
असम में चुनाव ड्यूटी के लिए वनकर्मियोंं की तैनाती पर विवाद, वन्यजीव सुरक्षा को लेकर चिंता
पर्यावरणविदों और पूर्व नौकरशाहों ने राज्य सरकार के उस आदेश की कड़ी आलोचना की है, जिसमें 1,600 असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन फोर्स (AFPF) कर्मियों को चुनाव ड्यूटी में तैनात करने को कहा गया है। उनका कहना है कि इससे लुप्तप्राय वन्यजीव असुरक्षित हो जाएंगे।
असम में 9 अप्रैल को होने वाले चुनाव से पहले राज्य सरकार द्वारा वन सुरक्षा बल को चुनाव ड्यूटी में लगाने के फैसले पर विवाद खड़ा हो गया है। विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों और पूर्व नौकरशाहों ने इस कदम पर गंभीर चिंता जताई है।
वन्यजीवों की सुरक्षा पर उठे सवाल
चुनाव ड्यूटी के लिए लगभग 1,600 असम फॉरेस्ट प्रोटेक्शन फोर्स (AFPF) कर्मियों को तैनात करने के फैसले के बाद यह सवाल उठ रहा है कि जंगलों और वन्यजीवों की सुरक्षा कौन करेगा। AFPF का मुख्य काम जंगलों, वन उत्पादों और वन्यजीवों की सुरक्षा करना है।
हिमंता बिस्वा सरमा की सरकार ने 19 मार्च को आदेश जारी किया था। यह आदेश राज्य के विशेष मुख्य सचिव (पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन) महेंद्र कुमार यादव द्वारा जारी किया गया।
इसमें निर्देश दिया गया कि AFPF के 1,600 जवानों को 9 अप्रैल को होने वाले चुनाव के लिए राज्य पुलिस की मदद में लगाया जाए।
कमांडेंट्स को निर्देश दिया गया है कि वे 3 अप्रैल तक सभी कर्मियों की तैनाती सुनिश्चित करें।
गैंडे और अन्य वन्यजीवों पर खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में वन कर्मियों को हटाने से शिकार-रोधी गतिविधियां (एंटी-पोचिंग ऑपरेशन) कमजोर हो सकती हैं, खासकर असम के संवेदनशील गैंडा क्षेत्रों में।
इससे अन्य लुप्तप्राय प्रजातियों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है।
हालांकि मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कुछ महीने पहले दावा किया था कि 2025 में राज्य में एक भी गैंडे का शिकार नहीं हुआ, लेकिन इस फैसले से कई लोग असहमत हैं।
AFPF की भूमिका क्यों अहम?
AFPF असम में वन सुरक्षा का मुख्य आधार है। इसके प्रमुख कार्य हैं:
* अवैध शिकार रोकना
* अवैध कटाई पर निगरानी
* अतिक्रमण पर नियंत्रण
यह काम ज्यादातर दूरदराज और संवेदनशील इलाकों में होता है, जहां लगातार निगरानी जरूरी होती है।
पूर्व अधिकारियों और विशेषज्ञों का विरोध
करीब 40 सेवानिवृत्त अधिकारियों के समूह कॉन्स्टीट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप (CCG) ने असम के मुख्य सचिव Ravi Kota को पत्र लिखकर इस आदेश को वापस लेने की मांग की है।
इस समूह में पूर्व IAS, IPS और IFS अधिकारी शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि यह फैसला स्थापित नियमों के खिलाफ है और चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार ऐसे विशेष बलों को चुनाव ड्यूटी में लगाने से बचना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है “वन सुरक्षा को रोका नहीं जा सकता। इतनी बड़ी संख्या में प्रशिक्षित कर्मियों को हटाने से जमीनी स्तर पर सुरक्षा कमजोर हो जाएगी।”
विशेषज्ञों ने 2024 में आए Supreme Court direction 2024 forest personnel deployment का भी हवाला दिया, जिसमें वन कर्मियों के विशेष कार्य को मान्यता देते हुए उन्हें चुनाव ड्यूटी से अलग रखने की बात कही गई थी। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे कोई भी विचलन कानूनी जांच का कारण बन सकता है।
जमीनी स्तर पर चिंता और भी व्यावहारिक है। सरकार ने भले ही संकेत दिया हो कि चुनाव के दौरान वरिष्ठ अधिकारी वन क्षेत्रों की निगरानी करेंगे, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि निगरानी, फील्ड में मौजूदगी की जगह नहीं ले सकती।
‘ऑफिस से जंगल की सुरक्षा नहीं हो सकती’
एक पूर्व वन अधिकारी ने कहा, “जंगल की सुरक्षा ऑफिस में बैठकर नहीं की जा सकती। जैसे ही जमीन पर तैनाती कम होती है, सुरक्षा में खामियां आ जाती हैं।”
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि यह समय विशेष रूप से संवेदनशील है। असम के जंगलों में एक-सींग वाले गैंडे के अलावा Hoolock Gibbon, Golden Langur और Pygmy Hog जैसे दुर्लभ जीव पाए जाते हैं। इनकी सुरक्षा के लिए 24 घंटे निगरानी जरूरी होती है।
काजीरंगा जैसे इलाकों पर बढ़ा खतरा
राज्य के संरक्षित क्षेत्रों, जैसे काजीरंगा नेशनल पार्क में लगातार गश्त बेहद जरूरी होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर थोड़े समय के लिए भी स्टाफ कम हुआ, तो खतरा बढ़ सकता है।
सेवानिवृत्त आईएफएस अधिकारी और पर्यावरणविद प्रकृति श्रीवास्तव ने छह अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ मुख्य सचिव को पत्र लिखकर आदेश वापस लेने की मांग की है। इसमें मीना गुप्ता, ए के झा, उमा शंकर सिंह, प्रेरणा सिंह बिंद्रा और देबादित्य सिन्हा जैसे नाम शामिल हैं।
प्रकृति श्रीवास्तव ने इसे चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का स्पष्ट उल्लंघन बताया।
उन्होंने कहा: “यह सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं है, इसका सीधा असर जमीनी सुरक्षा पर पड़ता है। जैसे ही फील्ड स्टाफ कम होता है, जोखिम तुरंत बढ़ जाता है।”
उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यह फैसला एक गलत उदाहरण पेश करता है और कानूनी सुरक्षा उपायों के पालन पर सवाल खड़े करता है।

