क्या ओवैसी और हुमायूं कबीर का गठबंधन पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक वोटों में करेगा बंटवारा?
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अगर यह नया गठबंधन करीबी मुकाबलों में अल्पसंख्यक वोटों का थोड़ा सा भी हिस्सा अपने पक्ष में खींच लेता है, तो नतीजों पर बड़ा असर पड़ सकता है

क्या ओवैसी और हुमायूं कबीर का गठबंधन पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक वोटों में करेगा बंटवारा?

पश्चिम बंगाल एक कड़े चुनावी मुकाबले की ओर बढ़ रहा है, जहां किसी भी पार्टी के पक्ष में साफ लहर नजर नहीं आ रही। AIMIM-AJUP गठबंधन प्रमुख जिलों में अल्पसंख्यक वोटरों को साधने की कोशिश कर रहा है, जिससे करीबी मुकाबलों में वोट बंट सकते हैं।


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पश्चिम बंगाल इस बार ऐसे विधानसभा चुनाव में जा रहा है, जहां किसी भी पार्टी के पक्ष में स्पष्ट माहौल नहीं है। इसी अनिश्चितता के बीच असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM और हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) का नया गठबंधन सामने आया है। यह गठबंधन बड़ी जीत से ज्यादा, सही (या गलत) जगहों पर वोटों के बंटवारे के जरिए राज्य की चुनावी तस्वीर बदल सकता है।

काफी समय बाद ऐसा हो रहा है कि चुनावी बंगाल में सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) के पक्ष या विपक्ष में कोई मजबूत लहर नहीं दिख रही। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि AIMIM-AJUP का यह गठबंधन दो अलग-अलग मुस्लिम वोटर समूहों को जोड़ने की कोशिश है—उर्दू भाषी मुसलमान, जहां AIMIM की पकड़ बढ़ रही है, और बंगाली भाषी मुसलमान, जहां कबीर की पार्टी का सीमित प्रभाव है, खासकर मुर्शिदाबाद जिले के कुछ इलाकों में।

दक्षिण बंगाल में Indian Secular Front (ISF) भी प्रभाव डाल सकती है, जिससे चुनावी समीकरण और जटिल हो सकते हैं।

करीबी मुकाबलों में असर

आंकड़े एक दिलचस्प तस्वीर पेश करते हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में 35 सीटें 5,000 से कम वोटों के अंतर से तय हुई थीं, जबकि लगभग 70 सीटें 15,000 से कम अंतर से जीती गई थीं। इनमें से ज्यादातर सीटें ऐसी थीं जहां अल्पसंख्यक वोटर 9 से 31 प्रतिशत के बीच थे।

अगर यह नया गठबंधन इन करीबी मुकाबलों में अल्पसंख्यक वोटों का थोड़ा सा भी हिस्सा अपने पक्ष में खींच लेता है, तो नतीजों पर बड़ा असर पड़ सकता है—खासतौर पर उन सीटों पर जहां जीत-हार का अंतर बेहद कम होता है।

उदाहरण के तौर पर, 2021 में भाजपा ने ऐसी 35 करीबी सीटों में से 22 सीटें जीती थीं, जिनमें दिनहाटा (उत्तर बंगाल) और कुल्टी (दक्षिण बंगाल) जैसी सीटें शामिल हैं, जहां बेहद कम अंतर से जीत मिली थी, जबकि अल्पसंख्यक वोटरों का झुकाव बड़े पैमाने पर TMC की ओर था।

वहीं दूसरी तरफ, TMC की सबसे बड़ी जीतें—90,000 से ज्यादा वोटों के अंतर से—उन सीटों पर आई थीं जहां अल्पसंख्यक आबादी 22 से लेकर लगभग 80 प्रतिशत तक थी। विश्लेषकों का मानना है कि इन मजबूत गढ़ों में थोड़ा बहुत वोट शिफ्ट होने से पार्टी को ज्यादा नुकसान नहीं होगा।

मुस्लिम समुदाय की नाराजगी

यह गठबंधन एक वास्तविक और दर्ज नाराजगी पर भी आधारित है। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम समुदाय राज्य की आबादी का करीब 30 प्रतिशत है, लेकिन 2016 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सरकारी नौकरियों में उनकी हिस्सेदारी सिर्फ 6 प्रतिशत से थोड़ी ज्यादा है।

असदुद्दीन ओवैसी ने गठबंधन की घोषणा करते हुए इस अंतर को उजागर किया और कहा कि 30 प्रतिशत आबादी के बावजूद केवल 7 प्रतिशत मुसलमान ही सरकारी नौकरियों में हैं।

इसके अलावा संशोधित OBC सूची को लेकर भी नाराजगी है। इसमें कई मुस्लिम उप-समुदायों को उच्च आरक्षण वाली OBC-A श्रेणी (10 प्रतिशत आरक्षण) से हटाकर OBC-B (7 प्रतिशत आरक्षण) में डाल दिया गया है, जबकि 37 मुस्लिम समूहों को सूची से पूरी तरह हटा दिया गया।

इन बदलावों के खिलाफ कई अल्पसंख्यक इलाकों में विरोध प्रदर्शन हुए। हुमायूं कबीर ने नई OBC नीति को पूरी तरह निराशाजनक बताते हुए कहा कि मुस्लिम समुदाय इसके लिए TMC को माफ नहीं करेगा।

रक्षात्मक वोटिंग

हालांकि विश्लेषक इस नाराजगी को लेकर अधिक निष्कर्ष निकालने से सावधान करते हैं। जिन सीटों पर भाजपा मुख्य चुनौती देने वाली पार्टी है, वहां मुस्लिम मतदाता संभवतः एकजुट होकर TMC का समर्थन करते रहेंगे, ताकि भाजपा को सत्ता से दूर रखा जा सके। यह “रक्षात्मक वोटिंग” की प्रवृत्ति खत्म होती नहीं दिख रही—खासकर हाल ही में हुई मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया के बाद, जिसने मुस्लिम मतदाताओं को असमान रूप से प्रभावित किया और राजनीतिक बहिष्कार की आशंकाओं को और बढ़ा दिया।

कांग्रेस प्रवक्ता चंदन घोष चौधरी ने इस बात से असहमति जताई कि अल्पसंख्यक मतदाता कांग्रेस से दूर हो जाएंगे। उन्होंने कहा, “कांग्रेस के पक्ष में एकजुटता बनी रहेगी—बल्कि और बढ़ेगी, यही हमारा विश्वास है।” उन्होंने यह भी कहा कि इन जिलों में अल्पसंख्यक मतदाताओं के लिए कांग्रेस हमेशा से स्वाभाविक विकल्प रही है, न कि भाजपा, और समुदाय का भरोसा ऐतिहासिक रूप से कांग्रेस के साथ रहा है, न कि नए राजनीतिक दलों के साथ।

कांग्रेस पर दबाव

हालांकि, जिन सीटों पर भाजपा कोई बड़ा कारक नहीं है, वहां कुछ मुस्लिम मतदाता TMC से आगे के विकल्प तलाश सकते हैं। यही कारण है कि AIMIM-AJUP गठबंधन मुख्य रूप से मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे जिलों पर केंद्रित है—ये वे इलाके हैं जहां मुस्लिम बहुलता है और जो परंपरागत रूप से कांग्रेस के गढ़ रहे हैं, न कि TMC के।

यहीं पर समीकरण दिलचस्प हो जाता है—इस नए गठबंधन से सबसे ज्यादा नुकसान TMC को नहीं, बल्कि कांग्रेस को हो सकता है। इन तीन जिलों में कांग्रेस की गहरी जड़ें रही हैं और वह अब मुस्लिम असंतोष का फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। लेकिन AIMIM-AJUP गठबंधन के आने से अल्पसंख्यक वोटों में तीन-तरफा मुकाबला बन सकता है। इससे TMC के खिलाफ वोट कांग्रेस के पक्ष में एकजुट होने के बजाय बंट सकते हैं—जिसका अप्रत्यक्ष फायदा TMC को मिल सकता है।

हालांकि चंदन घोष चौधरी ने इस खतरे को खारिज किया। उन्होंने कहा, “यह तथाकथित ‘स्पॉइलर’ ज्यादा से ज्यादा TMC को नुकसान पहुंचा सकता है। कांग्रेस के लिए स्थिति मजबूत बनी रहेगी, क्योंकि लंबे समय से हम इन जिलों में जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं।”

जमीनी हकीकत

चौधरी ने गठबंधन की संरचनात्मक सीमाओं की ओर भी इशारा किया। उनका कहना है कि बंगाली भाषी और उर्दू भाषी मुस्लिम आबादी अलग-अलग क्षेत्रों में केंद्रित है, जिससे AIMIM-AJUP गठबंधन के लिए दोनों समुदायों को एक साथ प्रभावी ढंग से जोड़ना मुश्किल होगा।

उन्होंने यह भी बताया कि कांग्रेस के पास फिलहाल मालदा से एक सांसद है, जो इस क्षेत्र में पार्टी के मजबूत आधार का संकेत है।

चौधरी ने बिहार चुनाव का उदाहरण देते हुए चेतावनी दी, जहां AIMIM ने सीमांचल क्षेत्र में “स्पॉइलर” की भूमिका निभाई थी—यह इलाका पारंपरिक रूप से कांग्रेस समर्थक मुस्लिम आबादी वाला है। उनका कहना है कि बंगाल के मतदाता अब इस पैटर्न को समझ चुके हैं और मतदान के समय इसे ध्यान में रखेंगे।

“इस तरह का ‘ब्रिज’ बनना मुश्किल है, क्योंकि आबादी अलग-अलग जगहों पर बंटी हुई है। जमीनी हकीकत अलग है और इन पार्टियों की पहुंच सीमित है,” उन्होंने कहा।

अब आगे क्या?

बंगाल के चुनाव कभी भी केवल गणित का खेल नहीं रहे। यहां पहचान, भय और निष्ठा—तीनों का असर पड़ता है। AIMIM-AJUP गठबंधन इस जटिल समीकरण में एक नया तत्व है—जो करीबी मुकाबलों में निर्णायक साबित हो सकता है या मजबूत गढ़ों में पूरी तरह बेअसर भी रह सकता है।

अंततः, अल्पसंख्यक मतदाता किस तरह मतदान करते हैं, यह तय करेगा कि यह चुनाव किस दिशा में जाएगा—और यही इस बार के सबसे अनिश्चित बंगाल चुनावों में एक निर्णायक कारक बनने जा रहा है।

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