दक्षिण से पूर्व तक मुकाबला, सभी दलों की प्रतिष्ठा दांव पर
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दक्षिण से पूर्व तक मुकाबला, सभी दलों की प्रतिष्ठा दांव पर

असम, बंगाल, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी चुनावों में बीजेपी, कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों के लिए साख और विस्तार की बड़ी राजनीतिक लड़ाई दांव पर है।


देश के चार राज्यों असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल के साथ एक केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में जनता अपनी अगली सरकार बनाने के लिए मतदान करने वाली है। 9 अप्रैल को असम, पश्चिम बंगाल और केरल में एक चरण में चुनाव होना है, वहीं 23 अप्रैल को तमिलनाडु में एक चरण तो पश्चिम बंगाल में दो चरणों यानी कि 23 अप्रैल और 29 अप्रैल को मत डाले जाएंगे। यहां कि मौजूदा सरकारें दावा कर रही हैं कि इस दफा भी जनमत उनके साथ है। जनता उनके कामकाज पर मुहर लगाने की इरादा कर चुकी हैं, वहीं विपक्षी दलों का कहना है कि दिन में सपना देखने से किसी को मनाही कहां है। ऐसे में द फेडरल के एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन ने इस पूरे परिदृश्य को व्यापक संदर्भ में रखते हुए बताया, “यह हर चुनाव आजकल हमारे देश में बहुत जरूरी हो गया है… एक तरफ दुनिया में उथल-पुथल है, मगर यहां चुनाव की गर्मी भी कम नहीं है।” उनके मुताबिक़, इन चुनावों का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि बीजेपी, कांग्रेस और क्षेत्रीय दल- तीनों के लिए यह अस्तित्व और विस्तार की लड़ाई है।

बीजेपी की रणनीति

बीजेपी की रणनीति पर उन्होंने बताया कि पार्टी अब अपनी पारंपरिक छवि से बाहर निकलना चाहती है। “पहले बीजेपी को एक नॉर्थ की पार्टी माना जाता था… मगर 2014 के बाद उन्होंने पूर्व के राज्यों में अपनी पैठ बनाई है, और असम इसमें सबसे अहम है।” असम में हिमंत बिस्वा सरमा की भूमिका को लेकर उन्होंने कहा, “उन्होंने न केवल अपने आप को मजबूत किया है, बल्कि कांग्रेस को भी तोड़ मरोड़ के रख दिया है।”

असम की सियासी तस्वीर

असम में कांग्रेस की स्थिति पर उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा, “कांग्रेस की यही कहानी है… आपसी फूट और अंदर की लड़ाई… नेता ज्यादा हैं और फॉलोअर्स कम।” उनके मुताबिक़, गौरव गोगोई जैसे युवा चेहरे उम्मीद जरूर जगाते हैं, लेकिन संगठनात्मक कमजोरी और गुटबाजी पार्टी की राह कठिन बना रही है। वहीं सरमा की राजनीति पर उन्होंने टिप्पणी की, “उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के पूरे स्टेट को पोलराइज कर दिया… और कहा कि मुझे मुसलमानों के वोटों की जरूरत नहीं है।” यह बयान राज्य की राजनीति में बदलते स्वरूप को दर्शाता है।

किसका होगा पश्चिम बंगाल?

पश्चिम बंगाल को उन्होंने इस चुनाव का सबसे अहम रणक्षेत्र बताया। एस श्रीनिवासन के मुताबिक़, “यदि इन सब में नंबर वन टक्कर कहीं है तो वो बीजेपी और टीएमसी के बीच है… यह सीधा-सीधा मुकाबला है।” ममता बनर्जी की रणनीति पर उन्होंने कहा, “उन्होंने एसआईआर और चुनाव आयोग के मुद्दे को जनता के बीच इस तरह रखा कि एक मैसेज गया कि ममता दी लोगों के साथ खड़ी हैं।”

बीजेपी जहां राष्ट्रीय सुरक्षा और घुसपैठ के मुद्दे उठा रही है, वहीं ममता बनर्जी ने इसे स्थानीय अस्मिता से जोड़ दिया है। इस पर उन्होंने कहा, “बीजेपी ने नेशनलिज्म उठाया, तो ममता ने सब-नेशनलिज्म… बंगाल की अस्मिता का सवाल।”

चुनाव आयोग की कार्रवाइयों पर उन्होंने गंभीर टिप्पणी करते हुए बताया, “इतने बड़े पैमाने पर तबादले… चीफ सेक्रेटरी तक को हटा दिया गया… यह कहीं और नहीं हुआ है।” उनके मुताबिक़, यही कारण है कि ममता बनर्जी इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने में सफल रही हैं। उन्होंने आगे कहा, “इस चुनाव में उनके अच्छे प्रदर्शन की संभावना को नकारा नहीं जा सकता… वो बहुत जुझारू नेता हैं।”

कैसा है तमिलनाडु का मिजाज?

तमिलनाडु के संदर्भ मे एस श्रीनिवासन का मत है कि डीएमके का गठबंधन मजबूत स्थिति में है। “उन्होंने एक बड़ा सोशल कोलेशन बनाया है… हर समुदाय को साथ जोड़कर रखा है।” स्टालिन के सामने चुनौती को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा, “1971 के बाद कोई भी डीएमके सरकार दोबारा नहीं आई… अगर स्टालिन ऐसा करते हैं तो अपने पिता के रिकॉर्ड की बराबरी करेंगे।”

एआईएडीएमके की स्थिति पर उन्होंने कहा, “ओपीएस और ईपीएस के बीच की लड़ाई ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया है।” वहीं अभिनेता विजय की एंट्री को लेकर उन्होंने सावधानी से कहा, “लड़ाई त्रिकोणीय हो गई है… अब देखना है कि वो किसका वोट काटते हैं।” उनके मुताबिक़, इसका असर एआईएडीएमके पर ज्यादा पड़ सकता है।

केरल में यूडीएफ या एलडीएफ

केरल में मुकाबले को लेकर उन्होंने बताया, “यदि पिनराई विजयन तीसरी बार आते हैं तो यह बहुत बड़ा रिकॉर्ड होगा।” साथ ही उन्होंने वामपंथी राजनीति के भविष्य को लेकर चिंता जताई “यदि केरल भी उनके हाथ से निकल गया, तो फिर कम्युनिस्टों के पास कोई प्रदेश नहीं बचेगा।”

कांग्रेस के लिए केरल की अहमियत पर उन्होंने कहा, “कांग्रेस के लिए यह बहुत जरूरी है क्योंकि लगातार चुनाव हारती आई है।” लेकिन पार्टी की आंतरिक स्थिति पर उन्होंने साफ कहा, “जीतते हुए भी हार सकती है क्योंकि अंदर बहुत गुटबाजी है।”

पुडुचेरी में कैसा है माहौल?

पुडुचेरी को लेकर उन्होंने बताया, “बहुत छोटा राज्य है… मगर स्थिति जटिल है।” उनके मुताबिक़, एनडीए गठबंधन फिलहाल मजबूत दिखता है, जबकि कांग्रेस और डीएमके के बीच नेतृत्व को लेकर टकराव विपक्ष की संभावनाओं को कमजोर कर सकता है- “कांग्रेस चाहती है कि नेतृत्व उसका हो, मगर डीएमके तैयार नहीं है.

ये चुनाव केवल राज्यों की सत्ता तय करने तक सीमित नहीं हैं। उन्होंने कहा, “बीजेपी के लिए यह जरूरी है कि वो साबित करे कि वह सिर्फ नॉर्थ इंडियन पार्टी नहीं है… और कांग्रेस के लिए यह अपनी खोई जमीन वापस पाने की लड़ाई है।”

कुल मिलाकर, यह चुनाव कई स्तरों पर लड़ा जा रहा है—विचारधाराओं, नेतृत्व और संगठनात्मक क्षमता के बीच। आने वाले नतीजे न केवल राज्यों की राजनीतिक तस्वीर बदलेंगे, बल्कि देश की राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय करेंगे।

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