असम चुनाव: रिकॉर्ड मतदान और पवन खेड़ा विवाद से 25 सीटों पर मुकाबला बेहद कांटे का
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गुवाहाटी में असम विधानसभा चुनाव के दौरान एक मतदान केंद्र पर वोट डालने से पहले कतार में खड़े लोग। फोटो: PTI

असम चुनाव: रिकॉर्ड मतदान और पवन खेड़ा विवाद से 25 सीटों पर मुकाबला बेहद कांटे का

सत्तारूढ़ पार्टी उच्च मतदान को अपने शासन के समर्थन के रूप में देख रही है, जबकि विपक्ष इसे बढ़ते असंतोष और बदलाव की मांग का संकेत मान रहा है।


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कांग्रेस नेता पवन खेड़ा से जुड़े एक देर से उभरे राजनीतिक विवाद और रिकॉर्ड मतदान ने असम की कम से कम 25 विधानसभा सीटों पर चुनावी नतीजों को अनिश्चित बना दिया है। इससे पहले जहां मुकाबला काफी हद तक एकतरफा माना जा रहा था, वहीं अब कई क्षेत्रों में यह कड़ा और कांटे का संघर्ष बन गया है।

4 मई को मतगणना होनी है, ऐसे में भाजपा और कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष दोनों इन घटनाक्रमों की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं। जहां सत्तारूढ़ दल उच्च मतदान को अपने शासन पर जनता के भरोसे के रूप में देख रहा है, वहीं विपक्ष का मानना है कि यह बढ़ते असंतोष और बदलाव की इच्छा को दर्शाता है।

85 प्रतिशत से अधिक मतदान

असम में गुरुवार (9 अप्रैल) को एक चरण में हुए विधानसभा चुनाव में 85.38 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया — जो 1951 के बाद राज्य के चुनावी इतिहास का सबसे अधिक मतदान है।

यह आंकड़ा पिछले वर्षों की तुलना में लगातार बढ़ोतरी दिखाता है — 2011 में 76.04 प्रतिशत, 2016 में 84.72 प्रतिशत और 2021 में 82.42 प्रतिशत मतदान हुआ था।

बारिश और कई जिलों में बादल छाए रहने के बावजूद, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मतदाता मतदान के लिए बाहर निकले। महिलाओं की भागीदारी विशेष रूप से उल्लेखनीय रही, कई सीटों पर महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से अधिक रहा।

असम में मतदान के साथ ही केरल और पुडुचेरी में भी चुनाव हुए। जहां पुडुचेरी में लगभग 89 प्रतिशत मतदान दर्ज हुआ, वहीं केरल में करीब 78 प्रतिशत मतदान हुआ, जिससे मतदाता भागीदारी के मामले में असम मजबूत स्थिति में रहा।

सीटवार आंकड़ों में दिलचस्प तस्वीर

विधानसभा सीटों के आंकड़ों पर नजर डालें तो कई अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में बेहद उच्च मतदान दर्ज हुआ, जिससे चुनावी गणित और जटिल हो गया है।

डालगांव में सबसे अधिक 94.57 प्रतिशत मतदान हुआ, इसके बाद श्रीजंग्राम (94.33%), जलेश्वर (94.31%), चेंगा (93.83%), मंदिया (92.45%), पक्काबेतबाड़ी (93.24%), समागुरी (91.31%), ईस्ट गोलपाड़ा (92.79%), परबतझोरा (90.49%), दरंग (90.34%), रुपाहीहाट (92.74%) और अभयापुरी (90.28%) में भी उच्च मतदान दर्ज किया गया।

जिला स्तर पर बरपेटा में 91 प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ, जबकि बोंगाईगांव में 91.77 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया। बाजाली में 86.89 प्रतिशत मतदान हुआ।

दक्षिण सालमारा-मनकाचर जिले में सुबह से ही उच्च मतदान का रुझान बना रहा, जो ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत मतदाता जुटान की ओर इशारा करता है।

राजनीतिक दलों ने क्या कहा

भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने उच्च मतदान को अपने पक्ष में सकारात्मक संकेत के रूप में पेश किया है। असम भाजपा अध्यक्ष दिलीप सैकिया ने कहा कि पार्टी को कम से कम 25 सीटों पर बढ़त मिलने की उम्मीद है।

उन्होंने कहा, “जनता के एक बड़े वर्ग ने विपक्ष के नैरेटिव को खारिज कर दिया है। यह मतदान हमें अपनी स्थिति मजबूत करने में मदद करेगा।”

हालांकि, कांग्रेस और उसके सहयोगी दल खासकर अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों के मतदान पैटर्न को लेकर अलग निष्कर्ष निकाल रहे हैं। कांग्रेस नेता भास्करन गोहाइन ने कहा कि ऐसे क्षेत्रों में उच्च मतदान भाजपा के पक्ष में नहीं जाएगा।

उन्होंने कहा, “अल्पसंख्यक बहुल सीटों पर ज्यादा मतदान भाजपा के लिए फायदेमंद नहीं होगा। इसका लाभ स्वाभाविक रूप से कांग्रेस को मिलेगा।”

विपक्ष के सहयोगी क्षेत्रीय दलों के नेताओं ने भी मतदान में बढ़ोतरी के पीछे कुछ संरचनात्मक कारण बताए। असम जातीय परिषद (AJP) की अनन्या सैकिया ने कहा कि यह असामान्य रूप से अधिक मतदान आंशिक रूप से चुनाव आयोग द्वारा हाल ही में किए गए मतदाता सूची संशोधन का परिणाम है, जिसमें डुप्लिकेट और मृत मतदाताओं के नाम हटाए गए।

उनके अनुसार, युवा मतदाताओं और महिलाओं की भागीदारी ने भी अहम भूमिका निभाई है।

उन्होंने कहा, “पहली बार वोट डालने वाले और युवाओं की भागीदारी में स्पष्ट बढ़ोतरी दिख रही है। इनमें से कई लोग रोजगार, बाढ़ और रोजमर्रा के प्रशासनिक मुद्दों को लेकर मतदान कर रहे हैं। अब यह केवल पारंपरिक राजनीतिक निष्ठाओं तक सीमित नहीं रह गया है।”

मुख्यमंत्री की पत्नी पर खेड़ा के आरोप

चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में कांग्रेस नेता पवन खेड़ा द्वारा मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भुइयां सरमा पर लगाए गए आरोपों के बाद राजनीतिक माहौल अचानक बदल गया।

इन आरोपों में विदेशी संपत्ति, कई पासपोर्ट और अघोषित व्यावसायिक हित शामिल हैं।

मुख्यमंत्री और उनके परिवार ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इन्हें मनगढ़ंत और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है। रिनिकी ने गुवाहाटी में एफआईआर दर्ज कराई है और मामला अब कानूनी प्रक्रिया में चला गया है।

वहीं, पवन खेड़ा ने अग्रिम जमानत के लिए गुवाहाटी हाई कोर्ट का रुख किया है।

स्थिति उस समय और तनावपूर्ण हो गई जब असम पुलिस, दिल्ली पुलिस के साथ, राष्ट्रीय राजधानी में पवन खेड़ा के आवास पर पहुंची। उस समय वह घर पर मौजूद नहीं थे। इस घटनाक्रम के बाद नया राजनीतिक टकराव शुरू हो गया, जिसमें कांग्रेस ने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह चुनाव के दौरान विपक्षी नेताओं को डराने के लिए राज्य तंत्र का इस्तेमाल कर रही है।

वहीं, भाजपा का कहना है कि ये आरोप फर्जी दस्तावेजों पर आधारित हैं और उसी के अनुसार कानूनी कार्रवाई की जा रही है। साथ ही, पार्टी ने इस विवाद के राजनीतिक प्रभाव को कम करके दिखाने की कोशिश की है।

खेड़ा विवाद के निपटारे पर कानूनी सवाल

इन दावों के बावजूद, यह मुद्दा तेजी से फैल गया, खासकर सोशल मीडिया पर, जहां मतदान से पहले आरोपों का व्यापक प्रसार हुआ। विपक्षी नेताओं का कहना है कि इस विवाद ने अहम समय पर भाजपा के चुनावी नैरेटिव को प्रभावित किया।

भास्करन गोहाइन ने कहा,“इसका असर जरूर पड़ा है। लोग जानते हैं कि क्या हुआ है और वे अपने वोट के जरिए प्रतिक्रिया देंगे।”

कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इसका असर ऊपरी असम के कुछ हिस्सों में दिखाई दे सकता है, जिन्हें पारंपरिक रूप से भाजपा का गढ़ माना जाता रहा है। वरिष्ठ पत्रकार निरंजन महंत ने कहा कि जहां मुख्यधारा मीडिया ने मुख्यमंत्री की प्रतिक्रिया पर ज्यादा ध्यान दिया, वहीं आरोप डिजिटल प्लेटफॉर्म और स्थानीय चर्चाओं के जरिए व्यापक रूप से फैल गए।

कानूनी विशेषज्ञों ने भी इस मामले को संभालने के तरीके पर सवाल उठाए हैं, खासकर आदर्श आचार संहिता के संदर्भ में। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के आरोपों की जांच राज्य पुलिस के बजाय किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जानी चाहिए।

हालांकि, भाजपा का रुख स्पष्ट है कि यह विवाद बहुत देर से सामने आया और इसका मतदाताओं के व्यवहार पर बड़ा असर नहीं पड़ेगा। पार्टी प्रवक्ता अमल नारायण पटोवरी ने इसे विपक्ष की आखिरी समय की चाल बताया।

उन्होंने कहा,“यह मुद्दा मतदान से कुछ दिन पहले ही उठा। इसे सत्यापित करने या जनमत को प्रभावित करने का पर्याप्त समय नहीं था। लोगों ने पहले ही विकास, कल्याण योजनाओं और दीर्घकालिक मुद्दों के आधार पर अपना मन बना लिया है।”

नतीजे का अनुमान मुश्किल

राजनीतिक बयानबाजी से इतर, रिकॉर्ड मतदान खुद एक बड़ा चर्चा का विषय बन गया है। कई विश्लेषकों का मानना है कि यह एक सक्रिय मतदाता वर्ग को दर्शाता है, न कि किसी एकतरफा लहर को।

सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी हरेकृष्ण डेका ने सतर्कता बरतने की सलाह देते हुए कहा कि ज्यादा मतदान हमेशा सरकार बदलने का संकेत नहीं होता।

उन्होंने कहा,“नतीजों का इंतजार करना होगा। ज्यादा मतदान का रुझान किसी भी दिशा में जा सकता है।”

उन्होंने मतदान और मतगणना के बीच की अवधि में सतर्क रहने की जरूरत पर भी जोर दिया और कहा कि ईवीएम की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए जन जागरूकता जरूरी है, जब तक वे स्ट्रॉन्ग रूम में रखी रहती हैं।

फिलहाल, असम में चुनावी मुकाबला कई सीटों पर बेहद संतुलित नजर आ रहा है। रिकॉर्ड मतदान और अंतिम समय के राजनीतिक विवाद के चलते खासकर उन 25 सीटों पर नतीजों का अनुमान लगाना मुश्किल हो गया है, जहां जीत-हार का अंतर बहुत कम रहने की उम्मीद है।

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