बंगाल चुनाव में मछली का मुद्दा गरमाया, टीएमसी-बीजेपी में जुबानी जंग तेज
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बंगाल चुनाव में मछली का मुद्दा गरमाया, टीएमसी-बीजेपी में जुबानी जंग तेज

पश्चिम बंगाल चुनाव में मछली अब सियासी मुद्दा बन गई है। TMC पहचान की राजनीति और BJP विकास के एजेंडे के जरिए वोटरों को साधने में जुटी है।


“माछे भाते बांगाली” (मछली और चावल ही बांगाली बनाते हैं) एक ऐसा मुहावरा है जो बंगाल की रोज़मर्रा की ज़िंदगी से गहराई से जुड़ा है। इसका अर्थ है कि मछली बंगाली पहचान और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। लेकिन 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नज़दीक आ रहे हैं और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीधी टक्कर बनती जा रही है, वैसे-वैसे बंगाली पहचान का हर पहलू राजनीतिक बहस का हिस्सा बनता जा रहा है—अब इसमें मछली भी शामिल हो गई है। दोनों दल अब वोटों के लिए “मछली” जैसे मुद्दे पर भी आमने-सामने आ गए हैं।

पहचान की राजनीति बनाम विकास का नैरेटिव

पिछले कुछ समय से चुनावी बंगाल में तीखी बयानबाज़ी देखने को मिल रही है। खासकर इस बात को लेकर कि अगर भाजपा सत्ता में आती है तो वह बंगाली संस्कृति और खान-पान, खासकर मछली खाने की परंपरा, को प्रभावित कर सकती है। इस मुद्दे ने पहचान की राजनीति और विकास के मुद्दों के बीच टकराव को और तेज कर दिया है।जहां टीएमसी भाजपा को “बाहरी” पार्टी बताकर बंगाली पहचान के लिए खतरा बता रही है, वहीं भाजपा का कहना है कि ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार के “कुप्रबंधन” ने राज्य को पीछे धकेल दिया है।

मछली पर सियासत: मोदी का हमला

इसी बहस के बीच नरेंद्र मोदी ने मछली के मुद्दे को उठाकर राजनीतिक माहौल को और गरमा दिया। 9 अप्रैल को हल्दिया में एक रैली को संबोधित करते हुए उन्होंने टीएमसी सरकार पर आरोप लगाया कि वह बंगाल में मछली की बढ़ती मांग को पूरा करने में विफल रही है।

उन्होंने कहा कि बंगाल में मछली उत्पादन की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन इसके बावजूद राज्य आत्मनिर्भर नहीं बन पाया है और आज भी उसे अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए दूसरे राज्यों से मछली मंगानी पड़ती है। उन्होंने इसे टीएमसी की “गलत नीतियों” का परिणाम बताया।

मोदी ने यह भी कहा कि पिछले 11 वर्षों में भारत में कुल मछली उत्पादन और समुद्री उत्पादों का निर्यात दोगुना हो गया है, लेकिन बंगाल में ऐसा नहीं हो पाया।

‘ब्लू इकोनॉमी’ और भाजपा का वादा

प्रधानमंत्री ने टीएमसी के इस आरोप का भी जवाब दिया कि भाजपा सत्ता में आने पर बंगाल में मछली खाने पर रोक लगा देगी। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार मछली पालन को बढ़ावा देने और हल्दिया पोर्ट को “ब्लू इकोनॉमी ज़ोन” में बदलने की दिशा में काम करना चाहती है।उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बिहार और असम जैसे स्थल-रुद्ध (landlocked) राज्यों में भी भाजपा सरकारों ने मछली उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल की है।

ममता का पलटवार

इससे पहले ममता बनर्जी ने एक रैली में आरोप लगाया था कि भाजपा शासित राज्यों में मछली नहीं खाई जाती और अगर भाजपा बंगाल में सत्ता में आई तो लोगों को मछली, मांस और अंडे खाने से रोका जा सकता है।उन्होंने यह भी कहा कि भाजपा सांप्रदायिक तनाव भड़काकर सत्ता में आती है।हालांकि, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष शामिक भट्टाचार्य ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि बंगाल में लोगों की खान-पान की आदतों पर कोई रोक नहीं लगेगी।

मछली उत्पादन पर विवाद

भाजपा के आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने भी आरोप लगाया कि टीएमसी सरकार ने बंगाल को मछली के मामले में आयात पर निर्भर बना दिया है।इसके जवाब में टीएमसी ने कहा कि चुनाव से पहले भाजपा को अचानक बंगाल में मछली के सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व की याद आई है। पार्टी का दावा है कि आंध्र प्रदेश के बाद पश्चिम बंगाल देश में मछली उत्पादन में दूसरे स्थान पर है।

केंद्र-राज्य टकराव

मछली पालन को लेकर केंद्र और राज्य सरकार के बीच भी टकराव देखने को मिला है। 2025 में केंद्रीय मत्स्य मंत्री राजीव रंजन सिंह ने संसद में कहा कि पश्चिम बंगाल ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) को सही तरीके से लागू नहीं किया और स्वीकृत राशि का केवल एक हिस्सा ही खर्च किया।

प्रधानमंत्री ने भी आरोप लगाया कि टीएमसी इस योजना को पूरी तरह लागू नहीं कर रही, जिससे आम लोगों को नुकसान हो रहा है। उन्होंने कहा कि अगर राज्य में भाजपा की सरकार बनती है, तो केंद्र की योजनाओं को पूरी तरह लागू किया जाएगा और बंगाल मछली उत्पादन में आत्मनिर्भर बन जाएगा।

सियासत में ‘मछली’ की एंट्री

भ्रष्टाचार, विकास और शासन जैसे मुद्दे पहले से ही भाजपा और टीएमसी के बीच टकराव का हिस्सा रहे हैं, लेकिन अब “मछली” भी इस राजनीतिक जंग का अहम मुद्दा बन गई है। इस तरह, बंगाल की राजनीति में पहचान, संस्कृति और विकास के बीच चल रही इस लड़ाई ने एक नया मोड़ ले लिया है, जहां “मछली” सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि सियासी हथियार बन गई है।

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