तीन-भाषा नीति पर स्टालिन बनाम केंद्र सरकार, भाषा से सियासत तक टकराव
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तीन-भाषा नीति पर स्टालिन बनाम केंद्र सरकार, भाषा से सियासत तक टकराव

तीन-भाषा नीति पर तमिलनाडु और केंद्र में टकराव बढ़ा, स्टालिन ने हिंदी थोपने का आरोप लगाया, जबकि केंद्र ने इसे लचीली और बहुभाषी नीति बताया।


तमिलनाडु में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले विवादास्पद “तीन-भाषा फार्मूला” अब मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के बीच तीखी बहस का मुद्दा बन गया है। डीएमके अध्यक्ष स्टालिन ने साफ कर दिया है कि जब तक उनकी पार्टी सत्ता में है, राज्य में तीन-भाषा नीति लागू नहीं की जाएगी।

स्टालिन ने इस नीति को तमिलनाडु के लोगों पर हिंदी थोपने की साजिश करार दिया। उन्होंने रविवार (5 अप्रैल) को कहा, “जब तक डीएमके सत्ता में है, हम तमिलनाडु में तीन-भाषा नीति लागू नहीं होने देंगे। जीत की संभावनाएं बेहद अच्छी हैं और हम सभी 234 सीटों पर जीत हासिल करेंगे।”

नीति को लेकर स्टालिन का जवाब

यह बयान उस समय आया जब स्टालिन ने एक दिन पहले धर्मेंद्र प्रधान के सोशल मीडिया पोस्ट का जवाब देते हुए कहा कि वास्तव में यह नीति भारत की भाषाई विविधता को कमजोर कर एक समान ‘वन इंडिया’ ढांचे में बदलने की कोशिश है।इससे पहले प्रधान ने कहा था कि नई शिक्षा नीति का उद्देश्य भाषाई पहुंच को बढ़ाना है, न कि उसे सीमित करना। उन्होंने यह भी खारिज किया कि हिंदी को अनिवार्य बनाया जा रहा है। उनके अनुसार यह ढांचा अधिक भाषाएं सीखने को प्रोत्साहित करता है और हिंदी को अनिवार्य नहीं बनाता।

उन्होंने लिखा, “बहुभाषावाद को खतरे के रूप में दिखाना गलत है। अतिरिक्त भाषाएं सीखने से तमिल कमजोर नहीं होती, बल्कि उसके बोलने वाले अधिक आत्मविश्वासी और सक्षम बनते हैं।”

‘हिंदी थोपने’ पर केंद्र-राज्य टकराव

हालांकि स्टालिन ने प्रधान के इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए इसे “साफ तौर पर बेईमानी” बताया। उनका कहना है कि इस नीति की संरचना गैर-हिंदी भाषी राज्यों, खासकर तमिलनाडु, को सीमित विकल्पों के साथ तीसरी भाषा अपनाने के लिए मजबूर करती है।उन्होंने कहा, “जब किसी नीति के तहत गैर-हिंदी भाषी राज्यों को लगभग मजबूर कर दिया जाता है कि वे तीसरी भाषा अपनाएं, और जब शिक्षा के महत्वपूर्ण फंड इससे जुड़े हों, तो यह विकल्प नहीं रह जाता, बल्कि दबाव बन जाता है।”

स्टालिन ने यह भी आरोप लगाया कि केंद्र सरकार समग्र शिक्षा योजना के तहत मिलने वाले फंड को रोककर तमिलनाडु को दंडित कर रही है। उन्होंने कहा कि ₹2,200 करोड़ की राशि रोके जाना केवल इसलिए है क्योंकि राज्य ने हिंदी थोपने का विरोध किया है।

उन्होंने कहा, “यह सरासर गलत है कि इतनी बड़ी राशि को रोका जाए। यह कोई अनुदान नहीं बल्कि तमिलनाडु के लोगों का अधिकार है, जो कर के रूप में जमा हुआ है। इसे दबाव बनाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।”

धर्मेंद्र प्रधान ने आरोपों को खारिज किया

आलोचनाओं के जवाब में धर्मेंद्र प्रधान ने स्टालिन पर जनता में अनावश्यक डर फैलाने का आरोप लगाया। उन्होंने दोहराया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कहीं भी हिंदी को अनिवार्य नहीं किया गया है और इसमें राज्यों तथा छात्रों के लिए पर्याप्त लचीलापन है।

उन्होंने कहा, “एम.के. स्टालिन राजनीति कर रहे हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कहीं नहीं कहा गया है कि केवल हिंदी ही पढ़ाई जाएगी। हर राज्य में मातृभाषा पढ़ाई जाएगी और इसके साथ छात्र किसी अन्य भारतीय भाषा को चुन सकते हैं। वे सिर्फ डर पैदा करना चाहते हैं। किसी पर कोई भाषा नहीं थोपी जा रही है।”

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