AIADMK के वादों से गरमाई राजनीति, फ्रीबीज़ बनाम विकास की बहस तेज
x

AIADMK के वादों से गरमाई राजनीति, फ्रीबीज़ बनाम विकास की बहस तेज

एआईएडीएमके के मुफ्त वादों ने तमिलनाडु में राहत के साथ वित्तीय संकट की चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का कहना है इससे विकास बनाम फ्रीबीज़ की बहस तेज हो गई है।


तमिलनाडु विधानसभा चुनावों से पहले एआईएडीएमके (AIADMK) ने अपना घोषणापत्र जारी किया है, जिसमें जनकल्याण से जुड़ी कई लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा की गई है। हालांकि, इन वादों ने राज्य पर बढ़ते वित्तीय बोझ को लेकर नई चिंताओं को जन्म दे दिया है। ई के पलानीस्वामी (Edappadi K Palaniswami) के नेतृत्व वाली पार्टी ने 2.22 करोड़ राशन कार्ड धारकों को मुफ्त रेफ्रिजरेटर, हर साल तीन गैस सिलेंडर, शैक्षिक ऋण की पूरी माफी, और हर महीने 1 किलो दाल व 1 लीटर खाद्य तेल देने का वादा किया है। इसके अलावा भी कई प्रत्यक्ष लाभ (डायरेक्ट बेनिफिट) योजनाएं शामिल हैं।

द्रविड़ मॉडल और बदलती राजनीति

इन घोषणाओं को जहां महंगाई से जूझ रहे गरीब परिवारों के लिए राहत के रूप में पेश किया जा रहा है, वहीं आलोचकों का कहना है कि इससे तमिलनाडु की पहले से दबाव में चल रही वित्तीय स्थिति और बिगड़ सकती है। वर्तमान में राज्य के बजट का बड़ा हिस्सा कर्ज चुकाने में ही खर्च हो रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि तमिलनाडु की राजनीति द्रविड़ आंदोलन के शुरुआती दौर जहां शिक्षा, आरक्षण और सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर जोर था से अब उपभोक्ता-आधारित मुफ्त योजनाओं की ओर बढ़ गई है। 1980 के दशक की मिड-डे मील योजना और 2006 में मुफ्त रंगीन टीवी से शुरू हुआ यह सिलसिला अब मिक्सर, ग्राइंडर, लैपटॉप, शादी के लिए सोना और नकद हस्तांतरण तक पहुंच गया है।

विकास बनाम मुफ्त योजनाएं

राजनीतिक विश्लेषक मणिवन्नन के अनुसार, कल्याणकारी योजनाओं का उद्देश्य शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल विकास और रोजगार के जरिए लोगों को आत्मनिर्भर बनाना होना चाहिए। उनका कहना है कि “फ्रीबीज़ (मुफ्त योजनाएं) अक्सर केवल अल्पकालिक राहत देती हैं, लेकिन लंबे समय में काम करने की प्रेरणा को कम कर सकती हैं और शासन को प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद में बदल सकती हैं।” वे चेतावनी देते हैं कि राज्य का कर्ज पहले ही करीब 8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है और सालाना ब्याज भुगतान 40,000 करोड़ रुपये से अधिक है। ऐसे में नई योजनाओं का विस्तार बुनियादी ढांचे, उद्योग और सतत विकास में निवेश को प्रभावित कर सकता है।

मुफ्त योजनाओं की राजनीति का विस्तार

तमिलनाडु में इस तरह की राजनीति की शुरुआत एम करुनानिधि (M Karunanidhi) ने की थी, लेकिन इसे बड़े पैमाने पर आगे बढ़ाने का काम जे जयललिता (J Jayalalithaa) ने किया।2011 में सत्ता में वापसी के बाद उन्होंने मुफ्त मिक्सर, ग्राइंडर, पंखे, छात्रों के लिए लैपटॉप, महिलाओं के लिए सोना, ग्रामीण परिवारों के लिए बकरी-गाय, और सीमित खपत तक मुफ्त बिजली जैसी कई योजनाएं शुरू कीं।इन योजनाओं को बाद में डीएमके (DMK) ने भी आगे बढ़ाया, जिससे तमिलनाडु की राजनीति में “तुरंत लाभ” देने वाली योजनाओं का चलन मजबूत हो गया।

बढ़ता खर्च और आर्थिक दबाव

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, राज्य में पहले से ही हर साल लगभग 45,000 से 50,000 करोड़ रुपये कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च हो रहे हैं। नए वादों के जुड़ने से यह बोझ और बढ़ सकता है।यह खर्च राज्य के अनुमानित राजस्व का करीब 11 प्रतिशत है, और एक बार जनता की अपेक्षाएं बढ़ने के बाद इन योजनाओं को वापस लेना राजनीतिक रूप से बेहद मुश्किल हो सकता है। कुल मिलाकर, तमिलनाडु में चुनावी वादों की यह होड़ जहां आम जनता को तात्कालिक राहत देने का वादा करती है, वहीं राज्य की दीर्घकालिक आर्थिक स्थिरता पर गंभीर सवाल भी खड़े कर रही है।

Read More
Next Story