
जितनी दिख रही है उससे कठिन होगी असम में BJP की राह, ग्राउंड रिपोर्ट
विभिन्न क्षेत्रों में पार्टी कार्यकर्ताओं और मतदाताओं से हुई बातचीत साफ करती है कि यह चुनाव बड़ी एंटी-इनकंबेंसी की लहर का नहीं, बिखरे और परतदार असंतोष का है...
जैसे-जैसे असम एक और अहम विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ रहा है, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को सीधी नाराज़गी की लहर का सामना नहीं करना पड़ रहा है। लेकिन सतह के नीचे असहजता के पर्याप्त संकेत हैं, जो इस मुकाबले को जितना दिख रहा है उससे कहीं अधिक कड़ा बना सकते हैं।
विभिन्न क्षेत्रों में पार्टी कार्यकर्ताओं, विश्लेषकों और मतदाताओं से हुई बातचीत एक बात साफ करती है कि यह चुनाव किसी बड़े एंटी-इनकंबेंसी की लहर का नहीं बल्कि बिखरे और परतदार असंतोष का है, जो मिलकर असर डाल सकता है।
ऊपरी असम की 47 सीटें दिसपुर की सत्ता के लिए बेहद अहम बनी हुई हैं। साल 2021 में बीजेपी ने यहां लगभग 27 सीटें जीती थीं, चाय बागानों के समर्थन और स्वदेशी असमिया वोटों के ध्रुवीकरण के सहारे। ये क्षेत्र कभी असम गण परिषद का गढ़ थे। लेकिन धीरे-धीरे बीजेपी ने उसे पीछे छोड़ दिया।
इस बार झारखंड मुक्ति मोर्चा और जय भारत पार्टी ने मिलकर ऊपरी असम की 26 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया है। ये सीटें मुख्य रूप से चाय जनजाति और आदिवासी समुदायों वाले क्षेत्रों में हैं, जहां बीजेपी पर एसटी दर्जा न देने का आरोप लगाया जा रहा है। इससे वोटों के और बंटने की आशंका बढ़ी है।
जुबीन मामला बना भावनात्मक मुद्दा
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने ओरुनोदोई जैसी योजनाओं के जरिए महिला मतदाताओं के एक वर्ग को अपने साथ बनाए रखा है। लेकिन युवा मतदाताओं, खासकर पहली बार वोट देने वालों में नाराज़गी साफ दिखाई दे रही है।
सितंबर 2025 में गायक जुबीन गर्ग की मौत से जुड़े सवाल अभी भी अनसुलझे हैं। नलबाड़ी और सरभोग जैसे इलाकों में विरोध प्रदर्शन और सोशल मीडिया अभियान इस मुद्दे को जिंदा रखे हुए हैं। कई युवा मतदाता कहते हैं कि वे “बैलेट के जरिए जवाब देंगे।”
गोलाघाट के सामाजिक कार्यकर्ता अपूर्ब बल्लव गोस्वामी के अनुसार, इस मामले में चार्जशीट में खामियों और फास्ट-ट्रैक कोर्ट की अनुपस्थिति को लेकर असंतोष है, जो वोटों में दिख सकता है।
पार्टी के भीतर मतभेद उजागर
बीजेपी के अंदरूनी मतभेद भी अब खुलकर सामने आ रहे हैं। निलंबित उपाध्यक्ष जयंत कुमार दास ने आरोप लगाया कि पार्टी मुख्यालय के एक कमरे से “फर्जी आईटी सेल” चलाया जा रहा था, जिसमें हजारों नकली सोशल मीडिया अकाउंट्स का इस्तेमाल हो रहा था।
हालांकि पार्टी ने इन आरोपों को खारिज कर दिया। लेकिन इससे अविश्वास का माहौल बना है, खासकर अनिर्णीत मतदाताओं के बीच।
टिकट वितरण को लेकर भी असंतोष दिखा है। कांग्रेस से आए नेताओं को प्राथमिकता दिए जाने से पुराने कार्यकर्ताओं में नाराज़गी है। “कॉन्गबी”—यानी बीजेपी के भीतर कांग्रेस जैसा शब्द राजनीतिक गलियारों में चलन में है।
पूर्व केंद्रीय मंत्री राजेन गोहाइन और पूर्व विधायक अशोक सरमा जैसे वरिष्ठ नेताओं का अलग होना भी पुराने गुट की असंतुष्टि को दर्शाता है।
टिकट विवाद और विरोध
कुछ क्षेत्रों में पार्टी के भीतर विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिले हैं। अभयापुरी से टिकट न मिलने पर नेता संजय राय सार्वजनिक रूप से भावुक हो गए और निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने की घोषणा की।
बराक घाटी में बीजेपी अभी भी मजबूत दिखाई देती है, लेकिन सिलचर से पूर्व सांसद राजदीप रॉय को उम्मीदवार बनाए जाने पर स्थानीय स्तर पर असहमति है।
छोटे दलों की बढ़ती भूमिका
इस बीच यूनाइटेड पीपुल्स पार्टी लिबरल और झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसे छोटे दल भी इस चुनाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं। यूपीपीएल से बोडो वोट बैंक पर असर पड़ने की संभावना है, जबकि जेएमएम चाय बागान और आदिवासी इलाकों में चुनौती पेश कर सकता है।
मुकाबला होगा कड़ा
इन सभी कारकों के बावजूद, असम में कोई स्पष्ट एंटी-इनकंबेंसी लहर नहीं है। बल्कि युवा असंतोष, आंतरिक विद्रोह, क्षेत्रीय असंतुलन और भावनात्मक मुद्दों का मिश्रण दिखाई देता है।
2021 में बीजेपी गठबंधन बहुत कम अंतर से आगे था। ऐसे में 1–2 प्रतिशत वोट का झुकाव भी कई सीटों का परिणाम बदल सकता है।
बीजेपी-नेतृत्व वाला एनडीए अभी भी संगठनात्मक बढ़त बनाए हुए है और सत्ता में वापसी कर सकता है। लेकिन यह चुनाव आसान नहीं होगा।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने 29 मार्च को अपना घोषणापत्र जारी कर एनडीए की योजनाओं को सीधी चुनौती दी है। साथ ही, 100 दिनों के भीतर जुबीन गर्ग मामले में न्याय दिलाने का वादा युवाओं के वोट को प्रभावित कर सकता है।
कुल मिलाकर, असम में मुकाबला कांटे का होने जा रहा है, जहां बड़े मुद्दों से ज्यादा स्थानीय कारक तय करेंगे कि आखिरकार दिसपुर की सत्ता किसके हाथ में जाएगी।

