर इंगेजमेंट किस भौगोलिक क्षेत्र से आ रहा है, इसका स्पष्ट पता हमेशा नहीं चलता। मसलन, दिल्ली या दूसरे राज्यों में बैठे लोग अगर अखिलेश यादव की पोस्ट को खूब लाइक और शेयर कर रहे हैं तो इससे सपा का इंगेजमेंट बढ़ेगा, लेकिन जरूरी नहीं कि इससे उत्तर प्रदेश के चुनावी नतीजों पर कोई असर पड़े।

दूसरी, किसी नेता के मीम, व्यंग्य या मनोरंजक वीडियो पर मिलने वाले लाखों व्यूज को राजनीतिक समर्थन नहीं माना जा सकता। हो सकता है कोई व्यक्ति किसी नेता की आलोचना के लिए उसकी पोस्ट देख रहा हो या केवल मनोरंजन के लिए वीडियो शेयर कर रहा हो।

तीसरी, सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले सभी वर्गों का राजनीतिक व्यवहार एक जैसा नहीं होता। युवा मतदाता डिजिटल मंचों पर अधिक सक्रिय हैं, जबकि बड़ी उम्र के मतदाताओं तक टीवी और दूसरे पारंपरिक माध्यमों की पहुंच अधिक हो सकती है।

इसलिए डिजिटल आंकड़ों को चुनावी जनमत का सीधा पैमाना मान लेना गलत होगा।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि सोशल मीडिया की भूमिका कम हो गई है।

फिर पार्टियां डिजिटल प्रचार पर करोड़ों रुपये क्यों खर्च करती हैं?

इसका जवाब राजनीति के उस हिस्से में है जिसे पर्सेप्शन यानी धारणा कहा जाता है।

सोशल मीडिया पर किसी पार्टी की लगातार मौजूदगी यह संदेश देती है कि वह सक्रिय है, लोकप्रिय है और उसके समर्थन में माहौल बन रहा है। इससे केवल मतदाताओं पर नहीं, बल्कि पार्टी के अपने कार्यकर्ताओं पर भी असर पड़ता है।

जब कार्यकर्ता देखते हैं कि उनकी पार्टी का संदेश लगातार वायरल हो रहा है, विरोधियों के आरोपों का जवाब दिया जा रहा है और उनके नेता डिजिटल प्लेटफॉर्म पर चर्चा में हैं, तो उनका मनोबल बढ़ता है।

इसके अलावा सोशल मीडिया के जरिए राजनीतिक दल अलग-अलग उम्र, जाति और भौगोलिक क्षेत्रों के लोगों तक अलग-अलग संदेश पहुंचा सकते हैं। युवाओं के लिए रोजगार, महिलाओं के लिए सुरक्षा, किसानों के लिए उनकी समस्याओं और शहरी मतदाताओं के लिए विकास से जुड़े अभियान बनाए जा सकते हैं।

यानी सोशल मीडिया अब केवल प्रचार का माध्यम नहीं, बल्कि मतदाता की रुचि समझने, राजनीतिक प्रतिक्रिया जानने और अपने पक्ष का नैरेटिव स्थापित करने का औजार भी है।

संघ ने क्यों किया हस्तक्षेप?

अब सवाल है कि उत्तर प्रदेश भाजपा की सोशल मीडिया रीच में गिरावट इतनी महत्वपूर्ण क्यों हो गई कि संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी को इस पर बैठक करनी पड़ी?

राजनीतिक विश्लेषक सिद्धार्थ कलहंस के मुताबिक, 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद सोशल मीडिया पर राजनीतिक नैरेटिव बनाने में भाजपा सबसे आगे थी। फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्सऐप जैसे प्लेटफॉर्म पर पार्टी की आईटी रणनीति ने उसे बड़ा राजनीतिक लाभ दिया।

लेकिन अब डिजिटल दुनिया बदल चुकी है।

नई पीढ़ी इंस्टाग्राम और दूसरे नए प्लेटफॉर्म पर अधिक सक्रिय है। यहां वीडियो, रील, छोटे कंटेंट और नई तरह की कहानी कहने की शैली महत्वपूर्ण हो गई है। ऐसे में केवल पुराने व्हाट्सऐप ग्रुप और फेसबुक आधारित प्रचार से नई पीढ़ी तक उसी प्रभाव से पहुंचना मुश्किल हो सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश भाजपा की क्षेत्रीय सोशल मीडिया टीमें भी लंबे समय से गठित नहीं हुई थीं। संघ के पदाधिकारी की बैठक के बाद इन टीमों की घोषणा कर दी गई।

इस घटनाक्रम को सिर्फ डिजिटल प्रचार में सुधार की कोशिश के तौर पर नहीं देखना चाहिए। संघ के लिए संगठनात्मक सक्रियता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

क्योंकि डिजिटल दुनिया में किसी पार्टी की निष्क्रियता कभी-कभी उसके जमीनी संगठन की सुस्ती का भी संकेत बन सकती है।

2027 से पहले भाजपा के लिए चुनौती यही है कि वह मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत लोकप्रियता को पार्टी के संगठनात्मक प्रभाव में कैसे बदले। और समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती यह है कि डिजिटल सक्रियता को वास्तविक मतदाता समर्थन और बूथ स्तर की ताकत में कैसे बदला जाए।

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सोशल मीडिया पर चल रही राजनीतिक लड़ाई के साथ अब उत्तर प्रदेश की राजनीति सड़क पर भी तेज होती दिखाई दे रही है।

भाजपा मंगलवार से प्रदेश में 'लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ' पदयात्रा अभियान शुरू कर रही है। अगले तीन दिनों तक प्रदेश के सभी छह संगठनात्मक क्षेत्रों में पार्टी के नेता, मंत्री और कार्यकर्ता सड़क पर उतरेंगे।

लखनऊ में केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान पदयात्रा का नेतृत्व करेंगे। बरेली में केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा पार्टी के अभियान में शामिल होंगे। गोरखपुर में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन पदयात्रा निकालेंगे, जबकि गाजियाबाद में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मार्च का नेतृत्व करेंगे।

यह अभियान सिर्फ प्रदेश तक सीमित नहीं है। भाजपा इसी नाम से दूसरे राज्यों में भी राजनीतिक मार्च और रैलियां आयोजित कर रही है। अमित शाह हैदराबाद में कार्यकर्ताओं के साथ मार्च कर चुके हैं। बिहार, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में भी इसी तरह के राजनीतिक कार्यक्रम हुए हैं।

लेकिन उत्तर प्रदेश के संदर्भ में इस अभियान का महत्व अलग है।

2027 का चुनाव सामने है और भाजपा को अपने संगठन को प्रदेश के हर क्षेत्र में सक्रिय रखना है। इसलिए पदयात्रा के जरिए पार्टी एक साथ कई लक्ष्य साधना चाहती है।

पहला, INDIA ब्लॉक के खिलाफ अपना राजनीतिक संदेश जनता तक पहुंचाना।

दूसरा, पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं को सक्रिय करना।

तीसरा, उन इलाकों में जनसंपर्क बढ़ाना जहां चुनाव से पहले संगठन की मौजूदगी और कार्यकर्ताओं की सक्रियता को मजबूत करने की जरूरत है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस अभियान के दौरान पार्टी के नेता संबंधित क्षेत्रों में रात्रि विश्राम भी करेंगे और बूथ कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करेंगे।

यानी यह केवल एक दिन की रैली नहीं, बल्कि चुनाव से पहले संगठन को सड़क पर उतारने की कवायद है।

यहां एक दिलचस्प राजनीतिक पहलू भी है।

भाजपा 'लोकतंत्र बचाओ-अराजकता हटाओ' का नारा देकर विपक्षी गठबंधन पर सवाल उठा रही है। दूसरी तरफ विपक्ष SIR और मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर चुनाव आयोग और केंद्र सरकार पर सवाल उठाता रहा है।

दोनों पक्ष लोकतंत्र और चुनावी व्यवस्था की व्याख्या अपने-अपने तरीके से कर रहे हैं। एक पक्ष इसे संस्थाओं की विश्वसनीयता और निष्पक्षता का सवाल बता रहा है, तो दूसरा पक्ष विपक्ष पर अराजकता और राजनीतिक भ्रम फैलाने का आरोप लगा रहा है।

आखिरकार इस बहस का जवाब राजनीतिक नारों से नहीं, बल्कि चुनावी प्रक्रिया में जनता के भरोसे से तय होगा।

भाजपा की पदयात्रा की सफलता का पैमाना भी केवल इसमें शामिल नेताओं की संख्या नहीं होगी। असली सवाल यह होगा कि क्या यह अभियान कार्यकर्ताओं को बूथ तक सक्रिय कर पाता है और क्या सरकार के पक्ष में जनता के बीच नई राजनीतिक ऊर्जा पैदा कर पाता है।

4.

अब बात समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव की, जो धार्मिक-सांस्कृतिक विमर्श में भी अपनी राजनीतिक भूमिका को विस्तार देने की कोशिश कर रहे हैं।

बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की भगवान श्रीकृष्ण को लेकर की गई एक कथित टिप्पणी पर विवाद खड़ा हुआ है। इसी विवाद में अखिलेश यादव ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है।

अखिलेश ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा कि किसी एक अवतार की तुलना दूसरे अवतार से करके उन्हें बेहतर बताने की कोशिश सनातन समाज की एकता को नुकसान पहुंचा सकती है। उन्होंने इसे गंभीर मामला बताते हुए जांच और कार्रवाई की मांग की।

अखिलेश का कहना है कि भगवान के अलग-अलग अवतारों को लेकर श्रद्धालुओं के बीच श्रेष्ठता का विवाद खड़ा करना उचित नहीं है। उन्होंने नवमी और अष्टमी का उल्लेख करते हुए कहा कि सनातन परंपरा में दोनों अवतारों के प्रति आस्था रखी जाती है।

यहां अखिलेश यादव का राजनीतिक संदेश भी समझना जरूरी है।

समाजवादी पार्टी लंबे समय तक भाजपा के हिंदुत्व आधारित राजनीतिक विमर्श के सामने अपने को सामाजिक न्याय, पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक और संविधान के मुद्दों के जरिए स्थापित करती रही है। लेकिन पिछले कुछ समय से अखिलेश यादव धार्मिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर भी अपनी प्रतिक्रियाओं में अधिक मुखर दिखाई दे रहे हैं।

इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि भाजपा जिस धार्मिक विमर्श को अपनी राजनीतिक ताकत का हिस्सा मानती है, विपक्ष उसके भीतर ही सामाजिक समरसता और धार्मिक एकता का सवाल उठाकर अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।

हालांकि, अखिलेश यादव की टिप्पणी का एक दूसरा पहलू भी है। उन्होंने सीधे तौर पर कथावाचक के कथित बयान की आलोचना से आगे बढ़कर इसे सनातन समाज की एकता के खिलाफ साजिश बताया है। यह आरोप अपने आप में गंभीर है और इसके लिए तथ्यों तथा संबंधित बयान के पूरे संदर्भ की जांच जरूरी होगी।

लेकिन राजनीति में इस तरह के बयान तत्काल एक व्यापक बहस पैदा करते हैं—धार्मिक आस्था के भीतर अलग-अलग मान्यताओं और परंपराओं का सम्मान कैसे बना रहे और सार्वजनिक मंचों से होने वाली टिप्पणियों की सीमाएं क्या हों?

भाजपा पर संविधान और संस्थाओं के दुरुपयोग का आरोप

इसी के साथ अखिलेश यादव ने भाजपा सरकार पर संवैधानिक संस्थाओं के दुरुपयोग और विपक्ष के खिलाफ बदले की भावना से कार्रवाई करने का आरोप भी लगाया है।

उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार संविधान और कानून का सम्मान नहीं कर रही है। उनके मुताबिक, सत्ता जाने के डर से सरकार राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है।

अखिलेश ने महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार को भी मुद्दा बनाया। उन्होंने कहा कि किसान, छात्र, नौजवान, व्यापारी और महिलाएं सरकार की नीतियों से परेशान हैं।

विधान परिषद चुनाव के नतीजों को भी उन्होंने भाजपा के लिए राजनीतिक संकेत बताते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश की जनता विधानसभा चुनाव का इंतजार कर रही है और चुनाव की घोषणा होते ही भाजपा को हार का सामना करना पड़ेगा।

यहां गौर करने वाली बात है कि अखिलेश यादव अब अपनी राजनीति में दो तरह के विमर्श एक साथ लेकर चल रहे हैं।

एक तरफ PDA और सामाजिक न्याय की राजनीति है, दूसरी तरफ संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाओं और विपक्ष के अधिकारों का मुद्दा है। इसके साथ धार्मिक-सांस्कृतिक विषयों पर उनकी सक्रियता भी बढ़ती दिखाई दे रही है।

यानी समाजवादी पार्टी भाजपा को केवल जातीय समीकरणों के आधार पर चुनौती देने के बजाय उसके राजनीतिक और वैचारिक विमर्श के भीतर भी सवाल खड़े करना चाहती है।

लेकिन इस रणनीति की परीक्षा जमीन पर होगी। क्या अखिलेश यादव अलग-अलग सामाजिक समूहों को एक साझा राजनीतिक संदेश के तहत जोड़ पाएंगे? और क्या उनकी बात केवल राजनीतिक सभाओं और सोशल मीडिया तक सीमित न रहकर बूथ स्तर पर भी असर पैदा करेगी?

यह 2027 की राजनीति में समाजवादी पार्टी के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवालों में से एक होगा।

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