
असम चुनाव: क्या एकजुट विपक्ष BJP की जीत का सिलसिला तोड़ पाएगा?
कांग्रेस और रायजोर दल के बीच आखिरी समय में हुए समझौते के बावजूद, अंदरूनी कलह और कथित तौर पर स्पष्ट आर्थिक दृष्टिकोण की कमी, BJP को सत्ता से हटाने के गठबंधन के प्रयास के लिए खतरा बन गई है।
Assam Assembly Election 2026 : असम विधानसभा चुनाव के मतदान में अब तीन हफ्ते से भी कम का समय बचा है। राज्य के विपक्षी दलों ने आखिरकार वह लक्ष्य हासिल कर लिया है, जिस पर राजनीतिक विश्लेषक लंबे समय से सवाल उठा रहे थे। वह लक्ष्य है विपक्षी एकजुटता। महीनों की अटकलों, खींचतान और हिचकिचाहट के बाद, कांग्रेस और रायजोर दल (RD) ने गुरुवार 19 मार्च की देर रात अपने गठबंधन पर अंतिम मुहर लगा दी है। यह कदम सत्तारूढ़ बीजेपी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के खिलाफ एक संयुक्त मोर्चा तैयार करने के लिए उठाया गया है। बीजेपी साल 2016 से लगातार असम की सत्ता पर काबिज है और इस बार हैट्रिक की तैयारी में है। हालांकि, अब भी यह सवाल बरकरार है कि क्या यह गठबंधन बीजेपी को रोकने के लिए काफी होगा?
असम का विभाजित विपक्ष और चुनौतियां
सालों से आलोचकों का तर्क रहा है कि असम में बीजेपी की सबसे बड़ी ताकत वहां का विभाजित विपक्ष है। अब जबकि प्रमुख भाजपा विरोधी दल एक साथ आने की कोशिश कर रहे हैं, तो राजनीतिक परिदृश्य बदलता दिख रहा है। कम से कम कागज पर तो विपक्ष अब काफी मजबूत नजर आ रहा है। हालांकि, 9 अप्रैल को होने वाले मतदान के लिए अब बहुत ही कम समय बचा है। विपक्षी गठबंधन 'असम सम्मिलित मोर्चा' के सामने अब एक बहुत ही कठिन चुनौती खड़ी है। उन्हें इस अंतिम समय में मिली एकता को वास्तविक चुनावी गति में बदलना होगा। मतदान केंद्रों तक मतदाताओं को लाना उनके लिए अब सबसे बड़ी परीक्षा साबित होने वाली है।
कांग्रेस गठबंधन की संभावनाओं पर कम है उम्मीद
विपक्षी गठबंधन को लेकर जमीनी स्तर पर बहुत अधिक उत्साह देखने को नहीं मिल रहा है। तिनसुकिया की एक वकील संगीता सरमा का कहना है कि यह गठबंधन विरोधाभासों से भरा हुआ है। उनके अनुसार केवल विरोध के लिए बना गठबंधन असम में अपनी ही कमियों से गिर जाएगा। असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व महासचिव राजेश कुमार जोशी भी कुछ ऐसा ही मानते हैं। जोशी का कहना है कि असम में कांग्रेस पार्टी पूरी तरह से अपनी दिशा खो चुकी है। बाक्सा जिले के एक ई-रिक्शा चालक डेविड डेका ने भी विपक्ष की एकता पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि विपक्ष के पास स्थिरता देने का कोई ठोस भरोसा नहीं है।
बीजेपी का कल्याणकारी कवच और विपक्ष का डर
डेविड डेका पूछते हैं कि क्या विपक्षी दल एक स्थिर सरकार देने में सक्षम हैं? क्या वे बीजेपी की तरह जन कल्याणकारी योजनाओं को जारी रख पाएंगे? डिब्रूगढ़ के एक पत्रकार बिभास डोराह का मानना है कि इस बार सत्ता विरोधी लहर नहीं है। उनके अनुसार विपक्ष के लिए सत्ता तक पहुंचना कतई आसान काम नहीं होने वाला है। नागांव के एक अल्पसंख्यक नेता इकरामुल हुदा ने भी अपनी राय बेबाकी से रखी है। हुदा कहते हैं कि वर्तमान में लोग विपक्ष को बीजेपी के विकल्प के रूप में नहीं देखते। कांग्रेस कई क्षेत्रीय और वामपंथी दलों के साथ मिलकर काम करने की कोशिश कर रही है।
कांग्रेस के भीतर मचा आंतरिक घमासान
विपक्ष की एकता पर संदेह का एक बड़ा कारण कांग्रेस की अपनी आंतरिक उथल-पुथल भी है। पार्टी की संगठनात्मक ताकत पर लगातार गंभीर सवाल उठाए जा रहे हैं। हाल ही में भूपेन कुमार बोराह और प्रद्युत बोरदोलोई जैसे वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है। इन नेताओं के जाने से जमीनी स्तर पर पार्टी के नेटवर्क को गहरा धक्का लगा है। इससे कांग्रेस के आम कार्यकर्ताओं के बीच भारी अनिश्चितता और असुरक्षा पैदा हो गई है। गठबंधन का समय भी विश्लेषकों के लिए एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। संगीता सरमा मानती हैं कि बिना स्पष्टता और भरोसे के यह एकता किसी काम की नहीं है।
पूर्व कांग्रेस नेता का अपनी ही पुरानी पार्टी पर कड़ा प्रहार
सबसे कठोर आलोचना उन नेताओं की ओर से आई है जो कभी खुद कांग्रेस में थे। राजेश कुमार जोशी उनमें से एक प्रमुख नाम हैं जो अब बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। जोशी ने गौरव गोगोई के नेतृत्व और पार्टी की संभावनाओं का बहुत ही तीखा आकलन किया है। उन्होंने कहा कि असम में कांग्रेस पार्टी अपनी राह से पूरी तरह भटक गई है। उनके अनुसार गिरावट की शुरुआत साल 2022 के माजुली उपचुनाव के दौरान ही हो गई थी। इसके बाद साल 2024 में बेहाली में गठबंधन को जानबूझकर टूटने दिया गया था। उस प्रकरण ने आने वाले समय के लिए एक बहुत ही खराब मिसाल कायम कर दी थी।
संगठनात्मक कमजोरी और संवाद का अभाव
जोशी ने आगे कहा कि पार्टी के भीतर के संघर्षों ने संगठन को और कमजोर कर दिया है। भूपेन कुमार बोराह को अध्यक्ष पद से हटाना पार्टी के लिए आत्मघाती कदम साबित हुआ है। वर्तमान में राज्य कांग्रेस का नेतृत्व अपने ही कार्यकर्ताओं से काफी दूर नजर आता है। वरिष्ठ पदाधिकारी भी नेतृत्व के साथ संवाद की कमी की लगातार शिकायत कर रहे हैं। जोशी ने इसकी तुलना बीजेपी की संगठनात्मक मजबूती और अनुशासन के साथ की है। उनके अनुसार बीजेपी ने एक बहुत ही अनुशासित और एकजुट ढांचा तैयार किया है। बीजेपी का नेतृत्व जमीनी स्तर के मतदाताओं से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है।
बीजेपी की मजबूत स्थिति और हिमंत का नेतृत्व
वर्तमान स्थिति को देखते हुए राजेश जोशी का मानना है कि सत्ताधारी दल बहुत मजबूत है। उन्हें लगता है कि इस चुनाव में फिलहाल कोई गंभीर मुकाबला नजर नहीं आ रहा है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में बीजेपी 2026 में वापसी के लिए तैयार है। आम मतदाताओं के बीच भी विपक्ष की संभावनाओं को लेकर काफी संशय देखा जा रहा है। बाक्सा जिले के मतदाता डेविड डेका का मानना है कि लोग बीजेपी को ही वोट देंगे। उनके अनुसार विपक्षी दलों के पास राज्य की अर्थव्यवस्था को लेकर कोई स्पष्ट विजन नहीं है। राज्य पर पहले से ही लगभग 1.60 लाख करोड़ रुपये का भारी कर्ज है।
जन आंदोलन का अभाव और चुनावी इतिहास
पत्रकार बिभास डोराह का तर्क है कि विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी जन आंदोलन का अभाव है। भारत में कोई भी बड़ी सत्ता बिना किसी जन आंदोलन के नहीं बदली है। उन्होंने पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नंदीग्राम आंदोलन का उदाहरण दिया है। इसी तरह बीजेपी ने भी राम मंदिर आंदोलन के जरिए राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह बनाई। असम में पिछले दस सालों में विपक्ष ने ऐसा कोई बड़ा सार्वजनिक आंदोलन नहीं किया। वे केवल मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और उनके परिवार की संपत्तियों की आलोचना करते हैं। इकरामुल हुदा का मानना है कि ऐसी राजनीति से अक्सर सामने वाला नेता और मजबूत होता है।
आर्थिक एजेंडे पर विपक्ष की चुप्पी
विपक्ष की एक और बड़ी कमजोरी उनका स्पष्ट आर्थिक एजेंडा न होना बताया जा रहा है। उन्होंने यह नहीं बताया कि वे 'अरुणोदय' जैसी कल्याणकारी योजनाओं को जारी रखेंगे या नहीं। आजीविका, स्वास्थ्य और शिक्षा पर उनकी नीतियों के बारे में कोई स्पष्टता नहीं है। इसके बिना मतदाता विपक्ष को एक विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्वीकार करने में हिचकिचाएंगे। हुदा ने विपक्ष पर आवश्यक वस्तुओं और ईंधन की कीमतों पर मजबूत रुख न अपनाने का आरोप लगाया। परिवहन किराए में वृद्धि जैसे मुद्दों पर भी विपक्ष ने कोई बड़ा विरोध नहीं किया। वहीं दूसरी ओर बीजेपी ने अपने राजनीतिक संदेशों से मतदाताओं को एकजुट किया है।
ध्रुवीकरण और क्षेत्रीय दलों की मजबूरी
हुदा का आरोप है कि बीजेपी ने हिंदुत्व की राजनीति के जरिए मतदाताओं का ध्रुवीकरण किया है। विपक्ष मुस्लिम अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रहे अत्याचारों के मुद्दों पर भी अक्सर चुप रहता है। आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों ने एक मजबूत राष्ट्रवादी विमर्श तैयार किया है। इससे मुख्यधारा के असमिया मतदाताओं के एक बड़े वर्ग में बीजेपी की पकड़ मजबूत हुई है। यही कारण है कि एजीपी जैसे क्षेत्रीय दल भी बीजेपी के नेतृत्व वाला गठबंधन नहीं छोड़ते। कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्ष इस मजबूत वोट बैंक में सेंध लगाने के लिए संघर्ष कर रहा है। ध्रुवीकरण की जड़ें अब राज्य की राजनीति में बहुत गहरी हो चुकी हैं।
परिसीमन के बाद बदला हुआ गणित
असम में परिसीमन के बाद अल्पसंख्यक बहुल निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या कम हो गई है। पहले ऐसी सीटें 35 हुआ करती थीं जो अब घटकर केवल 22 रह गई हैं। विपक्षी गठबंधन अब मुख्य रूप से इन्हीं सीटों के भरोसे चुनावी मैदान में उतरा है। लेकिन अगर वे सभी 22 सीटें जीत भी लें, तो भी सरकार बनाना संभव नहीं है। विपक्ष के पास उन 60 प्रतिशत क्षेत्रों में नेटवर्क नहीं है जहां हिंदू मतदाता निर्णायक हैं। वहां संगठन की कमी उनके लिए एक बहुत बड़ी बाधा साबित होने वाली है। हुदा के अनुसार हिमंत बिस्वा सरमा आज भी उसी आक्रामक शैली में काम करते हैं।
विपक्ष के पास नेतृत्व का संकट
हुदा ने गौरव गोगोई के नेतृत्व वाले विपक्षी ढांचे पर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। गौरव गोगोई, अखिल गोगोई और लुरिनज्योति गोगोई का संयोजन एक विशेष समुदाय का प्रतिनिधित्व करता है। लोकतंत्र की बात करने के बावजूद उन्होंने कोई वास्तव में सामूहिक नेतृत्व तैयार नहीं किया है। असम का मतदाता वर्ग मुख्य रूप से निम्न मध्यम वर्ग और छोटे व्यापारियों का है। कांग्रेस ने उनके लिए कोई स्पष्ट आर्थिक विजन या बड़ी कल्याणकारी योजना पेश नहीं की। उनके पास स्वास्थ्य, शिक्षा या आजीविका के लिए कोई ठोस और नया एजेंडा नहीं है। ऐसे में आम जनता उन पर भरोसा क्यों और कैसे करेगी?
पार्टी छोड़ने वाले नेताओं का संदेश
भूपेन बोराह और प्रद्युत बोरदोलोई जैसे नेताओं के पार्टी छोड़ने पर हुदा ने तीखी टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि इन नेताओं को कांग्रेस के भविष्य में अब कोई भरोसा नहीं रह गया था। उनके फैसले यह संकेत देते हैं कि कांग्रेस बिहपुरिया और नागांव जैसे क्षेत्रों में आधार खो रही है। हालांकि, इन सभी चुनौतियों के बावजूद विपक्षी एकता का तर्क चुनावी अंकगणित पर आधारित है। साल 2021 के असम विधानसभा चुनाव के आंकड़े इसका एक बहुत बड़ा सबूत पेश करते हैं। उस समय के वोटों का बिखराव ही बीजेपी की जीत का सबसे बड़ा कारण बना था।
2021 के चुनाव परिणाम: एक सबक
साल 2021 के चुनाव में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने 75 सीटें जीती थीं। उन्हें कुल 44.51 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। दूसरी ओर कांग्रेस के नेतृत्व वाले 'महाजोत' को 43.68 प्रतिशत वोट मिले थे। एजेपी और रायजोर दल ने मिलकर लगभग पांच प्रतिशत वोट हासिल किए थे। अगर वे उस समय साथ होते तो चुनावी नतीजे बिल्कुल अलग हो सकते थे। कम से कम 20 निर्वाचन क्षेत्रों में जीत का अंतर 5,000 वोटों से भी कम रहा था। वहां वोटों का यह बिखराव विपक्षी दलों के लिए बहुत ही निर्णायक और घातक साबित हुआ था। इसी आंकड़े के आधार पर अब विपक्षी एकता की वकालत की जा रही है।
4 मई का इंतजार
विपक्षी गठबंधन के लिए अब सबसे जरूरी काम मतदाताओं को विश्वास दिलाना है। उन्हें यह साबित करना होगा कि वे केवल बीजेपी को हराने के लिए साथ नहीं आए हैं। उन्हें अपनी संगठनात्मक शक्ति और नेतृत्व की विश्वसनीयता कम समय में साबित करनी होगी। क्या गौरव, अखिल और लुरिनज्योति की तिकड़ी राज्य भर के कार्यकर्ताओं में जोश भर पाएगी? असम की 126 सदस्यीय विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 64 सीटों की जरूरत होती है। वर्तमान राजनीतिक हालात में यह मुकाबला बहुत ही दिलचस्प और पेचीदा हो चुका है। अब पूरी दुनिया की नजरें 4 मई को आने वाले नतीजों पर टिकी हुई हैं।
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