
असम के दिसपुर में भाजपा के बागी जयंत दास ने त्रिकोणीय बनाया मुकाबला
असम की दिसपुर सीट पर BJP के प्रद्युत बोरदोलोई और कांग्रेस की मीरा बोरठाकुर के बीच निर्दलीय जयंत दास की एंट्री ने चुनावी मुकाबले को रोमांचक और अनिश्चित बना दिया है।
Assam Assembly Elections : असम की राजनीति का केंद्र और प्रशासनिक हृदय मानी जाने वाली दिसपुर विधानसभा सीट पर चुनावी मुकाबला अब एक नाटकीय मोड़ ले चुका है। भाजपा के दिग्गज नेता जयंत कुमार दास ने पार्टी से बगावत कर निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरने का फैसला किया है। उनके इस कदम ने दिसपुर की जंग को त्रिकोणीय बना दिया है, जिससे न केवल भाजपा बल्कि कांग्रेस की जीत की संभावनाओं पर भी बड़ा असर पड़ने के आसार हैं।
तीन दशकों से अधिक समय तक भाजपा का चेहरा रहे दास ने दिसपुर जैसी प्रतिष्ठित सीट से ताल ठोक दी है, जिसे भाजपा का अभेद्य गढ़ माना जाता रहा है। उनकी एंट्री ने उस मुकाबले को बेहद जटिल बना दिया है, जो शुरुआत में भाजपा के प्रद्युत बोरदोलोई और कांग्रेस की मीरा बोरठाकुर गोस्वामी के बीच एक सीधा मुकाबला नजर आ रहा था।
दो पूर्व भाजपाई बनाम एक पूर्व कांग्रेसी: दिलचस्प हुई जंग
दिसपुर का यह चुनावी दंगल 'दलबदलुओं' और 'अपनों' की लड़ाई में तब्दील हो गया है। भाजपा उम्मीदवार प्रद्युत बोरदोलोई की उम्मीदवारी ने खुद पार्टी के भीतर असंतोष की आग भड़का दी है। नगांव से कांग्रेस के पूर्व सांसद रहे बोरदोलोई ने टिकट घोषणा से कुछ ही दिन पहले भाजपा का दामन थामा था। पार्टी ने उन्हें वर्तमान विधायक अतुल बोरा की जगह मैदान में उतारा है, जिन्होंने 2016 और 2021 में लगातार दो बार भाजपा को यहाँ शानदार जीत दिलाई थी। स्थानीय कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर गहरा गुस्सा है कि एक 'बाहरी' के लिए उनके समर्पित नेता को दरकिनार कर दिया गया।
दूसरी तरफ, कांग्रेस की उम्मीदवार मीरा बोरठाकुर गोस्वामी का इतिहास भी भाजपा से जुड़ा रहा है। 2018 में भाजपा छोड़ने वाली मीरा अब कांग्रेस के टिकट पर आक्रामक चुनाव प्रचार कर रही हैं। उनका पूरा अभियान जलजमाव (Waterlogging), शहरी बुनियादी ढांचे की कमी और भाजपा सरकार के 'स्मार्ट सिटी' के वादों की विफलता पर केंद्रित है। दिलचस्प बात यह है कि मीरा उन असंतुष्ट भाजपा समर्थकों तक भी पहुँच रही हैं, जो बोरदोलोई की उम्मीदवारी से नाराज हैं।
'कांग्रेस का आयात': जयंत दास का तीखा हमला
खुद को "दिसपुर की असली स्थानीय आवाज" बताते हुए जयंत कुमार दास ने अपने दोनों प्रतिद्वंद्वियों पर तीखे हमले किए हैं। उन्होंने प्रद्युत बोरदोलोई को "कांग्रेस का आयात" (Congress Import) करार दिया और आरोप लगाया कि असम में भाजपा अपने मूल चरित्र और विचारधारा से भटक गई है।
अपनी जमीनी पकड़ के दम पर दास मतदाताओं के बीच जाकर कोविड-19 महामारी के दौरान किए गए अपने कार्यों की याद दिला रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि जब लोग संकट में थे, तब वे सड़कों पर उतरकर लोगों की मदद कर रहे थे। दास ने आत्मविश्वास जताते हुए कहा, "मुझे जीत का पूरा भरोसा है क्योंकि मैं हमेशा यहाँ के लोगों के साथ खड़ा रहा हूँ। दिसपुर का शिक्षित मतदाता इस बार पार्टी के सिंबल के बजाय उम्मीदवार की काबिलियत को प्राथमिकता देगा।" उन्होंने यह विवादास्पद बयान भी दिया कि भाजपा की भारी अंतर से जीत केवल 'हेरफेर' के जरिए ही संभव हो सकती है।
जयंत दास क्यों साबित हो सकते हैं 'गेम चेंजर'?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस मुकाबले में जयंत दास एक 'डिसाइसिव फैक्टर' (निर्णायक कारक) बनकर उभर सकते हैं। पारंपरिक भाजपा मतदाताओं और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच उनकी गहरी पैठ भगवा पार्टी के वोट बैंक में सेंध लगा सकती है। यदि दास भाजपा के मूल वोटों में 15 से 25 प्रतिशत की भी सेंधमारी करते हैं, तो बोरदोलोई की स्थिति काफी कमजोर हो जाएगी, जिससे कांग्रेस के लिए जीत की राह आसान हो सकती है।
हालांकि, दिसपुर के समीकरण पल-पल बदल रहे हैं। जहाँ दास का मजबूत प्रदर्शन मीरा बोरठाकुर गोस्वामी को फायदा पहुँचा सकता है, वहीं यदि तीसरा मोर्चा उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन करता है, तो विपक्षी वोटों के बिखराव का फायदा भाजपा को भी मिल सकता है।
दिसपुर का राजनीतिक और प्रतीकात्मक महत्व
1973 से असम की प्रशासनिक राजधानी रहा दिसपुर न केवल राज्य सचिवालय बल्कि विधानसभा का भी घर है। लगभग 2.5 लाख मतदाताओं वाले इस निर्वाचन क्षेत्र में महिला मतदाताओं की संख्या काफी अधिक है। यहाँ की जीत का मतलब केवल एक सीट जीतना नहीं, बल्कि राज्य की सत्ता पर अपनी पकड़ का मनोवैज्ञानिक संदेश देना भी है।
जैसे-जैसे चुनाव प्रचार तेज हो रहा है, गुवाहाटी की गलियों में बस एक ही चर्चा है—क्या जयंत दास केवल एक 'वोट कटवा' की भूमिका निभाएंगे, या वे दिसपुर के राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदलकर खुद एक गंभीर दावेदार के रूप में उभरेंगे?
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