बंगाल चुनाव में ‘बाबरी’ फैक्टर हावी, वोट बैंक और सियासत दोनों पर असर
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बंगाल चुनाव में ‘बाबरी’ फैक्टर हावी, वोट बैंक और सियासत दोनों पर असर

मुर्शिदाबाद में बाबरी शैली की मस्जिद का मुद्दा चुनावी केंद्र बन गया है। इसकी वजह से टीएमसी के वोट बैंक में सेंध और हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की संभावना बढ़ गई है।


पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले की तीन सटे हुए विधानसभा सीटें—भरतपुर, रेजीनगर और बेलडांगा—2026 के चुनावी मुकाबले का सबसे संवेदनशील और उग्र केंद्र बन गई हैं। इसकी वजह रेजीनगर में प्रस्तावित बाबरी मस्जिद जैसी संरचना वाली मस्जिद है, जिसने राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं, धार्मिक पहचान को और मजबूत किया है और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक में दरार डालने का खतरा पैदा कर दिया है।

ये तीनों सीटें उस इलाके के आसपास स्थित हैं, जहाँ निलंबित टीएमसी विधायक हुमायूं कबीर, जो अब आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) के संस्थापक हैं, ने पिछले साल 6 दिसंबर को अयोध्या में ढहाई गई संरचना की तर्ज पर मस्जिद की नींव रखी थी।

चुनाव का केंद्र बना मुद्दा

टीएमसी से निष्कासन के बाद कबीर का यह कदम शुरुआत में एक स्थानीय विरोध के रूप में देखा गया था, लेकिन कुछ ही महीनों में यह मुद्दा पूरे इलाके की राजनीति का भावनात्मक केंद्र बन गया है। अब हर चुनावी चर्चा इसी सवाल के इर्द-गिर्द घूम रही है—क्या “बाबरी” का मुद्दा मुस्लिम वोटों को कबीर के पक्ष में एकजुट करेगा या इससे हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण होगा?

मार्च में यहां पहली बार ईद की नमाज अदा की गई, जिसमें मुर्शिदाबाद, नदिया और उत्तर 24 परगना से बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। रोजाना निर्माण सामग्री से भरे ट्रक पहुंच रहे हैं, दान पेटियां भर रही हैं और सोशल मीडिया पर समर्थकों के वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिससे यह मस्जिद एक बड़े राजनीतिक प्रतीक में बदल गई है।

बीजेपी का आरोप: तुष्टिकरण की राजनीति

बीजेपी इस मुद्दे को अपने पक्ष में देख रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि “बाबरी” के नाम पर हो रहा निर्माण हिंदू वोटों को एकजुट कर रहा है और यह तुष्टिकरण की राजनीति का उदाहरण है। उनका दावा है कि इससे आसपास के हिंदू बहुल इलाकों में नाराजगी बढ़ रही है।

टीएमसी की चिंता

दूसरी ओर, टीएमसी को डर है कि कबीर, खासकर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी के साथ गठबंधन के बाद, मुस्लिम वोटों में सेंध लगा सकते हैं। पार्टी नेताओं का कहना है कि लोग जानते हैं कि मुश्किल समय में उनके साथ कौन खड़ा रहा है और विकास ही चुनाव का मुद्दा बनेगा, न कि उकसावे वाली राजनीति।

मुर्शिदाबाद, जहाँ लगभग 70 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है, टीएमसी के लिए हमेशा मजबूत आधार रहा है। 2021 में पार्टी ने राज्य की 85 मुस्लिम बहुल सीटों में से 75 पर जीत हासिल की थी। लेकिन अब AJUP-AIMIM गठबंधन इस मुद्दे को मुस्लिम राजनीतिक पहचान के प्रतीक के रूप में पेश कर रहा है, खासकर उन युवाओं के बीच जो टीएमसी और कांग्रेस दोनों से असंतुष्ट हैं।

रेजीनगर बना प्रयोग का केंद्र

रेजीनगर इस पूरे राजनीतिक प्रयोग का केंद्र बन गया है। लगभग 65 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाली इस ग्रामीण सीट से इस बार कबीर चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने 2011 में कांग्रेस के टिकट पर जीत हासिल की थी, 2013 के उपचुनाव में हार गए और 2021 में टीएमसी के उम्मीदवार ने यह सीट 68 हजार से ज्यादा वोटों से जीती थी।अब कबीर इस सीट को अपनी नई पार्टी का लॉन्चपैड बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि यह सिर्फ मस्जिद का मुद्दा नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और राजनीतिक पहचान का सवाल है।

टीएमसी के वोट बैंक में दरार का खतरा

अगर मुस्लिम वोटों का थोड़ा भी हिस्सा टीएमसी से हटकर AJUP की ओर जाता है, तो आसपास की सीटों पर चुनावी गणित बदल सकता है। भरतपुर में, जहाँ कबीर 2021 में टीएमसी के टिकट पर 43 हजार से ज्यादा वोटों से जीते थे, उनकी पकड़ अब भी बनी हुई है।अगर ये वोट रेजीनगर की ओर खिसकते हैं, तो टीएमसी के पारंपरिक आधार में दरार पड़ सकती है, जिससे कांग्रेस को मुस्लिम इलाकों में और बीजेपी को हिंदू बहुल क्षेत्रों में फायदा मिल सकता है।

बेलडांगा की भूमिका निर्णायक

भरतपुर और रेजीनगर के बीच स्थित बेलडांगा इस बात का फैसला कर सकता है कि बाबरी मस्जिद का मुद्दा प्रतीकात्मक रहेगा या चुनावी परिणामों को प्रभावित करेगा। यह क्षेत्र पहले भी सांप्रदायिक तनाव का गवाह रहा है और मस्जिद परियोजना के बाद यहाँ विरोध और पुलिस तैनाती बढ़ गई है।यह सीट पहले कांग्रेस के पास थी, लेकिन 2021 में टीएमसी ने जीत हासिल की। हाल के लोकसभा चुनाव में टीएमसी और कांग्रेस के बीच अंतर काफी कम हो गया था, जिससे अब त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति बन रही है।

प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिकता का केंद्र

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह इलाका “प्रतिस्पर्धी सांप्रदायिकता” का प्रयोगशाला बन गया है। एक ओर कबीर मुस्लिम पहचान को राजनीतिक ताकत में बदलने की कोशिश कर रहे हैं, तो दूसरी ओर बीजेपी इसे हिंदू एकजुटता के रूप में पेश कर रही है।इन तीनों सीटों पर अब विकास, सड़क और रोजगार जैसे मुद्दे पीछे छूट गए हैं और बाबरी मस्जिद का साया चुनावी माहौल पर हावी हो गया है।

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