असम चुनाव से पहले कांग्रेस में बिखराव, BJP को बड़ा मौका
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असम चुनाव से पहले कांग्रेस में बिखराव, BJP को बड़ा मौका

कांग्रेस में लगातार टूट और असंतोष से असम में पार्टी कमजोर हुई है। चुनाव से पहले बीजेपी मजबूत दिख रही है और राहुल गांधी-प्रियंका गांधी की रणनीति पर सवाल उठ रहे हैं।


असम विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में लगातार हो रही टूट-फूट ने उसके उस सपने को घातक झटका दे दिया है, जिसमें वह अपने पुराने गढ़ में दोबारा सत्ता में लौटना चाहती है। असंतोष और आंतरिक कलह की आग फिलहाल असम कांग्रेस प्रमुख गौरव गोगोई की ओर केंद्रित दिख रही है, लेकिन पार्टी के भीतर उठ रही फुसफुसाहटों से संकेत मिलता है कि जल्द ही इसकी आंच कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व विशेषकर विपक्ष के नेता राहुल गांधी और उनकी बहन, वायनाड सांसद प्रियंका गांधी तक भी पहुंच सकती है।

18 मार्च को नागांव से कांग्रेस के मौजूदा लोकसभा सांसद प्रद्युत बोरदोलोई भाजपा में शामिल हो गए, जबकि असम कांग्रेस इकाई के उपाध्यक्ष नवज्योति तालुकदार ने भी पार्टी छोड़ दी। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का दावा है कि विपक्ष के नेता देबब्रत सैकिया सहित कई और कांग्रेस नेता जल्द ही पार्टी छोड़ सकते हैं। बताया जा रहा है कि तालुकदार भी भाजपा में जाने की तैयारी में हैं।

भाजपा ने उठाया संकट का फायदा

बोरदोलोई का पार्टी छोड़ना और तालुकदार का इस्तीफा, पूर्व असम कांग्रेस प्रमुख भूपेन बोरा के भाजपा में शामिल होने के एक महीने बाद हुआ है। बोरदोलोई को अब अपनी लोकसभा सीट छोड़नी होगी और उन्हें तथा बोरा को भाजपा ने क्रमशः दिसपुर और बिहपुरिया से विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार बनाया है।

कांग्रेस में इस उथल-पुथल का ठीकरा गोगोई की उस असफलता पर फोड़ा जा रहा है, जिसमें वे पद संभालने के 10 महीनों बाद भी पार्टी को स्थिर नहीं कर पाए। भाजपा में शामिल हो रहे नेताओं के कारण भी लगभग एक जैसे हैं—गोगोई के नेतृत्व में अपमानित होना, किनारे किया जाना, या यह आरोप कि राज्य इकाई में मुस्लिम नेता, विशेषकर धुबरी सांसद रकीबुल हुसैन, गोगोई के समर्थन से निर्णय ले रहे थे।

बोरदोलोई और तालुकदार ने एक और आरोप लगाया कि उम्मीदवार चयन समिति के सदस्य और सहारनपुर सांसद इमरान मसूद “सांप्रदायिक नेता” हैं और “वंदे मातरम गाने से इनकार करते हैं।” इन आरोपों से भाजपा को कांग्रेस के खिलाफ दोहरे हमले का मौका मिला है। एक तरफ गोगोई भाजपा के मुख्य निशाने पर हैं, तो दूसरी ओर भाजपा कांग्रेस को “हिंदू-विरोधी और मुस्लिम-समर्थक” पार्टी के रूप में पेश कर रही है।

राहुल और प्रियंका भी निशाने पर

कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि यह सिर्फ असम में पार्टी को कमजोर करने की रणनीति नहीं है, बल्कि असली निशाना राहुल गांधी और प्रियंका गांधी हैं। एक वरिष्ठ कांग्रेस पदाधिकारी ने कहा, “असम उन पांच राज्यों में अकेला है जहां कांग्रेस और भाजपा सीधी टक्कर में हैं और जहां चुनावी टीम राहुल और प्रियंका ने खुद चुनी है। अगर परिणाम खराब रहा, तो सिर्फ गोगोई नहीं, बल्कि वे दोनों भी निशाने पर होंगे।” एक कांग्रेस विधायक ने बताया कि भूपेन बोरा की जगह गोगोई को प्रदेश अध्यक्ष बनाना राहुल गांधी का फैसला था। उनका मानना था कि तरुण गोगोई की विरासत वाले एक युवा नेता को आगे लाने से सकारात्मक संदेश जाएगा। लेकिन कई वरिष्ठ नेता इस फैसले से खुश नहीं थे।

नेतृत्व पर सवाल

राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले जितेंद्र सिंह पिछले छह वर्षों से असम के प्रभारी हैं, जबकि 2021 के चुनाव में पार्टी हार चुकी थी। कई नेताओं ने उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं।पार्टी के अंदर यह भी धारणा बन रही है कि चुनाव सीधे राहुल और प्रियंका की निगरानी में लड़ा जा रहा है। ऐसे में अगर भाजपा जीतती है, तो इसे गांधी परिवार की अस्वीकृति के रूप में पेश किया जाएगा।

गोगोई बनाम हिमंत

कांग्रेस नेताओं का मानना है कि गोगोई के पास जटिल राज्य राजनीति से निपटने का अनुभव कम है, खासकर ऐसे समय में जब पार्टी कमजोर स्थिति में है और सामने हिमंत बिस्वा सरमा जैसे मजबूत नेता हैं।हिमंत का राजनीतिक करियर कांग्रेस से ही शुरू हुआ था और वे पार्टी के हर बड़े नेता को अच्छी तरह जानते हैं। 2015 में भाजपा में शामिल होने के बाद उन्होंने व्यवस्थित तरीके से कांग्रेस को कमजोर किया और उसके कई प्रमुख नेताओं को अपने साथ मिला लिया।

पार्टी के भीतर यह भी कहा जा रहा है कि राहुल गांधी का गोगोई और जितेंद्र सिंह पर “अंधा भरोसा” आंतरिक असंतोष को बढ़ा रहा है। वरिष्ठ नेताओं को नजरअंदाज किए जाने की भावना है और वे अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर असमंजस में हैं।

नेतृत्व की विफलता और बढ़ता पलायन

जनवरी में जब प्रियंका गांधी को उम्मीदवार चयन समिति का प्रमुख बनाया गया, तो उम्मीद थी कि वे समस्याओं का समाधान करेंगी। लेकिन उनके पहले दौरे से पहले ही भूपेन बोरा पार्टी छोड़ गए और एक महीने बाद बोरदोलोई भी चले गए।प्रियंका ने बोरदोलोई के जाने को “दुर्भाग्यपूर्ण” बताया, लेकिन पार्टी के भीतर सवाल उठ रहे हैं कि इसे रोकने के लिए नेतृत्व ने क्या किया। कुछ नेताओं का कहना है कि अगर शीर्ष नेतृत्व समय पर हस्तक्षेप करता, तो उन्हें रोका जा सकता था।

इन इस्तीफों का समय भी बेहद नुकसानदायक रहा। बोरा चुनाव अभियान समिति के प्रमुख थे, जबकि बोरदोलोई घोषणा पत्र समिति के अध्यक्ष थे। चुनाव से ठीक पहले पार्टी ने अपने दो अहम स्तंभ खो दिए।

प्रियंका के लिए अग्निपरीक्षा

प्रियंका गांधी के लिए यह स्थिति खास तौर पर चुनौतीपूर्ण है। 2022 के उत्तर प्रदेश चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद यह उनका पहला बड़ा संगठनात्मक दायित्व था। 2024 में वायनाड से सांसद बनने के बाद वे मुख्यतः प्रचार और संसदीय गतिविधियों पर केंद्रित थीं।असम में उनकी नियुक्ति को पार्टी में बड़ी भूमिका की दिशा में कदम माना जा रहा था, लेकिन मौजूदा हालात उनके लिए नकारात्मक छवि बना सकते हैं। भाजपा पहले ही यह कह चुकी है कि प्रियंका को असम की जिम्मेदारी इसलिए दी गई क्योंकि वे राहुल से ज्यादा प्रभावी दिख रही थीं।

असम में कांग्रेस की स्थिति बेहद नाजुक हो गई है। लगातार हो रहे दल-बदल, आंतरिक अविश्वास और नेतृत्व की गलतियों ने मिलकर पार्टी को कमजोर किया है। भाजपा के लिए यह सिर्फ एक और चुनावी जीत नहीं होगी, बल्कि गांधी परिवार के खिलाफ एक प्रतीकात्मक संदेश भी होगा।वहीं कांग्रेस और गांधी परिवार के लिए यह एक गंभीर चेतावनी है कि अगर समय रहते आत्ममंथन नहीं किया गया, तो पार्टी की गिरावट और तेज हो सकती है।

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