
शी-ट्रंप मुलाकात: गर्मजोशी खूब, नतीजे कम
अमेरिका और चीन ने टकराव को फिलहाल बढ़ने से रोकने के संकेत दिए हैं, लेकिन व्यापार, टेक्नोलॉजी और रणनीतिक हितों से जुड़े बुनियादी मतभेद कायम हैं। Critical Minerals से लेकर सेमीकंडक्टर तक, दोनों देशों की प्रतिस्पर्धा बताती है कि रिश्तों में स्थायी बदलाव की राह अभी लंबी है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के लिए शानदार स्वागत समारोह आयोजित किया, जो ठीक वैसा ही था जैसा उन्हें इस गर्मी में चीन में मिला था। माहौल एकदम सही था - मिलिट्री बैंड, तोपों की गूंज और स्टील्थ बॉम्बर्स का फ्लाईपास्ट। लेकिन इस भव्यता के बावजूद, कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिली।
दुनिया भर में उथल-पुथल के बीच स्थिरता का संदेश
फिर भी, दुनिया की नंबर एक और नंबर दो ताकतों के नेताओं के बीच हुई इस बैठक ने वैश्विक अनिश्चितता के दौर में स्थिरता का संकेत दिया। ट्रंप का अपनापन और बैठक को सार्थक बनाने की इच्छा शुरू से ही दिखाई दे रही थी। चीन ने भी शी के नपे-तुले शब्दों में वैसा ही जवाब दिया।
शी ने ट्रंप की यात्रा के दौरान बनी रणनीतिक स्थिरता वाले रचनात्मक चीन-अमेरिका संबंधों की सोच को असल रूप देने का आह्वान किया। 'रणनीतिक स्थिरता' वह शब्द है जिसे चीन पसंद करता है। शी ने बताया कि चीन और अमेरिका के राष्ट्राध्यक्षों के बीच छह महीने से भी कम समय में एक-दूसरे के देश की यात्रा करना चीन-अमेरिका संबंधों के इतिहास में अभूतपूर्व है।
शी की ‘थ्यूसिडाइड्स ट्रैप’ वाली चेतावनी
शी ने अपनी शुरुआती बात में कहा, "थ्यूसिडाइड्स ट्रैप से निपटा जा सकता है।" उन्होंने एकेडमिक हलकों में प्राचीन ग्रीस से चली आ रही उस पुरानी सोच को माना कि एक उभरती हुई और एक स्थापित ताकत के बीच की होड़ अक्सर टकराव की वजह बनती है। शी ने कहा कि संकट को रोकने के लिए अमेरिका और चीन की सेनाओं के बीच नियमित बातचीत होनी चाहिए।
शी ने कहा, "यह एक-दूसरे से आगे निकलने की दौड़ होनी चाहिए, न कि ऐसी कुश्ती जिसमें कोई एक जीते या हारे।" उन्होंने आगे कहा कि दोनों देश आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं और उन्हें "हेल्दी" (स्वस्थ) कॉम्पिटिशन करना चाहिए जो "दायरे में" हो।
राष्ट्रपति ट्रंप हमेशा की तरह जोश में दिखे और शी के साथ अपनी उस दोस्ती की खूब तारीफ़ की, जो उनके पहले कार्यकाल में पद संभालने के बाद से बनी थी। इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ा कि ट्रंप ने ही चीन पर अमेरिकियों से हज़ारों डॉलर की धोखाधड़ी करने, कोविड महामारी के लिए बीजिंग को ज़िम्मेदार ठहराने और ट्रेड वॉर शुरू करने का आरोप लगाया था।
एजेंडा में अहम मिनरल्स और चिप्स का व्यापार शामिल
फिलहाल टैरिफ वॉर (टैक्स से जुड़ी व्यापारिक लड़ाई) रुकी हुई है, क्योंकि पिछले साल हुई ट्रेड डील को दो महीने और बढ़ाकर जनवरी तक कर दिया गया है। अधिकारी इस पर बाद में काम करेंगे। चीन के मामलों की लंबे समय से जानकार अल्का आचार्य के मुताबिक, दूरदर्शी चीन तब तक कोई डील नहीं करने वाला था जब तक कि नवंबर में होने वाले मिड-टर्म चुनावों के बाद अमेरिका में राजनीतिक स्थिति साफ न हो जाए।
अमेरिकी कारोबार के लिए ज़रूरी रेयर अर्थ मिनरल्स और चीन की हाई-टेक कंप्यूटर चिप्स की ज़रूरत पर व्यापारिक बातचीत बाद में होगी, क्योंकि दोनों पक्ष जनवरी के बाद भी ट्रेड ट्रूस (व्यापारिक युद्धविराम) को बढ़ाने के लिए समझौते पर काम कर रहे हैं।
शी ने ताइवान को लेकर 'रेड लाइन' तय की
कहा जाता है कि शी ने ट्रंप पर ज़ोर दिया कि वे ताइवान की चीन से अलग होने की कोशिशों को बढ़ावा न दें। चीन इसे एक 'रेड लाइन' मानता है और कहता है कि यह दखलंदाज़ी है और चीन के लिए बहुत ही संवेदनशील राजनीतिक मुद्दा है। ट्रंप ने अब तक ताइवान के साथ 14 अरब डॉलर की हथियारों की डील को रोक रखा है, जिसे पहले अमेरिकी कांग्रेस ने मंज़ूरी दी थी। अपने पहले कार्यकाल के दौरान, ट्रंप ने ताइवान के पक्ष में खुलकर बयान देकर चीन को परेशान कर दिया था।
समिट से पहले, दोनों देशों के बीच AI पर किसी समझौते पर पहुँचने की चर्चा थी। AI आजकल एक बहुत अहम मुद्दा है, जिस पर अमेरिका और चीन के बीच बढ़त हासिल करने की होड़ मची है। हाई-एंड AI टेक्नोलॉजी के मामले में अमेरिका चीन से आगे है। जानकारों के मुताबिक, AI सेक्टर में अमेरिका का फोकस इनोवेशन पर है, जबकि चीन की AI ताकत ज़्यादातर मार्केट-ओरिएंटेड और कमर्शियल है, जिसका मकसद उसकी इंडस्ट्री को नई जान देना है। चीन के लिए AI का मकसद इंडस्ट्री को अपग्रेड करना है, जबकि अमेरिका में कंपनियाँ टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में नई उपलब्धियाँ हासिल करने की उम्मीद कर रही हैं।
AI में होड़ का भविष्य
दिल्ली के थिंक टैंक 'मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज़ एंड एनालिसिस' में चीन मामलों की एक्सपर्ट MS प्रतिभा कहती हैं, "अमेरिका और चीन के बीच AI को लेकर चल रही होड़ दोनों देशों के बीच जारी तकनीकी कॉम्पिटिशन को दिखाती है। चीन एडवांस्ड चिप्स और टेक्नोलॉजी पर अमेरिकी पाबंदियों को कम करना चाहता है, जबकि अमेरिका AI में इन्वेस्टमेंट और इनोवेशन के मामले में आगे है। साथ ही, अमेरिका को इस बात की चिंता है कि मैन्युफैक्चरिंग और हार्डवेयर में AI पर अपनी पकड़ के ज़रिए चीन इस रेस में उससे आगे निकल सकता है। जब तक कोई एक देश AI के क्षेत्र में मज़बूत सप्लाई चेन नहीं बना लेता, तब तक दोनों देश एक-दूसरे के मुकाबले खुद को सुरक्षित रखने की कोशिश करते रहेंगे।"
ट्रंप ने AI को पूरे जोश के साथ अपनाया है और वे इस पर कोई पाबंदी या निगरानी नहीं चाहते। वे इसे 'सुपर इंटेलिजेंस' या SI कहते हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, गुरुवार (24 सितंबर) को सोशल मीडिया पर एक मैसेज में उन्होंने कहा कि वे इसे "ठीक उसी स्थिति में रहने देना" चाहते हैं। वे नए नियम या पाबंदियां लगाने के बजाय डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस पर भरोसा करेंगे। वे चाहते हैं कि चीन भी ऐसा ही करे।
लेकिन शी ज़्यादा सतर्क थे। शी ने कहा, "हमारे पास AI को अच्छे कामों के लिए विकसित और मैनेज करने की क्षमता और ज़िम्मेदारी दोनों हैं। साथ ही, हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि AI का विकास हमेशा इंसानों के नियंत्रण में रहे और लोगों की भलाई के काम आए।"
सैम ऑल्टमैन, जेन्सेन हुआंग और सुंदर पिचाई जैसे टेक दिग्गजों ने व्हाइट हाउस में आयोजित स्टेट डिनर के दौरान शी से मुलाक़ात की।
क्या अमेरिका, रूसी तेल को लेकर चीन पर प्रतिबंध लगा सकता है?
यह पता नहीं है कि क्या शी ने 'लिंडसे ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ़ 2026' का मुद्दा उठाया या नहीं। इस कानून के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति उन देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगा सकते हैं जो रूस और ईरान से तेल खरीदते हैं।
चीन और भारत, रूसी तेल के सबसे बड़े खरीदारों में से हैं। अमेरिका और चीन के कारोबारी हित आपस में बहुत गहराई से जुड़े हुए हैं और अमेरिका अपने औद्योगिक उत्पादन के लिए ज़रूरी खनिजों (critical minerals) पर निर्भर है, इसलिए इस बात की संभावना कम है कि ट्रंप चीन को निशाना बनाने के लिए अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करेंगे। उन्हें पता है कि ज़रूरी खनिजों पर एकाधिकार (monopoly) होने की वजह से चीन के पास बढ़त है।
अगर वह चीन को निशाना नहीं बनाता है, तो क्या भारत बच सकता है?
फिलहाल, ऐसा लगता है कि इस समिट से दोनों पक्षों को वह मिल गया है जिसकी उन्हें सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी - यानी अपने बुनियादी मतभेदों को सुलझाए बिना रिश्तों को स्थिर बनाए रखना। भारत के लिए भी यह संदेश उतना ही अहम है: जैसे-जैसे वॉशिंगटन और बीजिंग अपनी प्रतिद्वंद्विता को संभालते हुए अपने आर्थिक हितों की रक्षा कर रहे हैं, नई दिल्ली को इन दोनों के बीच बहुत सावधानी से आगे बढ़ना होगा, खासकर रूसी तेल और व्यापार के मामले में।

