ध्रुवीकरण की सियासत में असम रण, सरमा की रणनीति या कांग्रेस की कमजोरी?
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ध्रुवीकरण की सियासत में असम रण, सरमा की रणनीति या कांग्रेस की कमजोरी?

असम चुनाव में पहचान की राजनीति, विकास के दावे और कमजोर विपक्ष के बीच मुकाबला दिलचस्प है, जहांहिमंता बिस्वा सरमा की रणनीति और कांग्रेस की चुनौतियां नतीजे तय करेंगी।


आगामी असम विधानसभा चुनावों को लेकर राजनीतिक माहौल तेजी से गर्म हो रहा है। इस संदर्भ में एक तीखी टिप्पणी पूरी बहस का केंद्र बनती है। “इसे इस तरह से तैयार किया गया है कि चुनाव को ध्रुवीकृत किया जा सके… जब आप पहचान (आइडेंटिटी) को सामने लाते हैं, तो यह एंटी-इंकम्बेंसी को काफी हद तक कम करने में मदद करता है।” इसी मुद्दे पर AI with Sanket कार्यक्रम में द फेडरल ने वरिष्ठ पत्रकार संदीप फुकन और नॉर्थईस्ट लाइव टीवी के एडिटर-इन-चीफ वासबीर हुसैन से बातचीत की। चर्चा में यह समझने की कोशिश की गई कि क्या पहचान की राजनीति, विकास के दावे और विपक्ष की कमजोरी इस हाई-स्टेक चुनाव का परिणाम तय करेंगे।

हिमंता बिस्वा सरमा का प्रभाव

चर्चा का केंद्र असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा रहे, जिनकी राजनीतिक पकड़ और चुनावी रणनीति ने उन्हें राज्य की राजनीति का प्रमुख चेहरा बना दिया है। वे लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने की कोशिश में हैं। यह सवाल अहम रहा कि क्या उनकी पार्टी द्वारा पहचान और घुसपैठ जैसे मुद्दों पर जोर, दस साल की सत्ता के बाद पैदा हुई एंटी-इंकम्बेंसी को दबा पाएगा। साथ ही यह भी देखा गया कि क्या गौरव गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस आंतरिक मतभेदों से उबरकर मजबूत चुनौती दे पाएगी।

कांग्रेस की चुनौतियां

संदीप फुकन ने कांग्रेस को पूरी तरह कमजोर मानने से इनकार किया, लेकिन संगठनात्मक समस्याओं को स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि चुनाव के ठीक पहले नेतृत्व में बदलाव करना बड़ी रणनीतिक गलती थी।उनके अनुसार, या तो यह बदलाव पहले कर लिया जाना चाहिए था या चुनाव के बाद तक टाल देना चाहिए था। बीच चुनाव में नेतृत्व बदलना “युद्ध के बीच सेनापति बदलने” जैसा है।

गोगोई फैक्टर

आंतरिक समस्याओं के बावजूद, फुकन ने गौरव गोगोई की 2024 लोकसभा चुनाव में जोरहाट से जीत को कांग्रेस की ताकत का संकेत बताया। उन्होंने यह भी बताया कि यह सीट पहले बीजेपी के पास थी।कालीबोर से जोरहाट शिफ्ट होना एक बड़ा राजनीतिक कदम माना गया। हालांकि, कांग्रेस से नेताओं का बीजेपी में जाना पार्टी की कमजोरी को दर्शाता है।

पहचान की राजनीति

फुकन ने असम की राजनीति को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में समझाया, खासकर 1985 के असम समझौते और विदेशी विरोधी आंदोलन के संदर्भ में।उन्होंने कहा कि पहचान की राजनीति लंबे समय से राज्य की चुनावी बहस का हिस्सा रही है। “मिया” जैसे विवादित शब्दों का इस्तेमाल भी इसी पृष्ठभूमि से जुड़ा है। बांग्लादेश से अवैध प्रवासियों का मुद्दा आज भी राजनीति को प्रभावित करता है।

बीजेपी की रणनीति

फुकन के अनुसार, बीजेपी की रणनीति सोची-समझी है। पहचान के मुद्दे को उभारकर चुनाव को ध्रुवीकृत किया जा रहा है। इससे कांग्रेस को “बाहरी लोगों के समर्थक” के रूप में दिखाया जाता है, जबकि बीजेपी खुद को स्थानीय पहचान की रक्षक बताती है।उन्होंने कहा कि इस रणनीति का एक और फायदा है—यह शासन से जुड़े सवालों से ध्यान हटाकर एंटी-इंकम्बेंसी को कम करती है।

कांग्रेस की प्रतिक्रिया

कांग्रेस की रणनीति संतुलित बताई गई। फुकन के अनुसार, पार्टी एक सीमा तक ही जवाब दे सकती है क्योंकि ज्यादा आक्रामक प्रतिक्रिया बीजेपी के नैरेटिव को मजबूत कर सकती है। इस स्थिति को उन्होंने “रस्सी पर चलने” जैसा बताया, जहां कांग्रेस विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दे उठाती है, लेकिन पहचान की राजनीति में सीधे नहीं उलझती।

सरमा का राजनीतिक सफर

वासबीर हुसैन ने हिमंता बिस्वा सरमा के लंबे राजनीतिक सफर पर प्रकाश डाला। 1996 से शुरू हुआ उनका करियर 2001 के बाद लगातार चुनावी जीत के साथ आगे बढ़ा।2015 में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आने के बाद उनकी राजनीति में बड़ा मोड़ आया और 2021 में वे मुख्यमंत्री बने।

चुनावी अभियान का अंतर

हुसैन ने बताया कि बीजेपी लगातार चुनावी मोड में रहती है, जबकि कांग्रेस संगठनात्मक रूप से कमजोर दिखती है।बीजेपी ने अपने सहयोगियों को 37 सीटें दीं, जबकि कांग्रेस ने देर से गठबंधन किया और कम सीटें बांटीं। साथ ही, कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की कमी भी अभियान को प्रभावित कर रही है।

विकास का मुद्दा

हुसैन ने बीजेपी सरकार की सबसे बड़ी ताकत के रूप में विकास को बताया। गुवाहाटी के पास सेमीकंडक्टर प्लांट, एयरपोर्ट विस्तार और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स इसका उदाहरण हैं।उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने 1,65,000 लोगों को रोजगार देने का लक्ष्य पार किया। महिलाओं के लिए योजनाओं ने भी जनता से जुड़ाव बढ़ाया है।

“कोई काउंटर नैरेटिव नहीं”

हुसैन के अनुसार, कांग्रेस के पास मजबूत जवाबी कहानी (काउंटर नैरेटिव) नहीं है। सरकार पर लगाए गए आरोप ठोस सबूतों के बिना कमजोर पड़ जाते हैं।

चुनावी तस्वीर

विवादित बयानों के असर पर हुसैन ने कहा कि इससे सरमा को ज्यादा नुकसान नहीं होगा। उन्होंने “मिया” शब्द को अवैध प्रवासियों के संदर्भ में बताया, न कि किसी समुदाय के लिए।मतदाता सूची से 2.5 लाख नाम हटाने का मुद्दा भी नागरिकता बहस से जुड़ा बताया गया।

सबसे बड़ी चुनौती

हुसैन के अनुसार, अगर बीजेपी फिर से सत्ता में आती है, तो सबसे बड़ी चुनौती बढ़ती जन अपेक्षाओं को पूरा करना होगी।उन्होंने कहा कि चुनाव जीतने के बाद असली परीक्षा शासन और विकास की गति बनाए रखने की होगी।

असम का यह चुनाव सिर्फ सत्ता का संघर्ष नहीं, बल्कि पहचान, विकास और राजनीतिक रणनीति का जटिल मिश्रण है। जहां एक तरफ बीजेपी मजबूत संगठन और स्पष्ट नैरेटिव के साथ मैदान में है, वहीं कांग्रेस आंतरिक चुनौतियों के बावजूद वापसी की कोशिश में जुटी है। अंततः, चुनाव परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि मतदाता पहचान की राजनीति को प्राथमिकता देते हैं या विकास और शासन को।

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