असम चुनाव: धुबरी में विपक्ष की दोस्ताना जंग क्या भाजपा को दिलाएगी जीत?
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असम चुनाव: धुबरी में विपक्ष की 'दोस्ताना जंग' क्या भाजपा को दिलाएगी जीत?

असम के धुबरी बेल्ट में कांग्रेस और रायजोर दल के बीच 'दोस्ताना संघर्ष' और AIUDF की वापसी ने चुनावी समीकरणों को एनडीए के पक्ष में मोड़ दिया है।


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Assam Assembly Elections 2026: असम विधानसभा चुनाव के लिए 9 अप्रैल को होने वाले मतदान से पहले राज्य का राजनीतिक पारा सातवें आसमान पर है। विशेष रूप से अल्पसंख्यक बहुल धुबरी बेल्ट में समीकरण बेहद पेचीदा हो गए हैं। कांग्रेस ने भले ही अपने पुराने सहयोगी एआईयूडीएफ (AIUDF) से किनारा कर लिया हो, लेकिन रायजोर दल (RD) के साथ गठबंधन में हुई देरी और कुछ प्रमुख सीटों पर उनके बीच हो रही "फ्रेंडली फाइट" (दोस्ताना संघर्ष) ने विपक्षी खेमे की चिंताएं बढ़ा दी हैं। जमीन पर मौजूद स्थिति यह संकेत दे रही है कि वोटों का यह बिखराव न केवल बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF को पुनर्जीवित कर सकता है, बल्कि सत्ताधारी भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए (NDA) गठबंधन के लिए भी जीत की राह आसान कर सकता है।


धुबरी लोकसभा क्षेत्र के तहत आने वाले विधानसभा क्षेत्रों में जमीनी रिपोर्ट बताती है कि AIUDF अपनी खोई हुई जमीन वापस पा रही है। रोचक बात यह है कि एआईएमआईएम (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी बदरुद्दीन अजमल का समर्थन किया है और हाल ही में एक चुनावी रैली में कांग्रेस पर तीखा हमला बोला है, जिससे मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण की संभावना और बढ़ गई है।

धुबरी का अल्पसंख्यक वोट: क्या कांग्रेस से हो रहा है मोहभंग?
धुबरी जिले में पांच प्रमुख विधानसभा सीटें हैं, जो धुबरी लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा हैं। 2024 के लोकसभा चुनावों में यहाँ के अल्पसंख्यक मतदाताओं ने एकतरफा कांग्रेस का साथ दिया था, जिसके चलते रकीबुल हुसैन ने बदरुद्दीन अजमल को 10 लाख से अधिक वोटों के भारी अंतर से हराया था। लेकिन महज दो साल के भीतर ही हवा का रुख बदलता दिख रहा है।

धुबरी के वरिष्ठ अधिवक्ता और AIUDF नेता नुरुल इस्लाम मुल्ला के अनुसार, कांग्रेस के खिलाफ नाराजगी बढ़ रही है। उन्होंने 'द फेडरल' से बातचीत में कहा, “2024 में लोगों को उम्मीद थी कि केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनेगी, लेकिन ऐसा न होने से भारी निराशा हुई। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अल्पसंख्यकों को प्रभावित करने वाले बेदखली अभियानों (Eviction Drives) पर कांग्रेस पूरी तरह खामोश रही। गौरव गोगोई और रकीबुल हुसैन जैसे बड़े नेताओं ने इस मुद्दे पर आवाज नहीं उठाई, जिससे समुदाय के भीतर गुस्सा है।” मुल्ला का दावा है कि लोग अब अजमल को याद कर रहे हैं क्योंकि वे संसद में उनके हितों के लिए मुखर रहते थे।

बदरुद्दीन अजमल की वापसी और रकीबुल हुसैन का 'खामोश' अभियान
अजमल, जो 2024 की करारी हार के बाद राजनीतिक रूप से हाशिए पर माने जा रहे थे, इस बार एक नए अवतार में नजर आ रहे हैं। उन्होंने अपनी रणनीति बदलते हुए 'धार्मिक पहचान' के साथ-साथ 'क्षेत्रीय विकास' के मुद्दे को जोड़ा है। धुबरी में उनकी पकड़ शिक्षा संस्थानों (अजमल फाउंडेशन के जरिए) और अस्पतालों के नेटवर्क के कारण अब भी मजबूत है। लोग उनके कार्यकाल के दौरान हुए रेलवे विस्तार और रूपसी हवाई अड्डे के पुनरुद्धार को याद कर रहे हैं।

दूसरी ओर, धुबरी के वर्तमान सांसद रकीबुल हुसैन पर 'बाहरी' होने का ठप्पा लग रहा है। हालांकि उन्होंने 2024 में भारी मतों से जीत हासिल की थी, लेकिन विधानसभा चुनावों में स्थानीय मुद्दे हावी हैं। रकीबुल हुसैन और उनके करीबी गौरव गोगोई पर यह आरोप लग रहे हैं कि वे केवल चुनावी मौसम में ही धुबरी का रुख करते हैं। बीडब्ल्यूओ (BWO) जैसे स्थानीय नागरिक समूहों का कहना है कि बाढ़ और कटाव जैसी बुनियादी समस्याओं पर कांग्रेस के सांसदों ने संसद में प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किया।

विधानसभा सीटों का विस्तृत विश्लेषण: कहाँ किसका पलड़ा भारी?
धुबरी बेल्ट की पांचों सीटों पर इस बार मुकाबला त्रिकोणीय और चतुष्कोणीय होता दिख रहा है:

गौरीपुर (Gauripur): यहाँ AIUDF के निजानूर रहमान बढ़त बनाते दिख रहे हैं। इसका मुख्य कारण कांग्रेस और रायजोर दल (RD) के बीच की "फ्रेंडली फाइट" है। दोनों दलों ने यहाँ अपने-अपने उम्मीदवार उतारे हैं, जिससे भाजपा विरोधी वोटों के बंटने का सीधा खतरा पैदा हो गया है। यहाँ अल्पसंख्यक वोटों का विभाजन सीधे तौर पर AIUDF को पुनर्जीवित कर रहा है।

धुबरी (Dhubri): वर्तमान विधायक नजरूल हक (AIUDF) अपनी लगातार तीसरी जीत के लिए मैदान में हैं। उनके खिलाफ कांग्रेस ने बेबी बेगम को उतारा है, जबकि भाजपा की ओर से उत्तम प्रसाद कड़ी चुनौती पेश कर रहे हैं। यहाँ भाजपा का वोट बैंक स्थिर है, जबकि कांग्रेस और AIUDF के बीच की जंग मुकाबले को अनिश्चित बना रही है।

गोलकगंज (Golakganj): यहाँ भाजपा के अश्विनी रॉय सरकार मजबूत स्थिति में नजर आ रहे हैं। त्रिकोणीय मुकाबले में कांग्रेस के कार्तिक चंद्र रे और AIUDF के जमशेर तालुकदार के बीच वोटों का बंटवारा भाजपा के पूर्व विधायक सरकार के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकता है। यहाँ 'हिंदू-मुस्लिम' ध्रुवीकरण भाजपा के पक्ष में काम कर रहा है।

बीरसिंग जरुआ (Birsing Jarua): यहाँ मुख्य मुकाबला कांग्रेस के वाजेद अली चौधरी और भाजपा की माधवी दास के बीच है। विश्लेषकों का मानना है कि यहाँ रकीबुल हुसैन के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) कांग्रेस को नुकसान पहुँचा सकती है। यदि AIUDF यहाँ 10-15 हजार वोट भी काटती है, तो भाजपा की जीत तय मानी जा रही है।

बिलासीपारा (Bilasipara): 2023 में नवगठित इस सीट पर असम गण परिषद (AGP) के जीबेश राय फिलहाल आगे चल रहे हैं। कांग्रेस के अमृत बादशाह कड़ी टक्कर दे रहे हैं, लेकिन एनडीए का मजबूत सांगठनिक ढांचा यहाँ हावी है।

गठबंधन में देरी और समन्वय की कमी: एक आत्मघाती कदम?
कांग्रेस और रायजोर दल (RD) के बीच गठबंधन मार्च के तीसरे सप्ताह में ही अंतिम रूप ले सका। गहन और लंबी बातचीत के कारण जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल की भारी कमी देखी जा रही है। कई जगहों पर कांग्रेस कार्यकर्ता रायजोर दल के उम्मीदवारों को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, और यही स्थिति रायजोर दल के कार्यकर्ताओं की भी है।

कांग्रेस राज्य की 126 सीटों में से 99 पर लड़ रही है, जबकि रायजोर दल केवल 11 सीटों पर सीमित है। गौरीपुर और गोलपाड़ा पूर्व जैसी सीटों पर दोनों दलों का आमने-सामने होना मतदाताओं के बीच भ्रम पैदा कर रहा है। राजनीतिक विश्लेषक इसे "विपक्ष की रणनीतिक आत्महत्या" करार दे रहे हैं।

पूर्वोत्तर की राजनीति और धुबरी का महत्व
पूर्वोत्तर के राजनीतिक विश्लेषक प्रसेनजीत विश्वास के अनुसार, "धुबरी केवल एक जिला नहीं, बल्कि असम की अल्पसंख्यक राजनीति का केंद्र है। यहाँ का वोटिंग पैटर्न पूरे लोअर असम (निचले असम) को प्रभावित करता है। अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में वोटों का मामूली सा भी बंटवारा परिणाम बदल सकता है। बीरसिंग जरुआ और धुबरी जैसी सीटों पर AIUDF द्वारा काटे गए वोट सीधे तौर पर भाजपा या उसके सहयोगियों को जीत की दहलीज तक पहुँचा सकते हैं।"

धुबरी बेल्ट के अन्य समीकरण और ओवैसी फैक्टर
धुबरी के पड़ोसी क्षेत्रों में कांग्रेस कुछ मजबूत दिख रही है, लेकिन यहाँ भी ओवैसी का प्रभाव बढ़ रहा है। ओवैसी ने अपनी रैलियों में 'सेकुलर' पार्टियों को आड़े हाथों लिया है, जिससे युवा मुस्लिम मतदाता प्रभावित हो रहे हैं। मानकचर (Mankachar) में पार्टी ने मोहिबुर रहमान को उतारा है, जहाँ उनका मुकाबला AIUDF के अब्दुल सलाम शाह और AGP के जाबेद इस्लाम से है। जलेश्वर (Jaleswar) सीट को कांग्रेस अपना गढ़ मानती है, जहाँ वर्तमान विधायक आफताब उद्दीन मुल्ला फिर से मैदान में हैं। वहीं, गोलपाड़ा पूर्व में कांग्रेस के अबुल कलाम रशीद आलम का मुकाबला रायजोर दल के उम्मीदवार से है।

धुबरी की जंग और असम का भविष्य
मतदान के लिए एक सप्ताह से भी कम समय बचा है और धुबरी की लड़ाई अब केवल विकास के मुद्दों तक सीमित नहीं रह गई है। यह पहचान, धार्मिक ध्रुवीकरण और विपक्षी एकता की परीक्षा बन चुकी है। क्या अल्पसंख्यक मतदाता एक बार फिर कांग्रेस पर भरोसा करेंगे, या वोटों का बिखराव भाजपा के 'मिशन 100+' के सपने को पूरा करेगा? 4 मई को आने वाले नतीजे ही असम की इस जटिल राजनीतिक पहेली को सुलझा पाएंगे।


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