राम मंदिर चंदा चोरी पर 'श्रीनि से संवाद' में खंगाली गई हकीकत
'द फ़ेडरल देश' के विशेष शो में एडिटर-इन-चीफ एस श्रीनिवासन ने उठाए एसआईटी जांच पर सवाल, कहा- बड़ी मछलियों को बचाने के लिए होती है लीपापोती।
Srini se Samvad: अयोध्या के भव्य राम मंदिर में करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और उनके द्वारा दिए गए दान-चढ़ावे में हेरफेर का मामला अब देश की सबसे बड़ी अदालत की दहलीज पर पहुंच चुका है. 'द फेडरल देश' के विशेष और बेबाक शो 'श्रीनि से संवाद' कार्यक्रम के तहत इस पूरे घटनाक्रम का एक-एक पन्ना खंगाला गया. शो के होस्ट मनीष कुमार ने 'द फेडरल' के एडिटर-इन-चीफ एस श्रीनिवासन के साथ विस्तार से चर्चा की, जिन्होंने 90 के दशक से राम मंदिर आंदोलन को बहुत करीब से देखा है और भारतीय राजनीति में इसके प्रभाव का बारीकी से अध्ययन किया है.
2020 के बाद बढ़ा चढ़ावा, अब उसी पर लग गई सेंध
चर्चा के दौरान एडिटर-इन-चीफ एस श्रीनिवासन ने मंदिर के ऐतिहासिक और राजनीतिक सफर का जिक्र करते हुए बताया कि साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद 2020 में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन हुआ. इसके बाद मंदिर निर्माण कार्य में तेजी आई और 2024 में रामलला की भव्य प्राण-प्रतिष्ठा की गई. 2025 में मंदिर में एक विशाल ध्वज स्तंभ भी स्थापित किया गया. इस पूरे कालखंड में देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं की तादाद लाखों में पहुंच गई और मंदिर की तिजोरी में करोड़ों रुपये का चढ़ावा आने लगा.
लेकिन, इसी ऐतिहासिक और संवेदनशील आस्था के केंद्र पर चंदा चोरी का यह दाग लगना बेहद चौंकाने वाला है. श्रीनिवासन जी ने साफ किया कि इस महा-घोटाले की सुगबुगाहट 5 मई के आसपास ही पूरे अयोध्या में फैल चुकी थी. दरअसल, पैसों के लेन-देन और बंदरबांट को लेकर अंदरूनी स्तर पर आपस में विवाद और मनमुटाव शुरू हुआ, जिसके बाद यह पूरा गोरखधंधा खुलकर सामने आ गया.
क्या SIT जांच केवल 'लीपापोती' की कोशिश है?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा पेच जांच की प्रक्रिया को लेकर फंसा हुआ है. अयोध्या के दो स्थानीय पत्रकारों—इन्दु भूषण पांडे और ओपी सिंह की सक्रियता के बाद यह मामला मुख्यधारा में आया. इसके बाद एक अन्य पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने अपनी वेबसाइट 'टॉप सीक्रेट' पर इसे एक 'भयानक सपने' की तरह सांकेतिक रूप से पेश किया, जिसके बाद समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव और अन्य विपक्षी नेताओं ने इस मुद्दे को राजनीतिक रूप से उठा लिया.
विपक्ष लगातार इस पूरे मामले की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराने की मांग कर रहा था, क्योंकि यह घोटाला कई राज्यों और विदेशी फंड से भी जुड़ा हो सकता है. लेकिन, सरकार ने तत्काल सीबीआई जांच के बजाय एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन कर दिया और उसके बाद ही एफआईआर दर्ज कर कुछ लोगों की गिरफ्तारियां दिखाई गईं. 'निष्पक्ष' शो में यह बड़ा सवाल उठाया गया कि क्या एसआईटी का गठन सिर्फ मामले को दबाने और 'लीपापोती' करने की एक कोशिश थी? श्रीनिवासन जी ने अपने पुराने पत्रकारिता के अनुभवों का हवाला देते हुए कहा कि अधिकांश राज्यों में ऐसी एसआईटी या मजिस्ट्रियल जांच का आउटपुट पहले से ही तय होता है, जहां छोटी मछलियों को तो बलि का बकरा बना दिया जाता है, लेकिन इसके पीछे की बड़ी कहानी और बड़े रसूखदार मगरमच्छ हमेशा बच निकलते हैं.
सुप्रीम कोर्ट का हंटर और 20 जुलाई की तारीख
भले ही ट्रस्ट के चंपत राय और अनिल मिश्रा जैसे पदाधिकारियों ने शुरुआत में इसे केवल एक रूटीन 'ऑडिट प्रक्रिया' बताकर खारिज करने की कोशिश की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट इस बार बेहद सख्त रुख में है. चीफ जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने कुल 4 अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार, केंद्र सरकार और राम मंदिर ट्रस्ट - तीनों को कड़ा नोटिस थमा दिया है.
अदालत ने साफ शब्दों में निर्देश दिया है कि मंदिर परिसर के तमाम सीसीटीवी (CCTV) फुटेज को तुरंत सुरक्षित किया जाए ताकि साक्ष्यों के साथ कोई छेड़छाड़ न हो सके. इसके साथ ही यूपी सरकार को आदेश दिया गया है कि वह 20 जुलाई तक एसआईटी (SIT) की अंतरिम रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सीधे कोर्ट के सामने पेश करे, जिसमें यह भी साफ होना चाहिए कि इस जांच टीम में कौन-कौन से अफसर शामिल हैं. 20 जुलाई की यह तारीख उत्तर प्रदेश के उन रसूखदारों के लिए बेहद भारी साबित हो सकती है, जिनकी शह पर रामलला की तिजोरी में यह सेंधमारी की जा रही थी.
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