हर सीट पर ममता का चेहरा, टीएमसी के लिए क्या यही होगा जीत का फॉर्मूला?
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हर सीट पर ममता का चेहरा, टीएमसी के लिए क्या यही होगा जीत का फॉर्मूला?

ममता बनर्जी ने खुद को सभी सीटों का चेहरा बताकर SIR विवाद, एंटी-इंकम्बेंसी और नेतृत्व की ताकत के सहारे चुनावी बढ़त बनाने की कोशिश की है।


पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री Mamata Banerjee ने रविवार (29 मार्च) को राज्य के पुरुलिया जिले में एक रैली के दौरान कहा, “मैं सभी सीटों पर उम्मीदवार हूं।” यह बयान उन्होंने ऐसे समय में दिया है जब राज्य में 23 अप्रैल से चुनाव के पहले चरण की शुरुआत होने वाली है।यह पहली बार नहीं है जब उन्होंने ऐसा कहा है। इससे पहले 2016 में भी, जब उनकी पार्टी Trinamool Congress (टीएमसी) 2011 की ऐतिहासिक जीत के बाद पहली बार दोबारा सत्ता में लौटने की कोशिश कर रही थी, तब भी उन्होंने खुद को सभी 294 सीटों का उम्मीदवार बताया था। उस समय उनकी यह रणनीति सफल रही थी।लेकिन 2026 में फिर से ऐसा बयान क्यों? जब टीएमसी लगातार तीन बार सत्ता में रह चुकी है और विपक्ष बिखरा हुआ नजर आता है, तब यह सवाल उठता है कि क्या ममता को किसी बड़े खतरे का आभास हो रहा है?

2026 में दोहराने के पीछे कारण

दरअसल, इसके पीछे तीन मुख्य कारण बताए जा रहे हैं।

1. एसआईआर (SIR) का असर

पहला बड़ा कारण मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) है, जिसने बंगाल की राजनीति में विवाद पैदा कर दिया है। बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए जाने की खबरें सामने आई हैं, यहां तक कि कोलकाता के भवानीपुर जैसे क्षेत्रों में भी। टीएमसी ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार, Bharatiya Janata Party और चुनाव आयोग मिलकर उसे सत्ता से हटाने की साजिश कर रहे हैं।

2. एंटी-इंकम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर)

दूसरा कारण सत्ता विरोधी माहौल है। लगभग 15 साल के शासन के बाद टीएमसी को एंटी-इंकम्बेंसी का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि सरकार ने कन्याश्री, लक्ष्मी भंडार और युवाश्री जैसी योजनाएं चलाई हैं, लेकिन संदेशखाली, आरजी कर केस, सिंडिकेट राजनीति और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण जैसे मुद्दों ने खासकर शहरी मध्यम वर्ग में नाराजगी बढ़ाई है।इसका संकेत पार्टी द्वारा 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काटने से भी मिलता है, जो मतदाताओं की थकान को दूर करने की कोशिश है।

3. नेतृत्व पर निर्भरता

तीसरा कारण पार्टी का ममता बनर्जी के नेतृत्व पर अत्यधिक निर्भर होना है। टीएमसी को वैचारिक पार्टी के रूप में नहीं, बल्कि नेतृत्व-आधारित पार्टी के रूप में देखा जाता है। पार्टी के दूसरे बड़े नेता Abhishek Banerjee ने भले ही कल्याणकारी राजनीति को इसकी विचारधारा बताया हो, लेकिन चुनावी अभियान आज भी ममता की छवि पर ही केंद्रित रहता है।

ममता खुद को हर सीट का चेहरा बनाकर कमजोर उम्मीदवारों को मजबूत करने और वोटरों को एकजुट करने की कोशिश कर रही हैं।टीएमसी ने पहले भी इस रणनीति का फायदा उठाया है, लेकिन क्या यह 2026 में भी कारगर साबित होगी, इसका जवाब 4 मई को मतगणना के बाद ही मिलेगा।

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