म्यांमार: भूकंपीय जोखिमों से घिरा एक संवेदनशील देश, जानें क्यों?

Myanmar की भूकंपीय संवेदनशीलता और लगातार होने वाली भूकंपीय गतिविधियों से यह स्पष्ट है कि इस क्षेत्र को भविष्य में प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव से बचाने के लिए एक ठोस और व्यवस्थित योजना की जरूरत है.;

Update: 2025-03-28 16:59 GMT

Myanmar earthquake: दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थित म्यांमार एक भूकंपीय दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र है. यह देश दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय बेल्टों में से एक पर स्थित है और यहां की भूगर्भीय हलचलों ने हमेशा बड़ी आपदाओं का सामना कराया है. अंडमान मेगाथ्रस्ट और सागाइंग दोष रेखा जैसी प्रमुख भूगर्भीय संरचनाएं म्यांमार के लिए खतरे का कारण बनी हुई हैं. हाल ही में आए 7.7 तीव्रता के भूकंप ने म्यांमार और पड़ोसी देशों में भारी तबाही मचाई, जिससे सैकड़ों मौतों का अंदेशा है तो आखिर क्यों म्यांमार इतना भूकंपीय संवेदनशील है? आइए जानते हैं.

भूगर्भीय स्थिति और टेक्टोनिक जटिलता

म्यांमार की भूगर्भीय संवेदनशीलता मुख्य रूप से इसके भौगोलिक स्थान से जुड़ी है. म्यांमार अल्पाइड बेल्ट के अंतर्गत आता है. जो एक ऐसा क्षेत्र है, जहां टेक्टोनिक गतिविधियां लगातार होती रहती हैं.

अंडमान मेगाथ्रस्ट जोन

यह क्षेत्र पश्चिम म्यांमार में स्थित है, जहां भारतीय प्लेट बर्मा प्लेट के नीचे दब रही है. यहां के भूकंपों ने न केवल म्यांमार को, बल्कि पूरे क्षेत्र को सूनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं का भी सामना कराया है. साल 2004 के सुमात्रा भूकंप से उत्पन्न सूनामी इसका एक बड़ा उदाहरण है, जिसने म्यांमार सहित कई देशों को प्रभावित किया.

सागाइंग दोष रेखा

यह दोष रेखा म्यांमार के मध्य भाग से गुजरती है और यहां के अधिकांश भूकंपों के लिए जिम्मेदार है. इस रेखा पर हलचल के कारण शैलो फोकस वाले भूकंप आते हैं. जो अक्सर आबादी वाले क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं.

इतिहास और भूगर्भीय घटना

ऐतिहासिक अध्ययन बताते हैं कि म्यांमार में पिछले 3400 वर्षों में तीन बड़ी भूकंपीय घटनाएं हुई हैं, जिनकी पुनरावृत्ति अंतराल 1000 से 1800 वर्षों के बीच रही है. उदाहरण के लिए, 1839 में हुआ आवा भूकंप, जिसने नदियों के किनारे गहरी दरारें पैदा की और सैकड़ों जानें लीं.

सूनामीजनक भूकंप और जोखिम

म्यांमार की समुद्र तटीय स्थिति भी इसे सूनामी के खतरे में डालती है. ऐतिहासिक रूप से, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के पास 1881 और 1941 में हुए भूकंपों ने बड़े पैमाने पर सूनामी का निर्माण किया. ऐसे भूकंपों का क्षेत्रीय विकास पर गंभीर असर पड़ा है और इसने यह साबित किया है कि म्यांमार जैसे देशों में सूनामी का खतरा हमेशा बना रहता है.

हाल की आपदा और उसका प्रभाव

हाल ही में म्यांमार में आए 7.7 मैग्नीट्यूड के भूकंप ने बुरी तरह से तबाही मचाई. मंडले के पास स्थित इस भूकंप ने म्यांमार और थाईलैंड को प्रभावित किया. म्यांमार के दूसरे सबसे बड़े शहर यांगून और आसपास के इलाकों में व्यापक नुकसान हुआ. सोशल मीडिया पर ध्वस्त इमारतों, मुड़ी हुई सड़कों और गिरे हुए ढांचे के दृश्य वायरल हुए, जिससे स्थिति की गंभीरता का पता चलता है.

कारण

1. यांगून और मंडले जैसे बड़े शहरों में बिना योजना के विकास और अनियंत्रित निर्माण ने भूकंपीय आपदाओं के प्रति उनकी संवेदनशीलता को बढ़ा दिया है. कई इमारतें भूकंपीय बलों का सामना करने के लिए तैयार नहीं हैं. क्योंकि इनका निर्माण बिना सही इंजीनियरिंग के किया गया है.

2. म्यांमार के पास आपातकालीन प्रतिक्रिया और भूकंपीय आपदाओं से निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन और तैयारी नहीं हैं. राष्ट्रीय योजनाओं और नीति दस्तावेजों के बावजूद, बड़े पैमाने पर नागरिक जागरूकता और तकनीकी संरचनाओं में बड़ी कमी है.

3. भूकंपों के दौरान सड़कें, पुल और अन्य बुनियादी संरचनाएं कमजोर हो जाती हैं, जो द्वितीयक आपदाओं जैसे कि बाढ़ और रास्तों के कटाव को जन्म देती हैं.

भविष्य के लिए खतरे और योजना

म्यांमार को एक भूकंपीय आपदा से बचाने के लिए बड़े कदम उठाने की आवश्यकता है. शहरीकरण की प्रक्रिया में बहुत सुधार की जरूरत है और सार्वजनिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए मजबूत तकनीकी और आपातकालीन प्रणाली की स्थापना आवश्यक है. इसके अलावा म्यांमार को अपनी तटीय और भूकंपीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए सूनामी और भूकंप से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना चाहिए.

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