
वोटर्स का बदलता राजनीतिक मिजाज, सत्ता विरोध से समर्थन तक
भारत में मतदाताओं का रुझान बदल रहा है। मजबूत नेतृत्व, कमजोर विपक्ष और वेलफेयर योजनाओं के चलते सत्ताधारी दलों को दोबारा मौका मिल रहा है।
भारत के मतदाता, जिन्हें लंबे समय तक स्वाभाविक रूप से सत्ता विरोधी (एंटी-इंकंबेंसी) माना जाता रहा है, अब शायद एक बदलाव का संकेत दे रहे हैं। हाल ही में ‘टॉकिंग सेंस विद श्रीनि’ कार्यक्रम में द फेडरल के एडिटर-इन-चीफ एस. श्रीनिवासन ने भारतीय राजनीति में उभरती “प्रो-इंकंबेंसी” यानी सत्ता में बैठे नेताओं के पक्ष में झुकाव की प्रवृत्ति का विश्लेषण किया। यह विश्लेषण हाल के कई चुनावी नतीजों के संदर्भ में किया गया।
2023 में हिंदी पट्टी के महत्वपूर्ण राज्यों में बीजेपी की वापसी, महाराष्ट्र और दिल्ली में उसका मजबूत प्रदर्शन, और बिहार जैसे राज्यों में नेतृत्व की निरंतरता इस बात की ओर इशारा करती है कि अब सत्ताधारी दलों को पहले की तरह आसानी से बाहर नहीं किया जा रहा है। 2026 में पांच अलग-अलग राजनीतिक परिस्थितियों वाले राज्यों में होने वाले चुनावों के मद्देनज़र यह सवाल उठता है कि क्या यह एक स्थायी बदलाव है या फिर कमजोर विपक्ष और मजबूत नेतृत्व के कारण बना अस्थायी दौर।
प्रो-इंकंबेंसी की बढ़ती प्रवृत्ति
श्रीनिवासन का मानना है कि “एंटी-इंकंबेंसी” का विचार शायद बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया था। उनके अनुसार, “मतदाता किसी सरकार को दोबारा मौका देने से हिचकते नहीं हैं।” उन्होंने प्रसिद्ध चुनाव विश्लेषकों प्रणय रॉय और दोराब सोपारीवाला का उल्लेख करते हुए कहा कि “प्रो-इंकंबेंसी” की अवधारणा अब ज्यादा प्रासंगिक हो गई है।उन्होंने बताया कि शासन की निरंतरता, आर्थिक स्थिति और नेतृत्व की पहचान जैसे कारक अब मतदाताओं के व्यवहार को अधिक प्रभावित कर रहे हैं।
कमजोर विपक्ष बना अहम कारण
इस बदलाव के पीछे एक बड़ा कारण कई राज्यों में मजबूत विपक्ष का अभाव भी है। श्रीनिवासन के अनुसार, “जहां विपक्ष बिखरा हुआ है, वहां ‘कोई विकल्प नहीं’ वाला कारक बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।” यही वजह है कि कई करीबी माने जा रहे चुनावों में भी परिणाम सत्ताधारी दलों के पक्ष में जाते दिखे हैं।
वेलफेयर योजनाएं बनीं चुनावी हथियार
सरकारी कल्याणकारी योजनाएं भी अब चुनावी राजनीति का अहम हिस्सा बन गई हैं। जिन्हें पहले “फ्रीबी” कहकर खारिज किया जाता था, वे अब डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए अधिक संगठित रूप में लागू हो रही हैं। श्रीनिवासन के मुताबिक, “अब यह एक अनिवार्य तत्व बन गया है। अगर आप चुनाव में उतर रहे हैं, तो कुछ न कुछ देना ही होगा।” कोविड के बाद की आर्थिक चुनौतियों और नकद हस्तांतरण की प्रभावशीलता ने इन योजनाओं को राजनीतिक रूप से और भी कारगर बना दिया है।
राज्यों के हिसाब से अलग तस्वीर
हालांकि, यह प्रो-इंकंबेंसी हर राज्य में एक जैसी नहीं है। क्षेत्रीय राजनीति अब भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।असम में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने राज्य स्तर की नीतियों और केंद्र के साथ तालमेल के जरिए अपनी पकड़ मजबूत की है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी बीजेपी के राष्ट्रीय नैरेटिव का मुकाबला क्षेत्रीय पहचान के जरिए कर रही हैं।तमिलनाडु में अभिनेता विजय की एंट्री चुनाव को दिलचस्प बना सकती है, हालांकि उनके सामने संगठनात्मक चुनौतियां हैं।केरल में पारंपरिक रूप से सत्ता बदलती रही है, लेकिन मुख्यमंत्री पिनराई विजयन इस बार इस परंपरा को तोड़ सकते हैं।
नेतृत्व के साथ गठबंधन भी अहम
श्रीनिवासन ने यह भी स्पष्ट किया कि मजबूत नेतृत्व का मतलब यह नहीं है कि भारतीय राजनीति “राष्ट्रपति प्रणाली” जैसी हो गई है। उनके अनुसार, “मुख्यमंत्री भले ही केंद्र में हों, लेकिन जीत के लिए व्यापक सामाजिक और राजनीतिक गठबंधन जरूरी होते हैं।”पुडुचेरी जैसे छोटे लेकिन जटिल राजनीतिक क्षेत्र में तो गठबंधन समीकरण ही चुनावी नतीजों को तय कर सकते हैं, जो यह दिखाता है कि किसी एक सिद्धांत से पूरे देश की राजनीति को नहीं समझा जा सकता।
कुल मिलाकर, भारत में उभरती तस्वीर “शर्तों के साथ प्रो-इंकंबेंसी” की है—जहां प्रदर्शन, कल्याणकारी योजनाएं और नेतृत्व अहम हैं, लेकिन उनका असर स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से बदलता है। जैसा कि श्रीनिवासन कहते हैं, “अगर इन पांच राज्यों में ज्यादातर सत्ताधारी दल फिर से जीतते हैं, तो यह सिद्धांत और मजबूत होगा, लेकिन राजनीति में चौंकाने वाले नतीजों की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।”

