पहली सर्दी में बच्चे को RSV से बचाएं, दूर रहेगा अस्थमा का खतरा!
बच्चे भविष्य में अस्थमा की चपेट में आएंगे या नहीं, इस बात की नींव जन्म के बाद के सर्दी के पहले मौसम के दौरान पड़ जाती है...
कुछ हफ्तों के बच्चे को सर्दी खांसी या छाती में कफ हो जाए तो आमतौर पर मान लिया जाता है कि “मौसम बदल रहा है… बच्चा अभी छोटा है… सब छोटे बच्चों को होता है… ठीक हो जाएगा।”
हालांकि विज्ञान अब इस विश्वास को चुनौती दे रहा है। क्योंकि शिशु उम्र में होने वाला RSV (Respiratory Syncytial Virus) संक्रमण सिर्फ उस समय का सांस लेने में कठिनाई वाला एपिसोड नहीं होता, यह आगे चलकर अस्थमा की नींव भी बन सकता है। इस स्थिति में यह बीमारी बाहर नहीं दिखती लेकिन इम्यून सिस्टम के अंदर चुपचाप भविष्य की तस्वीर बदल रही होती है।
हजारों बच्चों की हेल्थ रिपोर्ट
ठीक यही खुलासा Science Immunology में प्रकाशित VIB और Ghent University (Belgium) की हालिया रिसर्च में किया गया है। इस अध्ययन में डेनमार्क के हजारों बच्चों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड और प्रयोगशाला डेटा को मिलाकर देखा गया कि जिन बच्चों में एलर्जी या अस्थमा की प्रवृत्ति पहले से मौजूद थी और उन्होंने जीवन के शुरुआती महीनों में RSV संक्रमण झेला, उनमें बाद के वर्षों में अस्थमा होने की संभावना बहुत अधिक पाई गई।
लेकिन इसी शोध में सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि जिन बच्चों को RSV संक्रमण से सुरक्षा दी गई (जैसे टीकाकरण के रूप में), उनमें अस्थमा का जोखिम लगभग गायब हो गया। अर्थात पूरी बीमारी का मोड़ उस समय तय हो जाता है, जब बच्चा कुछ महीनों का होता है। ऐसे में मायने यह नहीं रखता कि अस्थमा कब दिखाई देता है। बल्कि यह महत्वपूर्ण है कि समस्या कब शुरू हुई।
पहले भी मिलीं चेतावनी
कुछ पूर्व शोधों में भी इसी प्रकार के संकेत और चेतावनियां मिल चुकी हैं। जैसे, Vanderbilt University Medical Center (2023) की रिसर्च में यह पाया गया कि जिन बच्चों को जन्म के पहले वर्ष में RSV संक्रमण हुआ, उनमें 5 वर्ष की उम्र तक अस्थमा विकसित होने का खतरा कई गुना अधिक देखा गया। जबकि जिन बच्चों को RSV संक्रमण नहीं हुआ उनमें यह खतरा न्यूनतम था।
और यह कहानी 1998 से भी चल रही है, जब एक लंबी स्टडी में RSV ब्रोंकियोलाइटिस वाले शिशुओं में आगे चलकर बार-बार घरघराहट (wheezing) और फेफड़ों में सूजन अधिक पाई गई, जो अस्थमा के शुरुआती संकेत हैं। अर्थात यह बात एकदम साफ है कि RSV सिर्फ “एक वायरल सर्दी” नहीं है, यह बच्चे के भविष्य की सांसों को तय कर सकता है।
माता-पिता क्या करें?
अब इस रिसर्च के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि इस स्टडी का लाभ माता-पिता अपने बच्चों की सेहत के संबंध में किस प्रकार उठा सकते हैं? ऐसे में अगर परिवार में अस्थमा, एलर्जी, सीने में घरघराहट या सांस की बीमारी का इतिहास है तो बच्चे को पहले वर्ष में RSV संक्रमण होने से अस्थमा का जोखिम बहुत बढ़ जाता है।
इसका मतलब यह नहीं है कि हर RSV संक्रमण अस्थमा में बदलता है। बल्कि यह कि अगर बच्चे की जेनेटिक बनावट पहले से संवेदनशील हो तो RSV को लेकर गंभीर रहें। क्योंकि RSV आमतौर पर सामान्य सर्दी जैसा ही दिखता है और इसी गलतफहमी में मामला गंभीर हो जाता है।
इन संकेतों को ना करें अनदेखा
RSV के संकेतों को अनदेखा नहीं करना चाहिए। जैसे, बच्चे की सांसें तेज चलना, पसलियों का अंदर की तरफ सिकुड़ना, दूध/भोजन कम हो जाना, लगातार खांसी, तेज कफ, घरघराहट, या बहुत छोटे बच्चे में बिना बुखार के भी सांस में दिक्कत। क्योंकि ये सिर्फ लक्षण नहीं हैं बल्कि सहायता के लिए आपके शरीर की पुकार है।
RSV संक्रमण से बचाव
और अब आते हैं, इस शोध को सबसे महत्वपूर्ण बनाने वाले बिंदु पर। क्योंकि RSV संक्रमण से बचाव चाहे टीकाकरण के रूप में हो या मेडिकल गाइडेंस के साथ, समय रहते रोकथाम बच्चे के भविष्य से अस्थमा का खतरा मिटा सकती है। जिस बच्चे के बचपन को हमने अभी अभी बचा लिया, उसके स्कूल के साल, खेल का मैदान, जीवनशैली और आत्मविश्वास को हमने बिना कहे सुरक्षित कर दिया।
भीड़भाड़ से दूर रखें (पहले 6 महीने सबसे संवेदनशील)
नवजात और 6 महीने तक के शिशुओं की इम्यून शक्ति पूरी तरह विकसित नहीं होती। इसलिए इतने छोटे बच्चों को भीड़ वाली जगहों, पार्टियों, मॉल और अस्पतालों में ले जाने से संक्रमण का जोखिम बढ़ता है।
बीमार व्यक्ति बच्चे से दूर रहें
खासकर 2 साल से छोटे बच्चों में RSV तेजी से फैलता है।
अगर घर में किसी को जुकाम, कफ या खांसी है तो बच्चा गोद में कम लें या ना लें। फिर भले ही वह परिवार का कोई भी सदस्य हो।
हाथों की सफाई
RSV रोकने में सबसे महत्वपूर्ण होता है, हाथों को साफ रखना। बच्चे को पकड़ने से पहले हाथ धोएं। साथ ही यदि घर के बाहर लंबा समय बिताकर आ रहे हैं तो बच्चे को गोद में लेने से पहले कपड़े बदल लें। साथ ही बच्चे के चेहरे को बार-बार ना छुएं। घर में भी साफ-सफाई का पूरा ध्यान रखें क्योंकि RSV एक सतह पर घंटों तक जीवित रह सकता है।
बच्चे को चूमने से बचें
बच्चे को बार-बार चूमने से बचना चाहिए (विशेषकर चेहरे पर) क्योंकि RSV लार और सांस से तेजी से फैलता है। यह नियम खासकर नवजात बच्चों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
धुएं से दूरी
छोटे बच्चों को धुएं से बचाकर रखना चाहिए। यह खांसी का “सबसे बड़ा ट्रिगर” होता है। फिर धुआं चाहे सिगरेट/ तंबाकू/अगरबत्ती/घर में रसोई/सुगंधित स्प्रे इत्यादि किसी भी चीज का क्यों ना हो। धुआं फेफड़ों की प्राकृतिक सुरक्षा को कमजोर कर देते है और RSV संक्रमण को तेज करते है।
स्तनपान (Breastfeeding)
छोटे बच्चे को मां का दूध मिलना ही चाहिए। क्योंकि यह बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। मां के दूध में मौजूद एंटीबॉडी RSV वायरस से लड़ने में प्रमुख भूमिका निभाती है। इसलिए पहले 6 महीने तक बच्चे को मुख्य रूप से मां का दूध मिलना चाहिए। यह बच्चे को मजबूत सुरक्षा प्रदान करता है।
कमरे की सफाई और वेंटिलेशन
बच्चा हमेशा बंद कमरे में रहे यह भी सही नहीं है। इसलिए बच्चे को ऐसे कमरे में रखें, साफ और ताजी हवा की व्यवस्था हो। ताज़ी हवा और धूप वायरस और संक्रमण के खतरे को कम करती हैं। जबकि बंद कमरों में RSV तेजी से फैलता है।
बच्चे के खिलौने, बोतल, टेडी, बेडशीट नियमित रूप से साफ होने चाहिए। क्योंकि RSV खिलौनों और बिस्तर की सतह पर भी चिपक जाता है। बच्चे के खिलौने साबुन वाले पानी से धोएं और दूध की बोतल और निपल गर्म पानी में उबालकर साफ करें।
वैक्सिनेशन समय पर कराएं
समय पर प्रोटेक्टिव मेडिकल सहायता लेकर और टीकाकरण कराकर बच्चों को इस खतरे से बचाया जा सकता है। नवीन शोध के दिशानिर्देशों में पाया गया है कि RSV प्रोटेक्टिव वैक्सीन या जीवन की पहली सर्दियों में मेडिकल गाइडेंस के अनुसार प्रीवेंटिव डोज दिलाकर भी बच्चे को संक्रमण से बचाया जा सकता है। ये कदम भी भविष्य में अस्थमा के खतरे को बेहद कम कर देते हैं।
डिसक्लेमर- यह आर्टिकल जागरूकता के उद्देश्य से लिखा गया है। किसी भी सलाह को अपनाने से पहले डॉक्टर से परामर्श करें।