
अतीत के गौरव से भविष्य की लड़ाई, बंगाल में कांग्रेस का बड़ा सियासी दांव
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस अकेले चुनाव लड़कर पुराने गौरव को भुनाने की कोशिश में है। लेकिन अतीत की विरासत और वर्तमान चुनौतियों के बीच संतुलन बड़ा सवाल है।
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनावों में दो दशकों बाद अकेले मैदान में उतरकर राजनीतिक रूप से स्थापित करने की कोशिश कर रही है। पार्टी अपनी स्वतंत्रता के बाद की शुरुआती विरासत पर भरोसा कर रही है और उम्मीद कर रही है कि यह आज भी मतदाताओं के बीच प्रभाव डालेगी। उसकी चुनावी रणनीति के केंद्र में 1947 से 1968 के बीच के अपने शासनकाल को लगातार याद दिलाना शामिल है, खासकर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. बिधान चंद्र रॉय के दौर को, जिन्होंने 1948 से 1962 तक सेवा दी। उन्हें आज भी बंगाल के “दूरदर्शी वास्तुकार” के रूप में सम्मानित किया जाता है। कांग्रेस इस दौर को योजनाबद्ध विकास, मजबूत सार्वजनिक संस्थानों और प्रशासनिक विश्वसनीयता के मॉडल के रूप में पेश कर रही है। राज्य के कई बड़े विकास कार्य इसी समय हुए थे।
यह संदेश केवल भाषणों तक सीमित नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया के जरिए भी लक्षित रूप से प्रचारित किया जा रहा है। पार्टी मतदाताओं से अपील कर रही है कि वे “डॉ. बिधान चंद्र रॉय के समय के बंगाल की खोई हुई गौरवशाली स्थिति को बहाल करें” और एक जन-केंद्रित शासन मॉडल को वापस लाने के लिए कांग्रेस का समर्थन करें।
कांग्रेस ने इस विरासत को वर्तमान से जोड़ने के लिए 12 व्यापक वादों का खाका तैयार किया है, जिसे एक बंगाली नारे “डॉ. बिधान चंद्र रॉय के ‘सोनार बांग्ला’ को वापस लाएगी कांग्रेस” के तहत पेश किया गया है। इन वादों में रोजगार सृजन, उद्योगों का पुनर्जीवन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा को मजबूत करना, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, कानून-व्यवस्था सुनिश्चित करना, किसानों का समर्थन, सामाजिक कल्याण का विस्तार, युवाओं और महिलाओं को सशक्त बनाना, बुनियादी ढांचे में सुधार, लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा और प्रशासनिक निष्पक्षता की बहाली जैसे मुद्दे शामिल हैं। कांग्रेस का मानना है कि उसका ऐतिहासिक रिकॉर्ड आज भी मतदाताओं के लिए एक भरोसेमंद आधार बन सकता है, हालांकि बाद के वर्षों की उसकी विरासत इस दावे को जटिल बनाती है।
पार्टी नेताओं का कहना है कि उनके मुख्यमंत्री काल में अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों और योजनाबद्ध शहरों का निर्माण हुआ, जो आज के शासन की कथित विफलताओं के मुकाबले एक स्पष्ट अंतर दिखाता है। इसी संदेश को मजबूत करने के लिए कांग्रेस नेताओं और समर्थकों ने हाल ही में सोशल मीडिया पर साल्ट लेक सिटी परियोजना के उद्घाटन से जुड़ी एक तस्वीर साझा की, जिसे 51 वर्ष पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे (1972-77) ने शुरू किया था। रे बंगाल में कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री थे।
कांग्रेस नेताओं के अनुसार, यह प्रयास अतीत की विश्वसनीयता को वर्तमान की चिंताओं से जोड़ने का है। उनका दावा है कि बंगाल के प्रमुख औद्योगिक, शैक्षणिक और चिकित्सा संस्थान तथा योजनाबद्ध शहरी केंद्र कांग्रेस शासन के दौरान ही विकसित हुए थे। वे यह भी कहते हैं कि पार्टी इस विरासत को आगे बढ़ाते हुए बंगाल को तेलंगाना और कर्नाटक जैसे विकसित राज्यों की तरह बनाना चाहती है।
हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस रणनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह विरासत आज के मतदाताओं के बीच कितनी प्रासंगिक है और उसे किस हद तक सकारात्मक रूप में याद किया जाता है। 1960 के दशक के बाद कांग्रेस की राजनीतिक विरासत अधिक विवादित हो गई थी। 1972 में सिद्धार्थ शंकर रे के नेतृत्व में सत्ता में वापसी के बाद का दौर राज्य के इतिहास में सबसे विवादास्पद माना जाता है। उस चुनाव में धांधली और डराने-धमकाने के आरोप लगे थे, और विपक्षी दलों ने कांग्रेस पर “आतंक” फैलाने का आरोप लगाया था।
रे के कार्यकाल में नक्सलवादी समूहों और राजनीतिक विरोधियों पर कड़ी कार्रवाई की गई, जिसे अक्सर पुलिस की ज्यादतियों और राजनीतिक हिंसा से जोड़ा जाता है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इसी दौर ने बंगाल की लंबी और उथल-पुथल भरी राजनीतिक संस्कृति को आकार दिया। इसके अलावा, 1975 में देश में आपातकाल लागू करने में भी रे ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को सलाह देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसके दौरान पूरे देश में नागरिक स्वतंत्रताओं को निलंबित कर दिया गया था।
विशेषज्ञों का कहना है कि आज की कांग्रेस के लिए यह इतिहास एक विरोधाभास प्रस्तुत करता है। युवा मतदाताओं के लिए यह दौर बहुत पुराना हो सकता है, जबकि बुजुर्ग मतदाताओं के लिए यह पूरी तरह सकारात्मक नहीं है। कांग्रेस नेता इस आलोचना का जवाब देते हुए कहते हैं कि उस समय कुछ अतिरेक जरूर हुए, जैसे नक्सलियों पर कार्रवाई और आपातकाल, लेकिन वह दौर कानून-व्यवस्था की गंभीर चुनौतियों से भरा हुआ था और उसे आज के मानकों से पूरी तरह नहीं आंका जा सकता। उनके अनुसार, सबसे महत्वपूर्ण वह संस्थागत आधार है, जो कांग्रेस ने बंगाल में बनाया और जो आज भी मौजूद है।
मतदाताओं की प्रतिक्रिया मिश्रित नजर आती है। कुछ बुजुर्ग मतदाता मानते हैं कि उस समय अनुशासन और विकास था, और अस्पताल, सड़कें तथा संस्थान उसी दौर में बने। लेकिन वे यह भी कहते हैं कि आज के समय में लोग वर्तमान प्रदर्शन को ज्यादा महत्व देंगे। वहीं युवा मतदाताओं के लिए यह ऐतिहासिक विरासत उतनी निर्णायक नहीं है। उनका मानना है कि आज की जरूरतों और बदलाव पर ध्यान देना अधिक जरूरी है।
कुछ युवा मतदाता यह भी मानते हैं कि लोग तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों से आगे विकल्प तलाश सकते हैं, लेकिन इसके लिए कांग्रेस जैसी पार्टियों को यह दिखाना होगा कि उनमें दोनों प्रमुख दलों को चुनौती देने की वास्तविक क्षमता और इच्छाशक्ति है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस के पास इन दो प्रमुख राजनीतिक ताकतों का मुकाबला करने की पर्याप्त ताकत है। पार्टी ने अभी तक अपने उम्मीदवारों की पहली सूची भी घोषित नहीं की है, हालांकि उसने संकेत दिया है कि वह राज्य की सभी 294 सीटों पर चुनाव लड़ सकती है। साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं है कि राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा जैसे वरिष्ठ नेता राज्य में कितनी सक्रियता से प्रचार करेंगे।

