केरल चुनाव 2026: माकपा दिग्गज का विद्रोह, अलप्पुझा में छिड़ा वैचारिक युद्ध
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केरल चुनाव 2026: माकपा दिग्गज का विद्रोह, अलप्पुझा में छिड़ा वैचारिक युद्ध

रेड खेमे से इस दिग्गज नेता के पाला बदलने ने कम्युनिस्ट विचारधारा की मूल भावना और ज़िले के राजनीतिक भविष्य के लिए चल रही लड़ाई का स्वरूप ही बदल दिया है।


Kerala Assembly elections 2026 : केरल में चुनावी बिसात बिछ चुकी है और दशकों से चला आ रहा एलडीएफ-यूडीएफ (LDF-UDF) का पारंपरिक मुकाबला इस बार बेहद जटिल और अप्रत्याशित मोड़ ले चुका है। 2026 की इस चुनावी पटकथा में केवल भारतीय जनता पार्टी (BJP) का क्रमिक उभार ही विश्लेषकों की उत्सुकता का केंद्र नहीं है, बल्कि वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) की प्रमुख पार्टी माकपा (CPI-M) के दिग्गज नेताओं का पाला बदलकर विपक्षी खेमे, विशेष रूप से अपने धुर विरोधी कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) में शामिल होना सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोर रहा है।


ऐतिहासिक और दुर्लभ दृश्य: कांग्रेस कार्यालय का उद्घाटन करते कम्युनिस्ट नेता
कल्पना कीजिए, एक ऐसा दृश्य जहाँ एक अनुभवी और कद्दावर कम्युनिस्ट नेता अलप्पुझा में यूडीएफ के चुनावी कार्यालय का भव्य उद्घाटन कर रहा है। अलप्पुझा उन 140 निर्वाचन क्षेत्रों में से एक है जहाँ 9 अप्रैल को मतदान होना है। गुरुवार (26 मार्च) को 'द फेडरल' की टीम अलप्पुझा पहुँची, जहाँ केरल छात्र संघ (KSU) के उभरते नेता ए.डी. थॉमस के केंद्रीय चुनाव समिति कार्यालय का उद्घाटन समारोह चल रहा था। थॉमस इस बार एलडीएफ के मौजूदा विधायक पी.पी. चितरंजन को कड़ी चुनौती देने के लिए मैदान में उतरे हैं।

इस अवसर पर मंच पर न केवल कांग्रेस के स्थानीय नेता और उत्साही कार्यकर्ता मौजूद थे, बल्कि पूर्व सांसद मनोज कुरुसिंकल और केरल प्रदेश कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष ए.ए. शुक्कूर की उपस्थिति ने इस कार्यक्रम को और भी वजनदार बना दिया था। एक ऐसे गठबंधन के लिए, जो पिछले एक दशक की सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) के सहारे सत्ता हथियाने की पुरजोर कोशिश कर रहा हो, यह क्षण नई ऊर्जा और कायाकल्प का होना चाहिए था। लेकिन वहां मौजूद कांग्रेस कार्यकर्ताओं के चेहरों पर उत्साह से अधिक एक प्रकार का तनावपूर्ण इंतजार और अविश्वास के भाव साफ़ देखे जा सकते थे।

वजह: जी. सुधाकरण का ऐतिहासिक विद्रोह
वहां मौजूद भीड़ और कार्यकर्ता जी. सुधाकरण के आगमन का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे—एक ऐसे पूर्व माकपा नेता और दो बार के कैबिनेट मंत्री, जो कभी इसी कांग्रेस पार्टी के सबसे कट्टर और दुर्जेय प्रतिद्वंद्वी हुआ करते थे। एक बेहद नाटकीय और विस्मयकारी घटनाक्रम में, 79 वर्षीय यह दिग्गज बागी नेता अब पड़ोसी अंबालाप्पुझा सीट से यूडीएफ समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने जा रहा है। सुधाकरण यहाँ के हाई-प्रोफाइल मौजूदा विधायक एच. सलाम को चुनौती दे रहे हैं। गौर करने वाली बात यह है कि सुधाकरण ने 2006 से 2021 तक लगातार इस सीट का प्रतिनिधित्व किया था और पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हें टिकट से वंचित रखा गया था, जो उनके विद्रोह की नींव बना।

मार्च की शुरुआत में माकपा की अपनी प्राथमिक सदस्यता का नवीनीकरण न करने का फैसला लेने वाले इस कद्दावर बागी के इर्द-गिर्द ही आज अलप्पुझा का पूरा राजनीतिक नैरेटिव सिमट गया है। कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को इसमें एक बड़ा रणनीतिक अवसर दिखाई दे रहा है। ए.ए. शुक्कूर, जो कभी सुधाकरण के धुर विरोधी रहे हैं, उन्होंने 'द फेडरल' से बातचीत में कहा, “जब मैं जिला कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष था, तब सुधाकरण माकपा के जिला सचिव के रूप में हमारे सबसे बड़े दुश्मन थे। हमारे बीच दर्जनों बार आमने-सामने के कड़े मुकाबले हुए हैं। मैंने विधानसभा के भीतर और बाहर उन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। लेकिन गहराई में हम सभी जानते थे कि वह एक ईमानदार और सीधे कम्युनिस्ट हैं। अब अलप्पुझा में माकपा का नेतृत्व अपराधी तत्वों के एक समूह के हाथ में चला गया है, और सुधाकरण इस भीड़ में अकेले और अलग खड़े हैं। उनके हमारे पक्ष में आने से जिले की कम से कम 3-4 सीटों पर समीकरण पूरी तरह हमारे पक्ष में पलट सकते हैं।”

'नैतिक रूप से पूरी तरह गिर चुकी है माकपा': सुधाकरण का कड़ा प्रहार
सुधाकरण ने सभा में पहुँचने में भले ही डेढ़ घंटे की देरी की, लेकिन उन्होंने अपने भाषण से इसकी पूरी कसर निकाल दी। उन्होंने अपनी पूर्व पार्टी पर, जिसे खड़ा करने में उन्होंने अपना जीवन लगाया था, बेहद तीखे और कड़े प्रहार किए। उन्होंने माकपा नेतृत्व पर अपनी मूल वैचारिक जड़ों से पूरी तरह कट जाने और सिद्धांतों के बजाय भोग-विलास को चुनने का संगीन आरोप लगाया।

एक फारसी कवि के दर्शन को राजनीति से जोड़ते हुए उन्होंने कहा, “उमर खय्याम नाम के एक महान कवि थे। उनका जीवन दर्शन बहुत सरल था।इस क्षण में खुश रहो क्योंकि यही क्षण तुम्हारा वास्तविक जीवन है। खाओ, पीओ और ऐश करो क्योंकि कल तुम्हारा नहीं है। आज के माकपा नेता बिल्कुल वैसे ही हो गए हैं। वे कल की चिंता किए बिना फिजूलखर्ची और जश्न मना रहे हैं। वे पार्टी के भीतर अच्छे और ईमानदार नेताओं को पनपने नहीं देते; वे केवल अपने जैसे 'क्लोन' (Clones) तैयार करते हैं। पार्टी आज नैतिक और चारित्रिक रूप से पूरी तरह गिर चुकी है।” अलप्पुझा जैसे जिले में, जहाँ माकपा का हमेशा से एक सख्त और अनुशासित संगठनात्मक ढांचा रहा है, सुधाकरण का यह विद्रोह केवल मतभेद नहीं बल्कि एक बहुत बड़ी दरार है।

माकपा का डर: 'सुधाकरण क्या कर सकते हैं, हम जानते हैं'
माकपा ने इस स्थिति पर फिलहाल बेहद संभलकर और सावधानी से प्रतिक्रिया दी है। पार्टी के राज्य सचिव एम.वी. गोविंदन ने आंतरिक बैठकों में स्वीकार किया है कि भले ही पार्टी राज्य की सत्ता बरकरार रखने में सफल रहे, लेकिन अंबालाप्पुझा जैसी प्रतिष्ठा वाली सीट हारना एक बहुत बड़ा और अपमानजनक झटका माना जाएगा। पार्टी अच्छी तरह जानती है कि सुधाकरण की असली ताकत केवल कैडर को लामबंद करने में नहीं है, बल्कि वे उन 'फ्लोटिंग वोटर्स' (तटस्थ मतदाता) को भी अपनी ओर खींचने की जबरदस्त क्षमता रखते हैं जो किसी भी चुनाव का रुख बदल देते हैं।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “भले ही उन्हें हमारे कैडर का संगठित समर्थन न मिले, लेकिन हम इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि वे जनता के बीच से कितने 'पॉपुलर वोट' बटोर सकते हैं। यह हमारे लिए वाकई चिंता का एक बड़ा विषय है।” हालाँकि, जहाँ माकपा का एक धड़ा सुधाकरण की सादगी और स्वच्छ छवि को स्वीकार करता है, वहीं पार्टी के भीतर की युवा आवाज़ें उन पर बेहद आक्रामक और वैचारिक हमला बोल रही हैं।

शहादत की राजनीति और भाई की हत्या का विवाद
एसएफआई (SFI) के युवा नेता एम. शिवप्रसाद ने सुधाकरण पर बहुत गंभीर और भावनात्मक आरोप लगाए हैं। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे सुधाकरण ने दशकों तक शहादत की कहानियों के जरिए कैडर्स की एक पूरी पीढ़ी को तैयार किया था। शिवप्रसाद ने सवाल किया, “हर साल जब हम अपने शहीद साथी जी. भुवनेस्वरन (सुधाकरण के छोटे भाई) को पुष्पांजलि अर्पित करते थे, तो हम इसी व्यक्ति का भाषण सुनते थे जो हमें बताता था कि कैसे केएसयू (KSU) के गुंडों ने उनके भाई की बर्बरता से हत्या की थी। हम में से कई लोग उनके उन भाषणों को सुनकर ही एसएफआई में शामिल हुए थे। लेकिन आज वही सुधाकरण सत्ता के लालच में कह रहे हैं कि उनके भाई को केएसयू ने नहीं बल्कि सामंती नायर तत्वों ने मारा था। कोई व्यक्ति अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए अपने सगे भाई की शहादत के इतिहास को कैसे बदल सकता है?”

ओमानाकुट्टन की कहानी: निष्ठा बनाम व्यक्तिगत अहंकार
इस विद्रोह के बीच ओमानाकुट्टन नाम के एक स्थानीय माकपा कार्यकर्ता की कहानी भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है। ओमानाकुट्टन को कुछ समय पहले मीडिया ने एक राहत शिविर से पैसे ऐंठने के झूठे आरोपों में घेरा था। तब सुधाकरण, जो मंत्री थे, उन्होंने बिना जांच किए सार्वजनिक रूप से उनकी कड़ी निंदा की थी। बाद में यह साबित हुआ कि ओमानाकुट्टन ने केवल शिविर के सामुदायिक रसोईघर के लिए लकड़ियां लाने हेतु ऑटो के किराए के रूप में 70 रुपये मांगे थे। ओमानाकुट्टन आज भी अपमान सहने के बावजूद पार्टी के साथ चट्टान की तरह खड़े हैं और एच. सलाम के लिए जोर-शोर से प्रचार कर रहे हैं। सुधाकरण के विद्रोह पर उनकी टिप्पणी मार्मिक है, “देखिए, मैं अपमानित होने के बाद भी आज पार्टी के साथ हूँ और अपनी जिम्मेदारियां निभा रहा हूँ। और दूसरी ओर सुधाकरण को देखिए, वे आज दुश्मन के खेमे में खड़े हैं। हमारे शहीदों के अलावा कोई भी व्यक्ति पार्टी से ऊपर नहीं हो सकता।”

अलप्पुझा का रण: विरासत और विचारधारा पर कब्जे की जंग
अलप्पुझा की यह चुनावी लड़ाई अब केवल हार-जीत या मतों की गणना तक सीमित नहीं रह गई है। यह लड़ाई अब विचारधारा और राजनीतिक विरासत पर मालिकाना हक की लड़ाई बन चुकी है। कांग्रेस के लिए सुधाकरण वह 'राजनीतिक भूकंप' हैं जो माकपा के अभेद्य माने जाने वाले वोट बैंक में गहरी दरारें पैदा कर सकते हैं। उन्हें उम्मीद है कि इसका असर न केवल अलप्पुझा और अंबालाप्पुझा पर पड़ेगा, बल्कि जिले की अन्य महत्वपूर्ण सीटों जैसे कुट्टनाड, कायमकुलम और चेरथला में भी कांग्रेस के लिए जीत की संभावनाओं के द्वार खुल जाएंगे।

लेकिन राजनीतिक पंडितों का मानना है कि माकपा को अभी से खारिज कर देना एक बहुत बड़ी रणनीतिक भूल होगी। पार्टी के पास आज भी एक बहुत ही अनुशासित कैडर बेस, मजबूत संगठनात्मक शक्ति और जमीनी स्तर पर मतदाताओं को पोलिंग बूथ तक लाने की बेजोड़ क्षमता है। पार्टी इन संगठनात्मक हथियारों का इस्तेमाल सुधाकरण नामक इस 'स्वदेशी मिसाइल' के असर को कम करने के लिए किस हद तक कर पाती है, इस पर पूरे केरल और विशेष रूप से कांग्रेस की गहरी नजर टिकी रहेगी। इस वैचारिक और व्यक्तिगत महायुद्ध का अंतिम फैसला 4 मई को ही साफ़ होगा।


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